छत्तीसगढ़: कभी भाजपा की तूती बोलती थी बस्तर में, लेकिन इस गलती के बाद BJP ने खो दी सबसे मजबूत सियासी जमीन
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विस्तार
छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाकों में कभी भारतीय जनता पार्टी का बोलबाला हुआ करता था। लेकिन धीरे-धीरे बदलते वक्त के साथ छत्तीसगढ़ के इस नक्सल प्रभावित इलाके की सीटों पर भारतीय जनता पार्टी की पकड़ ढीली होती गई और कांग्रेस उतनी ही मजबूती से यहां पर प्रतिनिधित्व करती चली गई। पिछले चुनावों के आंकड़ों के मुताबिक नक्सल प्रभावित इलाके बस्तर में सभी सीटें कांग्रेस के हिस्से में आ गईं। सियासी जानकारों का कहना है कि भारतीय जनता पार्टी का कभी बख्तरबंद किला कहा जाने वाला नक्सल प्रभावित यह इलाका अपनी तीन प्रमुख खामियों के चलते पूरी तरह दरक गया है। फिलहाल अब देखा यह जाना है कि 7 नवंबर को होने वाले छत्तीसगढ़ के इस नक्सल प्रभावित इलाके में कौन बाजी मारता है। छत्तीसगढ़ के सियासी जानकारों का कहना है कि जिस तरीके से सियासी बिसात बिछाई गई है, उसमें भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस अपनी मजबूत दावेदारी के साथ नक्सल प्रभावित इलाकों के विकास का पूरा रोड मैप लेकर जनता के बीच में पहुंचे हैं।
छत्तीसगढ़ चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक नक्सल प्रभावित इलाकों बस्तर और दुर्ग की 18 सीटों पर कभी भारतीय जनता पार्टी के सबसे ज्यादा विधायक हुआ करते थे। 2003 में यहां की 18 सीटों में भारतीय जनता पार्टी को 14 सीटें, तो कांग्रेस को महज चार सीटों पर संतोष करना पड़ा था। 2008 में जब दोबारा विधानसभा का चुनाव हुआ, तो भारतीय जनता पार्टी के विधायकों की संख्या 14 से बढ़कर 15 हो गईं और कांग्रेस का एक विधायक कम हो गया। यानी कांग्रेस के महज तीन विधायक ही नक्सल प्रभावित इलाकों में पार्टी का प्रतिनिधित्व करने के लिए बचे। हालांकि इसी दौरान राज्य और केंद्र की सियासत में बड़े उथल-पुथल मचने के कयास लगाए जा रहे थे और 2013 में छत्तीसगढ़ का विधानसभा चुनाव भी होना था। लेकिन इस बार इसी सियासत की बही विपरीत हवा में भारतीय जनता पार्टी का नक्सलियों के इलाके में बनाया गया राजनीतिक किला दरकने लगा। हालत यह हुई की 2013 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी 15 से खिसक कर 6 पर पहुंच गई। जबकि कांग्रेस तीन से 12 विधानसभा की सीटों जीत के साथ पहुंच गई।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि इसी दौरान केंद्र में भाजपा की सरकार आई। कांग्रेस ने सियासी तौर पर इसका राज्य में मजबूती से लाभ उठाते हुए नक्सलियों के इलाकों में अपनी पार्टी की मजबूत पैठ बनानी शुरू की। छत्तीसगढ़ के राजनीतिक विश्लेषक बीरम चंद्रकांत कहते हैं कि भारतीय जनता पार्टी की केंद्र में सरकार ने नक्सलियों के इलाके में मजबूती से काम किया। जो इलाके प्रभावित थे उन पर केंद्रीय सुरक्षा बालों से लेकर अन्य बड़ी कार्रवाइयों के माध्यम से नक्सलियों को किनारे लगाने के लिए बड़ी-बड़ी कार्रवाई भी कीं। वह कहते हैं कि नक्सलियों के लिहाज से उनके ऊपर की गई यह कार्रवाई कानून व्यवस्था के मुताबिक तो बेहतर रहीं। लेकिन सियासी रूप से नक्सल प्रभावित इलाकों की विधानसभा सीटों पर भारतीय जनता पार्टी को इसका जबरदस्त रूप से नुकसान भी हुआ। चंद्रकांत कहते हैं कि 2018 के विधानसभा चुनाव में जब परिणाम आए, तो पता चला कि नक्सल प्रभावी इलाकों की 18 सीटों में से 17 सीटों पर कांग्रेस और महज एक सीट पर भारतीय जनता पार्टी सिमट कर रह गई। सियासी जानकारों का कहना है कि भाजपा की नक्सल प्रभावित इलाके में कमजोर होती पकड़ के पीछे कई कारण रहे उनमें बड़ा कारण यहां के वोटरों के लिहाज से यह भी माना जाता है।
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक मृगेंद्र कहते हैं कि नक्सल प्रभावित इलाकों खासतौर से बस्तर के इलाके में भारतीय जनता पार्टी के कमजोर होने की वजहों का भाजपा नेतृत्व भी जमीनी पड़ताल करता रहा है। वह कहते हैं कि 2018 के चुनाव में बस्तर और नक्सल प्रभावित इलाकों में हुई हार से पहले के भी चुनाव में लगातार कमजोर पड़ती पार्टी के लिए स्थानीय स्तर और केंद्र स्तर पर कई तरह के कारण बताए जाने लगे। वह कहते हैं कि शुरुआती दौर में तमाम कारणों के बीच तीन अहम कारण सामने आए। जिसमें प्रत्याशियों के चयन से लेकर केंद्र सरकार की ओर से नक्सलियों पर की जाने वाली कारवाइयां और नक्सल प्रभावित इलाकों में कॉरपोरेट घराने की ओर से स्थापित किए जाने वाले उद्योगों में कांग्रेस पार्टी की सियासी रणनीति भी शामिल रही है।
मृगेंद्र कहते हैं भारतीय जनता पार्टी भी अंदरूनी तौर पर मानती है कि प्रत्याशियों का चयन गलत हुआ। भाजपा ने इन चुनावों में अपने उन पुराने प्रत्याशियों को मैदान में उतारा, जिससे जनता और कार्यकर्ता दोनों नाराज थे। वह कहते हैं कि रमन सरकार में बस्तर संभाग से महेश गागड़ा, केदार कश्यप और लता उसेंडी को मंत्री बनाया गया था। रमन की तीनों पारी में इन्हीं नेताओं ने बस्तर का प्रतिनिधित्व किया, जिससे जनता नाराज थी। स्थानीय लोग लगातार नए लोगों को मौका दिए जाने की बात करते रहे। लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने इस बात को नजरअंदाज किया। नतीजा हुआ कि कभी इन इलाकों में भाजपा के सबसे ज्यादा विधायक हुआ करते थे जो पिछले चुनाव में महज एक सीट पर सिमट गए।
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक मृगेंद्र कहते हैं दूसरा प्रमुख कारण नक्सलवाद रहा। केंद्र में मोदी सरकार बनने के बाद नक्सलियों के खिलाफ फोर्स का आक्रमण तेज हुआ। बस्तर के अंदरूनी इलाकों में बहुत सी जगहों पर विकास नहीं हो पाया था और नक्सली मतदान में प्रभावी भूमिका निभा रहे थे। यही कारण है कि नक्सलियों ने भाजपा के सभी उम्मीदवारों को हराने का आघोषित फरमान जारी किया था। परिणाम यह आया कि बस्तर की 12 में 11 सीट कांग्रेस को जीत मिली। सिर्फ एक दंतेवाड़ा की सीट पर देवती कर्मा को हार का सामना करना पड़ा। इसके पीछे यह तर्क दिया जाता है कि नक्सलियों के खिलाफ महेंद्र कर्मा ने सलवा जुडूम जैसे अभियान का नेतृत्व किया था। जिससे नक्सलियों की नाराजगी कम नहीं हुई थी।
सियासी जानकार चंद्रकांत कहते हैं कि तीसरा प्रमुख कारण आदिवासियों की जमीन पर कॉर्पोरेट घराने का कब्जा था। आदिवासियों की जमीन को राज्य सरकार ने अधिकृत किया, लेकिन बस्तर में कोई भी बड़ा प्लांट नहीं लगा पाई। कांग्रेस ने पिछले चुनाव में लोहंडीगुड़ा और नगरनार जैसे प्लांट को चुनावी मुद्दा बनाया। कांग्रेस की सरकार आने के बाद लोहंडीगुड़ा में किसानों की जमीन को वापस करने का बड़ा फैसला भी लिया गया। बस्तर के अंदरूनी इलाके के आदिवासियों के न तो आधार कार्ड बन रहे थे, न ही राशन कार्ड। जिससे उनको सरकारी योजनाओं का लाभ भी नहीं मिल पा रहा था। वह कहते हैं कि भाजपा के विपरीत कांग्रेस ने पिछले चुनाव में नए प्रत्याशियों को मैदान में उतारा और अपनी इस सधी हुई सियासी पारी से भाजपा के इस मजबूत किले को ध्वस्त कर दिया।