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सरनेम बदलने से नहीं बदलती जाति : हाईकोर्ट
एजेंसी/ मुंबई
Updated Sun, 29 May 2016 07:40 PM IST
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बांबे हाईकोर्ट ने मेडिकल के छात्र शांतनु हरि भारद्वाज को बड़ी राहत देते हुए कहा कि उपनाम (सरनेम) बदलने से किसी व्यक्ति की जाति नहीं बदल जाती है। लिहाजा ऐसे व्यक्ति को आरक्षण का लाभ देने से इनकार नहीं किया जा सकता है।
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दरअसल, याचिकाकर्ता शांतनु ने दिसंबर 2014 में प्रवर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज से एमबीबीएस की डिग्री हासिल की थी। इसके बाद 2016 के सत्र के लिए अमरावती स्थित डॉ पंजाबराव बौचंद देशमुख मेमोरियल कॉलेज में अनुसूचित जनजाति श्रेणी के तहत पोस्ट ग्रेजुएट पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिए आवेदन किया था, लेकिन कॉलेज प्रशासन ने उनको इस आधार पर प्रवेश देने से इनकार कर दिया गया कि उन्होंने अपना उपनाम सकपाल से बदलकर भारद्वाज कर लिया है। हालांकि याचिकाकर्ता शांतनु के पास वैध अनुसूचित जनजाति का प्रमाण पत्र भी है और वह अनुसूचित जनजाति से आते है।
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न्यायाधीश शालिनी फंसालकर-जोशी और बीआर गवाई की अवकाशकालीन पीठ ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति अपना उपनाम बदल लेता है, तो उसकी जाति नहीं बदल जाती है। याचिकाकर्ता ने 1999 में अपना उपनाम सकपाल से बदलकर भारद्वाज कर लिया था, जिसको 20 मई 1999 को महाराष्ट्र सरकार के गजट में भी प्रकाशित कराया था।
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उन्होंने उपनाम बदलने के लिए 29 अगस्त 1999 को शिक्षा अधिकारी को भी आवेदन किया था। मेडिकल के छात्र शांतनु को अंतरिम राहत देते हुए अदालत ने निर्देश दिया कि अगर याचिकाकर्ता के पास वैध जाति प्रमाण पत्र है और सरकारी गजट में उपनाम में बदलाव को प्रकाशित किया गया है, तो आरक्षित श्रेणी में उनके दावे पर विचार किया जाए।
न्यायालय ने अपने आदेश में सरकारी वकील से कहा कि वह अदालत के फैसले को संबंधित कॉलेज के अधिकारियों तक पहुंचाएं। याचिकाकर्ता का कहना था कि वह हिंदू धर्म के टोकरे कोली जाति के हैं, जो भारतीय संविधान की अनुसूची के तहत अनुसूचित जनजाति है।