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तीन तलाक पर होगी तीन साल की जेल, राष्ट्रपति ने हस्ताक्षर कर लगाई मुहर

Wed, 19 Sep 2018 12:08 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Wed, 19 Sep 2018 12:08 PM IST
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Central government has approved the ordinance on triple talaq
तीन तलाक (तलाक ए बिद्दत)

सुप्रीम कोर्ट में गैरकानूनी घोषित किए जा चुके तलाक-ए-बिद्दत (तीन तलाक) को दंडनीय अपराध बनाने वाले बिल को कानून के रूप में मंजूरी देने वाले अध्यादेश पर बुधवार देर रात राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने हस्ताक्षर कर दिए। इससे पहले सुबह केंद्र सरकार ने इसे अध्यादेश के तौर पर लागू करने की मंजूरी दे दी थी। अब एक साथ तीन तलाक देना दंडनीय अपराध की श्रेणी में शामिल हो गया है। ऐसा करने वाले को तीन साल तक की सजा भुगतनी होगी।

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अध्यादेश के प्रावधानों के मुताबिक, अगर पीड़ित महिला या उसके करीबी रिश्तेदार ने खुद शिकायत दर्ज कराई तो इसे संज्ञेय अपराध की श्रेणी में रखा जाएगा। इस मामले में पुलिस को पति को गिरफ्तार करने का अधिकार होगा। इसके अलावा मजिस्ट्रेट महिला का पक्ष सुने बिना आरोपी पति को जमानत नहीं दे पाएंगे। मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक लोकसभा में पास हो चुका है, लेकिन राज्यसभा में लंबित है। इसलिए केंद्र सरकार ने अध्यादेश का रास्ता चुना यानी छह महीनों तक यह कानून के तौर पर काम करेगा। सरकार को छह महीने में इस विधेयक को राज्यसभा से पास कराना होगा।
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तीन तलाक दिया जाना शर्मनाक : प्रसाद
केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि सरकार मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए कृतसंकल्प है। आजादी के सात दशक बाद और संविधान में मौलिक अधिकारों का जिक्र किए जाने के बाद भी तीन तलाक दिया जाना शर्मनाक है। चूंकि विपक्ष ने वोट बैंक की राजनीति के लिए इससे जुड़े बिल पर समर्थन नहीं दिया, इसलिए अध्यादेश लाना सरकार की मजबूरी थी। प्रसाद ने यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी, ममता बनर्जी और मायावती से इस बिल पर साथ आने की अपील की।
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सरकार मुद्दे को राजनीतिक फुटबॉल मान रही : सुरजेवाला
नई दिल्ली। कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि सरकार इस मुद्दे को मुस्लिम महिलाओं के न्याय का मामला कम और राजनीतिक फुटबॉल अधिक मानती है। कांग्रेस के लिए ये मामला हमेशा मानवीय, महिलाओं के अधिकार और न्याय दिलाने का रहा है। मोदी जी नहीं चाहते कि मुस्लिम महिलाओं को न्याय मिले। हमने गुजारा भत्ते का सुझाव दिया। मोदी सरकार ने इसे नहीं माना।


पुराने मामलों का क्या होगा 
अध्यादेश द्वारा लाए गए कानून पूर्व की घटनाओं में लागू नहीं होगा। आपराधिक कानून जिस दिन लागू होता है उसी समय से प्रभावी होता है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि पूर्व में तीन तलाक पीड़ित महिलाओं को इंसाफ कैसे मिलेगा। 
सरकार का पक्ष 
इस मुद्दे पर रविशंकर प्रसाद ने कहा कि सरकार विचार कर रही है कि किस तरह से उसके संज्ञान में आए पूर्व मामलों में न्याय दिलाया जा सके।
संविधानविदों की राय
हालांकि संविधानविदों का कहना है कि सरकार चाहकर भी न्याय नहीं दिला सकती। दीवानी मामलों में कानून बीते समय से लागू होता है, लेकिन आपराधिक मामलों में नहीं।


अध्यादेश की खास बातें
- पीड़ित महिला के खून के रिश्ते वाले सदस्य भी दर्ज करा सकेंगे मामला
- किसी तीसरे पक्ष को मामला दर्ज कराने का अधिकार नहीं
- समझौता महज पत्नी की पहल से ही संभव
- पीड़ित का पक्ष सुने बिना मजिस्ट्रेट नहीं दे सकेंगे जमानत
- तीन तलाक की स्थिति में मां को मिलेगी छोटे बच्चों की कस्टडी
- गुजारा भत्ता तय करने का अधिकार मजिस्ट्रेट को होगा


प्रतिक्रिया
‘यह मुस्लिम महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए उठाया गया बड़ा कदम है। अब मुस्लिम पुरुषों और धार्मिक नेताओं को  तौर तरीकों में बदलाव लाना होगा, नहीं तो उन्हें नतीजा भुगतने के लिए भी तैयार रहना होगा।’
- इशरत जहां, तीन तलाक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाली

‘मुसलमान हदीस पर अमल करते हैं। सरकार तीन तलाक पर कुछ भी कानून बनाए, लेकिन मुसलमान मजहबी मामलों में शरीयत पर अमल करेंगे।’
- मुफ्ती मोहम्मद गुलाम मुस्तफा रिजवी, सुन्नी बरेलवी उलेमा 
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