270 अरब डॉलर का बजट, कड़े नियम और तकनीक: चीन ने ऐसे जीती वायु प्रदूषण के खिलाफ जंग, दिल्ली के लिए क्या है सीख?
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विस्तार
सर्दियां शुरू होते ही दिल्ली की हवा काफी जहरीली हो जाती है। एयर क्वालिटी इंडेक्स अपने रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच जाता है और इस दौरान लोगों को सांस लेने में काफी तकलीफ का सामना करना पड़ता है। हवा में मौजूद प्रदूषक तत्वों की वजह से कई लोगों को आंखों, नाक और गले में जलन भी होती है। इस गंभीर स्थिति से निपटने के लिए सरकार स्कूल और कॉलेजों को कुछ दिनों के लिए बंद कर देती है।
कई जगहों पर निर्माण कार्य और दूसरी कई तरह की गतिविधियों पर भी रोक लगा दी जाती है ताकि प्रदूषण बढ़ने की समस्या को कुछ हद तक नियंत्रत किया जा सके। यह समस्या हर साल सामने आती है। पिछले कई वर्षों में सरकार ने दिल्ली में प्रदूषण का स्तर कम करने के वादे तो जरूर किए हैं, लेकिन हर साल सर्दियों में यह समस्या देखने को मिलती है।
2013 के आसपास चीन के बीजिंग शहर की गिनती दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में की जाती थी। वहीं आज बीजिंग में वायु प्रदूषण और पीएम 2.5 का स्तर काफी कम हो चुका है। वहां वायु प्रदूषण के गंभीर दिनों की संख्या भी काफी घट गई है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर चीन ने अपने शहरों में वायु प्रदूषण की समस्या को कैसे कम किया और दिल्ली को इससे क्या सीख लेनी चाहिए?
चीन ने कैसे कम किया वायु प्रदूषण?
एक दशक पहले चीन एक गंभीर वायु प्रदूषण के संकट से जूझ रहा था। तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के साथ बड़े शहरों में वाहनों की संख्या, भारी उद्योग और कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों से होने वाला उत्सर्जन लगातार बढ़ रहा था। इसका असर इतना गंभीर था कि बीजिंग में प्रदूषण का स्तर कई बार खतरनाक स्थिति तक पहुंच जाता था। खराब होती हवा को लेकर चीन के कई हिस्सों में लोगों के बीच नाराजगी बढ़ी और जगह-जगह विरोध प्रदर्शन भी होने लगे थे।
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने बीजिंग के सामने मौजूद वायु प्रदूषण को देश की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक माना। इसके बाद चीन ने प्रदूषण से निपटने के लिए बड़े पैमाने पर राष्ट्रीय अभियान शुरू किया। सरकार ने इसके लिए करीब 270 अरब डॉलर का भारी-भरकम बजट तय किया। इस योजना का मकसद सिर्फ प्रदूषण के गंभीर दिनों में अस्थयी कदम उठाना नहीं था बल्कि उन जगहों पर एक्शन लेना था जो लगातार हवा को खराब करने का काम कर रहे थे।
चीन ने वायु प्रदूषण से निपटने के लिए सिर्फ एक-दो उपायों पर निर्भर रहने के बजाय कई स्तरों पर एक साथ काम किया। बीजिंग में प्रदूषण के अलग-अलग स्रोतों को पहचानकर उनके हिसाब से कदम उठाए गए। इसी रणनीति का एक अहम हिस्सा पब्लिक ट्रांसपोर्ट और अर्बन रेल नेटवर्क का विस्तार था। इसका मकसद लोगों की कारों पर निर्भरता कम करना और शहर में ज्यादा टिकऊ परिवहन व्यवस्था तैयार करना था।
चीन ने प्रदूषण से निपटने के लिए लाखों घरों और छोटे उद्योगों में कोयले के बॉयलरों को हटाकर नेचुरल गैस और इलेक्ट्रिक हीटिंग से रिप्लेस कर दिया। इस दौरान सरकार ने लगभग तीन हजार से अधिक भारी और प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों को या तो हमेशा के लिए बंद कर दिया या फिर उन्हें बीजिंग से सैकड़ों किलोमीटर दूर कम आबादी वाले इलाकों में शिफ्ट कर दिया।
इसके साथ ही 2016 में बीजिंग ने हवा की निगरानी के लिए एक आधुनिक मॉनिटरिंग नेटवर्क तैयार किया। इसमें हाई-रिजॉल्यूशन सैटेलाइट, रिमोट सेंसिंग और लेजर रडार जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया। शहर में पीएम 2.5 पर नजर रखने के लिए एक हजार से ज्यादा सेंसर लगाए गए। इन सेंसर से यह पता लगाने में मदद मिली कि शहर के किस इलाके में और किस समय प्रदूषण का स्तर सबसे ज्यादा बढ़ रहा है। यानी चीन ने प्रदूषण कम करने के लिए सिर्फ कार्रवाई नहीं की बल्कि डाटा के जरिए यह समझने की कोशिश भी की कि समस्या सबसे ज्यादा कहां और कब पैदा हो रही है।
बीजिंग ने प्रदूषण कम करने के लिए परिवहन से लेकर ऊर्जा और पर्यावरण तक कई मोर्चों पर एक साथ नीतियां लागू कीं। शहर में कारों की संख्या नियंत्रित करने के लिए लाइसेंस प्लेट लॉटरी, कुछ जगहों पर ड्राइविंग प्रतिबंध और पुराने प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों को हटाने के लिए स्क्रैपिंग इंसेटिव जैसी व्यवस्था शुरू की। इन सबके साथ वाहनों के लिए सख्त उत्सर्जन मानक लागू किए गए और ईवी वाहनों को बढ़ावा दिया गया। यही नहीं चीन ने पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बेहतर करने के लिए वाहनों को आधुनिक कर दिया।
इसके अलावा चीन की जो उत्तरी सीमा है वहां पर बड़े पैमाने पर वनीकरण किया गया। इसका असर यह हुआ कि कभी बीजिंग में आम रहने वाले धूल भरे रेतीले तूफानों की घटनाएं कम हो गईं। इससे यह स्पष्ट होता है कि चीन ने प्रदूषण के खिलाफ लड़ाई सिर्फ एक मोर्चे पर नहीं लड़ी बल्कि उसने परिवहन, ऊर्जा, उद्योग और पर्यावरण से जुड़ी एक बड़ी चुनौती मानकर अलग अलग स्तर पर काम किया।
दिल्ली के लिए क्या है सीख?
दिल्ली के लिए सबसे बड़ी सीख यह है कि प्रदूषण से निपटने के लिए सिर्फ सर्दियों में आपातकालीन कदम उठाना ही काफी नहीं है। जरूरत लंबे समय के प्लान की है, जिसमें प्रदूषण के हर बड़े स्रोत पर एक साथ काम किया जाए। वाहनों से होने वाले उत्सर्जन को कम करने के लिए बेहतर पब्लिक ट्रांसपोर्ट और साफ ईधन को बढ़ावा देने की जरूरत है। उद्योगों और बिजली उत्पादन से होने वाले प्रदूषण पर भी लगातार निगरानी रखनी जरूरी है। इसके साथ ही एयर क्वालिटी का सटीक डाटा जुटाकर उसी आधार पर एक्शन प्लान करना होगा। सबसे अहम बात यह है कि प्रदूषण को सिर्फ एक सीजन की समस्या मानने के बजाय पूरे साल की चुनौती समझकर नीतियों को जमीन स्तर पर लागू करना होगा।
हालांकि, इस सीख को अपनाते वक्त हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि दोनों देशों की परिस्थितियां बिल्कुल अलग हैं। चीन ने अपनी वन-पार्टी सिस्टम की वजह से बेहद सख्त फैसले तुरंत लागू कर दिए, जबकि भारत को अपनी लोकतांत्रिक सीमाओं, राज्यों की राजनीति और किसानों की पराली जैसी जमीनी समस्याओं को संभालते हुए कोई स्थाई हल ढूंढना होगा।