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दिल्ली में भूकंप झेलने लायक नहीं 80 फीसदी इमारतें! जानें भूकंप से जुड़ी जरूरी बातें
Tue, 05 Feb 2019 01:51 PM IST
Shani Mishra
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Shani Mishra
Updated Tue, 05 Feb 2019 01:51 PM IST
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दो दिन पहले ही दिल्ली- राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और जम्मू कश्मीर में भूकंप के झटके महसूस किए गए थे। इस भूकंप का केंद्र हिंदूकुश में था। झटकों से कोई नुकसान तो नहीं हुआ मगर इसने लोगों के दिलों में डर जरूर बैठा दिया। इस भूकंप की तीव्रता तो कम थी मगर सवाल यह उठता है कि अगर दिल्ली जैसे शहर में भूकंप आया तो क्या होगा? जानकारों के मुताबिक राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की इमारतें औसत से तेज भूकंप की स्थिति में भी सुरक्षित नहीं है।
उत्तर-पूर्व के सभी राज्य, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड तथा हिमाचल प्रदेश के कुछ हिस्से जोन-5 में ही आते हैं। सिस्मिक जोन-4 में आने वाले देश के बड़े शहरों की तुलना में देश की राजधानी दिल्ली में भूकंप की आशंका ज्यादा बताई जाती है। भूगर्भशास्त्री के मुताबिक इसके पीछे का कारण दिल्ली का भारत और यूरेशिया प्लेट के मिलने से बने हिमालय के निकट होना है। धरती के अंदर की हलचल का खामियाजा यहां के लोगों को उठाना पड़ता है। चिंता तब और बढ़ जाती है जब आंकड़े इस बात की तस्दीक करते हैं कि शहर की इमारतें भूकंप झेलने के मानकों के अनुसार नहीं बनी है।
मात्र 20 फीसदी इमारते मानकों के अनुसार
विशेषज्ञों के मुताबिक दिल्ली में 70 से 80 फीसदी इमारतें बड़ी तीव्रता के भूंकप का झटका झेलने योग्य नहीं है। यमुना के पूर्वी और पश्चिमी किनारे पर इमारतों का निर्माण मिट्टी की पकड़ के जांच को नजरअंदाज करके किया गया है। मगर सार्क डिजास्टर मैनेजमेंट सेंटर के मुताबिक अगर हम लातूर में आए भूकंप को ध्यान में रखे तो दिल्ली में असुरक्षित इमारतों के साथ बहुत ही सुरखित इमारतें भी है। तमाम आशंकाएं बस अनुमान पर आधारित है। नागरिक और सरकार सजग होकर अपनी जिम्मेदारी निभाए तो इस खतरे से निपटा जा सकता है।
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इस वजह से आते हैं भूकंप
धरती मुख्य तौर पर चार परतों से मिलकर बनी है। इन परतों को इनर कोर, आउटर कोर, मैन्टल और क्रस्ट कहा जाता है। क्रस्ट और ऊपरी मैन्टल लिथोस्फेयर कहलाता है। 50 किलोमीटर मोटी यह परतें टैक्टोनिक प्लेट्स के नाम से जानी जाती है। इन प्लेट्स में अक्सर हलचल होती रहती है। यह हर साल लगभग चार से पांच मिमी तक अपने स्थान से खिसकती है। यह ऊपर या नीचे किसी भी तरफ खिसक सकती है। इस दौरान जब कोई दूसरी प्लेट इसके पास आती या दूर जाती है धरती हिल जाती है। यह प्लेट सतह से करीब 30-50 किमी तक नीचे हैं।
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उत्तर-पूर्व के सभी राज्य, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड तथा हिमाचल प्रदेश के कुछ हिस्से जोन-5 में ही आते हैं। सिस्मिक जोन-4 में आने वाले देश के बड़े शहरों की तुलना में देश की राजधानी दिल्ली में भूकंप की आशंका ज्यादा बताई जाती है। भूगर्भशास्त्री के मुताबिक इसके पीछे का कारण दिल्ली का भारत और यूरेशिया प्लेट के मिलने से बने हिमालय के निकट होना है। धरती के अंदर की हलचल का खामियाजा यहां के लोगों को उठाना पड़ता है। चिंता तब और बढ़ जाती है जब आंकड़े इस बात की तस्दीक करते हैं कि शहर की इमारतें भूकंप झेलने के मानकों के अनुसार नहीं बनी है।
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मात्र 20 फीसदी इमारते मानकों के अनुसार
विशेषज्ञों के मुताबिक दिल्ली में 70 से 80 फीसदी इमारतें बड़ी तीव्रता के भूंकप का झटका झेलने योग्य नहीं है। यमुना के पूर्वी और पश्चिमी किनारे पर इमारतों का निर्माण मिट्टी की पकड़ के जांच को नजरअंदाज करके किया गया है। मगर सार्क डिजास्टर मैनेजमेंट सेंटर के मुताबिक अगर हम लातूर में आए भूकंप को ध्यान में रखे तो दिल्ली में असुरक्षित इमारतों के साथ बहुत ही सुरखित इमारतें भी है। तमाम आशंकाएं बस अनुमान पर आधारित है। नागरिक और सरकार सजग होकर अपनी जिम्मेदारी निभाए तो इस खतरे से निपटा जा सकता है।
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इस वजह से आते हैं भूकंप
धरती मुख्य तौर पर चार परतों से मिलकर बनी है। इन परतों को इनर कोर, आउटर कोर, मैन्टल और क्रस्ट कहा जाता है। क्रस्ट और ऊपरी मैन्टल लिथोस्फेयर कहलाता है। 50 किलोमीटर मोटी यह परतें टैक्टोनिक प्लेट्स के नाम से जानी जाती है। इन प्लेट्स में अक्सर हलचल होती रहती है। यह हर साल लगभग चार से पांच मिमी तक अपने स्थान से खिसकती है। यह ऊपर या नीचे किसी भी तरफ खिसक सकती है। इस दौरान जब कोई दूसरी प्लेट इसके पास आती या दूर जाती है धरती हिल जाती है। यह प्लेट सतह से करीब 30-50 किमी तक नीचे हैं।
क्या है रिक्टर स्केल?
रिक्टर स्केल
रिक्टर स्केल से भूकंप की तीव्रता मापी जाती है। इसे रिक्टर मैग्नीट्यूड टेस्ट स्केल के नाम से भी जाना जाता है। रिक्टर स्केल पैमाने को सन 1935 में कैलिफॉर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलाजी के वैज्ञानिक चार्ल्स रिक्टर ने बेनो गुटेनबर्ग के सहयोग से खोजा गया था। भूकंप की तरंगों को रिक्टर स्केल 1 से 9 तक के आधार पर मापता है। आठ की तीव्रता का भूकंप 60 लाख टन से ज्यादा की ऊर्जा पैदा करके तबाही मचा सकता है।
रिक्टर स्केल पर भूकंप का मापन
रिक्टर स्केल पर भूकंप का मापन
- 2.0 से कम पैमाने वाले भूकंपों के झटके महसूस नहीं होते।
- 3.0 से 3.9 पैमाने वाले भूकंप महसूस होता है, पर क्षति नहीं पहुंचाता है।
- 4.0 से 4.9 की तीव्रता वाले भूकंप के कंपन से कुछ हद तक नुकसान संभव है।
- 6.0 से 6.9 की तीव्रता वाले भूकंप शक्तिशाली होता हैं, विनाश का कारण बनता है।
- 7.0 से 7.9 पैमाने वाले भूकंप बड़े क्षेत्र में मचाते हैं भयानक तबाही।
- 8.0 से 8.9 वाले भूकंप हजारों मील में मचाते हैं विध्वंस।
भूंकप का केंद्र और तीव्रता
भूकंप की तीव्रता जहां सबसे अधिक होती है वह भूकंप का केंद्र माना जाता है। सात से अधिक तीव्रता का भूकंप आने पर 40 किमी की परिधि में झटका सबसे ज्यादा महसूस किया जाता है। केंद्र से दूरी बढ़ने पर भूकंप का प्रभाव कम हो जाता है। भूकंप की गहराई बढ़ने पर झटका भी कम हो जाता है।