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Reservation: आरक्षण मुद्दे पर सियासी संजीवनी ढूंढ रहे BSP-SP और कांग्रेस, यूं ही नहीं लपका यह मुद्दा

Thu, 22 Aug 2024 02:37 PM IST
Ashish Tiwari आशीष तिवारी
Updated Thu, 22 Aug 2024 02:37 PM IST
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सार
आरक्षण मुद्दे पर सियासी धार देने के लिए राहुल गांधी 24 अगस्त को प्रयागराज में संविधान सम्मान सम्मेलन करने जा रहे हैं। इस दौरान कांग्रेस पार्टी सरकार को आरक्षण मुद्दे पर घेरने की पूरी तैयारी कर चुकी है।
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BSP-SP Congress looking for political lifeline on reservation issue this issue did not come up just like that
Rahul Gandhi - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

केंद्र सरकार में महत्वपूर्ण पदों पर सीधी भर्ती का मामला हो या सुप्रीम कोर्ट की ओर से दिए गए फैसले की बात हो। आरक्षण के इन मुद्दों में राजनीतिक दलों को सियासी संजीवनी नजर आ रही है। यही वजह है कि कभी खुद को दलितों की मसीहा कहने वाली बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने इस मुद्दे को जोर-जोर से उठाना शुरू किया। सियासी हलचल बढ़ी, तो समाजवादी पार्टी से लेकर कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को लपक लिया। सियासी गलियारों में कहा यही जा रहा है कि आने वाले चुनाव में यह सभी राजनीतिक दल इस मुद्दे को लेकर आगे बढ़ेंगे। कांग्रेस पार्टी के नेता राहुल गांधी तो 24 अगस्त को आरक्षण के इसी मुद्दे पर प्रयागराज में संविधान सम्मान सम्मेलन करने जा रहे हैं।



आरक्षण मुद्दे पर सियासी धार देने के लिए राहुल गांधी 24 अगस्त को प्रयागराज में संविधान सम्मान सम्मेलन करने जा रहे हैं। इस दौरान कांग्रेस पार्टी सरकार को आरक्षण मुद्दे पर घेरने की पूरी तैयारी कर चुकी है। कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत कहते हैं कि प्रयागराज में आयोजित होने वाले इस कार्यक्रम में प्रदेश के लाखों कार्यकर्ता पहुंच रहे हैं। उनका कहना है जिस तरीके से केंद्र सरकार ने महत्वपूर्ण पदों पर सीधी भर्ती का विज्ञापन दिया था, उससे भाजपा के मंसूबे साफ नजर आ रहे थे। कांग्रेस पार्टी ने लगातार इस पर दबाव बनाया और नतीजा हुआ कि भाजपा को यह भर्ती विज्ञापन रद्द करने पड़े। ऐसे ही मामलों को लेकर राहुल गांधी शनिवार को प्रयागराज में संविधान सम्मान सम्मेलन करेंगे। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में किए जाने वाले इस सम्मेलन का पार्टी सीधे तौर पर दलितों पिछड़ों और में संदेश देना चाहती है।


सिर्फ कांग्रेस ही नहीं बल्कि इस मुद्दे पर बहुजन समाज पार्टी ने जिस तरीके से आक्रामक होकर अपना रूप स्पष्ट किया है, वह भी दलितों की सियासत का आधार बना हुआ है। दरअसल बीते लोकसभा चुनाव में जिस तरीके से बहुजन समाज पार्टी का दलित वोट खिसका है, उससे पार्टी अपनी नई रणनीतियां बनाने पर मजबूर हो गई। बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने तो बाकायदा उच्च पदों पर निकाले गए केंद्र सरकार के विज्ञापन को वापस लेने में अपनी पार्टी की महत्वपूर्ण भूमिका बताई। दरअसल मायावती इस मामले में दलित समाज को एक संदेश देने की कोशिश कर रही है कि केंद्र सरकार के उस विज्ञापन को रद्द करने में उन्होंने अपने समाज के हित की लड़ाई लड़ी है। सिर्फ मायावती ही नहीं, बल्कि अखिलेश यादव ने भी इस मामले में खुलकर बोलना शुरू किया। अखिलेश यादव ने उच्च पदों के मामले में रद्द किए गए विज्ञापन को पीडीए की जीत बताई। दरअसल सीधी भर्ती में विज्ञापन के अलावा सुप्रीम कोर्ट का आया एक महत्वपूर्ण फैसला भी सियासी दलों के लिए ऑक्सीजन बन गया। इस मुद्दे पर भी समाजवादी पार्टी बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस लगातार अपना रुख स्पष्ट कर रहे हैं। इसके अलावा आगे के आंदोलन की रणनीति भी बना रहे हैं।

दरअसल, इस पूरे मामले में सभी राजनीतिक दल आरक्षण मुद्दे से अपनी सियासी जमीन को मजबूत करना चाहते हैं। बहुजन समाज पार्टी जहां उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव में एक बार फिर से शून्य पर पहुंच गई है। जबकि पीडीए के सहारे अखिलेश यादव ने सबसे ज्यादा 37 सीटें झटकी हैं। गठबंधन के साथ कांग्रेस ने भी उत्तर प्रदेश में इस बार ज्यादा सीटें जीती हैं। यही वजह है कि आरक्षण के इस मामले में सभी पार्टियों खुद को मजबूती के साथ सियासी धरातल पर पेश कर रही हैं। 

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक जानकार बीडी पांडे कहते हैं कि आरक्षण के कुछ मुद्दे सियासी दलों को अचानक से मिल गए हैं। यही वजह है कि बहुजन समाज पार्टी इन मुद्दों के माध्यम से अपने खिसके हुए जनाधार और दलित वोटों को पाने की पूरी तैयारी करने लगी है। जबकि समाजवादी पार्टी पीडीए के फॉर्मूले को आगे बढ़ते हुए इस मुद्दे से जोड़ रही है। क्योंकि कांग्रेस उत्तर प्रदेश में एक लंबे अरसे बाद खुद को मजबूत स्थिति में पा रही है। यही वजह है कि राहुल गांधी प्रयागराज में एक बड़ा सम्मेलन कर रहे हैं। कुल मिलाकर सभी राजनीतिक दलों की कोशिश यही है कि दलितों, पिछड़ों और अतिपिछड़ों समेत आदिवासियों के आरक्षण को लेकर सियासी जमीन मजबूत की जाए। ताकि आने वाले चुनाव में यह मुद्दा इन सभी राजनीतिक दलों के लिए संजीवनी के तौर पर काम आ सके। 

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