ब्रिटेन का ब्रेक अप: कूटनीति के मोर्चे पर होगी भारत की अग्निपरीक्षा
आखिरकार ब्रिटेन के जनमत सर्वेक्षण के नतीजे ने साफ कर दिया कि 28 सदस्यों का संघ यूरोपीय यूनियन (ईयू) के सदस्यों की संख्या घट कर 27 रह जाएगी। ब्रिटेन में बीते कुछ वर्षों से आम जनमानस में जिस प्रकार ईयू के खिलाफ बयार बही थी, उससे जनमत सर्वेक्षण के नतीजे का अहसास पहले ही हो गया था। अब जबकि ब्रिटेन का ईयू से बाहर जाना तय है तो स्वाभाविक रूप से भारत पर इसका व्यापक कूटनीतिक और राजनीतिक असर होगा। वैसे भी वैश्विक खुली अर्थव्यवस्था के इस युग में ऐसी घटनाओं का दुनिया पर असर पड़ना स्वाभाविक है।
जहां तक भारत का सवाल है तो ईयू और ब्रिटेन से बेहतर और बहुआयामी संबंध होने के कारण इसका असर भी व्यापक होगा। भारत पर इस घटना के कूटनीतिक असर पर अपनी बात रखने से पहले हमें ब्रिटेन की सामने आई राय का ईयू देशों पर भविष्य में पड़ने वाले असर की भी विवेचना करनी होगी। क्योंकि ब्रिटेन की तरह अन्य सदस्य देश भी धीरे-धीरे अलग राह की ओर बढ़ सकते हैं। नीदरलैंड में शुरू हुई इस आशय की हलचल इसी बात का संकेत है।
जहां तक भारत पर राजनीतिक और कूटनीतिक असर की बात है तो हमें अपने देश से ईयू और ब्रिटेन के साथ द्विपक्षीय संबंधों पर ध्यान देना होगा। इसमें सबसे बड़ी बात कॉमनवेल्थ पार्टनरशिप पर नए सिरे से कूटनीतिक पहल करनी होगी। ब्रिटेन और ईयू से अपने द्विपक्षीय संबंधों को विभिन्न मोर्चे पर नए सिरे से व्याख्या करनी होगी। दरअसल हमारे कई द्विपक्षीय करार ईयू से हैं। अब जबकि ब्रिटेन इसका अंग नहीं होगा तो ऐसे कई मामलों की नई तरीके से व्याख्या की जरूरत होगी। ब्रिटेन और ईयू के अन्य देशों में विदेश मंत्रालय को नए कार्यालय स्थापित करने होंगे।
अब नई परिस्थिति में जरूरी नहीं कि अंतरराष्ट्रीय मसलों पर अब भी ईयू और ब्रिटेन की सोच एक तरह की हो। जाहिर तौर पर ऐसी स्थिति में भारत को खुद के हित में दोनों से अलग-अलग कूटनीतिक पहल की जरूरत होगी। मेरा मानना है कि ब्रिटेन के ईयू से अलग होने की घटना ईयू के अन्य देशों पर भी अलग-अलग प्रभाव छोड़ेंगे। ब्रिटेन की तर्ज पर कुछ और देश ईयू से अलग होने की पहल कर सकते हैं। चूंकि ईयू में ब्रिटेन का आर्थिक योगदान बहुत ज्यादा है और इसमें शामिल कई देशों की माली हालत ठीक नहीं है। इसमें शामिल आर्थिक रूप से मजबूत फ्रांस और जर्मनी में जल्द ही चुनाव होने के कारण ईयू से बाहर आने की सियासत तेज हो सकती है। जाहिर तौर पर ऐसी स्थिति आने पर भारत को कूटनीतिक तौर पर हर मोर्चे पर नए सिरे से पहल करनी होगी।
मेरे हिसाब से इस घटना का व्यापक असर ब्रिटेन सहित ईयू के अन्य देशों में नौकरी कर भारतीयों के भविष्य पर भी पड़ेगा। ब्रिटेन के आम लोगों की सोच प्रवासियों के लिए अच्छी नहीं है। ऐसे में घरेलू राजनीतिक दबाव में सरकारें प्रवासियों के प्रति सख्त रुख अपनाने के लिए घरेलू कानून को सख्त बनाएंगे। जाहिर तौर पर इसका असर वहां रहने वाले भारतीयों के रोजगार पर पड़ेगा। हां, भारत के लिए सकारात्मक पक्ष यह है कि वह ब्रिटेन के साथ द्विपक्षीय व्यापार के क्षेत्र में नये समझौते के जरिये लाभ हासिल कर सकता है। दरअसल, ब्रिटेन के चाहते हुए भी ईयू ने भारत की खुद के साथ मुक्त व्यापार संधि करने की इच्छा पूरी नहीं होने दी थी।
( शशांक शेखर, पूर्व विदेश सचिव की हिमांशु मिश्र से बातचीत पर आधारित )
टूट गया यूरोपीय एकता का सपना
आखिरकार ब्रिटेन ने यूरोपीय यूनियन से बाहर जाने का फैसला कर लिया। इस फैसले से ब्रिटेन की एक बड़ी आबादी और पूरा यूरोपीय यूनियन सदमे में है। यूरोप के लिए यह स्तब्ध कर देने वाली घटना है। इसका जबरदस्त फौरी असर हुआ है। ब्रिटेन के पीएम ने इस्तीफा दे दिया है और वहां राजनीतिक उथल-पुथल दिख रही है। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों में अफरातफरी मची है। पाउंड में 31 साल की ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई है। लेकिन ये शुरुआती और फौरी झटके हैं। ब्रिटेन इससे उबरेगा। हालात धीरे-धीरे पटरी पर आएंगे। क्योंकि ब्रिटेन और यूरोप अलग-थलग नहीं रह सकते। ब्रिटेन का 45 फीसदी बाजार यूरोपीय यूनियन के देशोें में है। ऐसे में दोनों का अलग रह कर काम नहीं चल सकता। राजनीतिक लोग इसका फायदा उठाने की कोशिश करेंगे। वो बयानबाजी करते रहेंगे। लेकिन पीपुल टु पीपुल कांटेक्ट बढ़ेगा और कारोबारी रिश्ते भी पटरी पर आएंगे।
ब्रिटेन दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। लिहाजा इस उथलपुथल का यूरोप और दुनिया के दूसरे हिस्से पर असर होना लाजिमी है। भारत भी इस असर से अछूता नहीं रहेगा। भारत की 800 कंपनियां ब्रिटेन में काम करती हैं और इनका सालाना टर्नओवर 26 अरब पाउंड का है। कई कंपनियों के मुख्यालय ब्रिटेन में है। ईयू से बाहर आने का फैसला कर चुके ब्रिटेन के नए कारोबारी माहौल में अब उन्हें भी नए सिरे से एडजस्ट करना होगा। कई कंपनियां जिनका लंदन बेस था, उन्हें अब ईयू के अलग-अलग देशों में बेस ढूंढना पड़ सकता है।
उन्हें अब ब्रिटेन और ईयू से अलग-अलग कारोबारी व्यवस्था कायम करनी होगी। कुल मिला कर इन कंपनियों की परिचालन लागत बढ़ जाएगी और इसका मुनाफे पर असर होगा। जाहिर है एडजस्ट करने में दिक्कत आएगी। हालांकि इस घटना से ब्रिटेन या यूरोपीय यूनियन के साथ भारत के राजनयिक रिश्तों में कोई खास फर्क नहीं आएगा। ब्रिटेन के साथ भारत के रिश्ते अच्छे रहे हैं और आगे भी यह सिलसिला बरकरार रहेगा। भारत यूरोपीय यूनियन और ब्रिटेन दोनों के लिए बड़ा बाजार है और इसकी अनदेखी मुश्किल है।
ब्रिटेन को इस फैसले से कुछ हद तक ज्यादा संप्रभुता हासिल हो जाएगी और वह कुछ स्वतंत्र कारोबारी फैसले कर सकता है। जैसे ब्रिटेन अब यूरोेपीय यूनियन की ओर से लगाए जा रहे अप्रत्यक्ष करों के बदले अपने हिसाब से टैक्स लगा सकता है। इससे यहां की व्यवस्था को सहूलियत हो सकती है।
हालांकि जहां तक ब्रिटेन के ईयू से अलग सामरिक लाइन लेने की बात है तो यह नहीं हो सकता। ब्रिटेन नाटो का सदस्य है और सामरिक मामलों में ब्रिटेन इससे बाहर नहीं जा सकता। हां वह कुछ हद तक सीमा पर नियंत्रण कायम कर सकता है। हर साल ब्रिटेन में तीन लाख लोग आ जाते हैं। आप्रवासियों का आना उसके लिए एक बड़ी समस्या है। स्पेन, पुतर्गाल या कमजोर अर्थव्यवस्था वाले यूरोपीय देशों के लोगों का ब्रिटेन आना जारी है और ये लगातार इसकी अर्थव्यवस्था पर बोझ बनते जा रहे हैं। लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। अब ब्रिटेन में बेहद दक्ष लोगों को ही आने की अनुमति मिलेगी। ऑस्ट्रेलिया की तरह यह बेहद दक्ष लोगों की एंट्री की ही इजाजत देगा।
राजनीतिक स्वार्थ साधने वाले कुछ लोगों का कहना है कि इससे एशियाई और कॉमनवेल्थ देशों के आप्रवासियों का फायदा होगा। लेकिन यह गलत है। ब्रिटेन में किसी भी तरह के आप्रवासियों के लिए अब बेहद कम जगह है। कॉमनवेल्थ देशों के आप्रवासियों के पक्ष में बात कर लोग अपना स्वार्थ साध रहे हैं।
कुछ लोगों का कहना है कि ब्रिटेन के बाद यूरोप के दूसरे देश भी ईयू से अलग होने का रास्ता अपना सकते हैं। कुछ देशों में इसका डर दिखाया जा रहा है और इसका राजनीतिक फायदा भी उठाया जा रहा है। फ्रांस, ऑस्ट्रिया और डेनमार्क में ऐसी मांगें उठी हैं। लेकिन ऐसा अभी संभव नहीं है। इसके लिए इन देशों में जनमत बनाना होगा और यहां के लोगों को एक लंबी प्रक्रिया से गुजरना होगा।
बहरहाल, इस घटना से यूरोपीय एकता का बड़ा सपना बिखर गया है। यूरोप की वृहद एकता की शुरुआत यूरो से हुई थी। लेकिन आज पूरे यूरोेप का एकीकरण का सपना ध्वस्त होता दिख रहा है। इस सपने पर यूरोपीय देशों के अपने स्वार्थ हावी हो गए। आर्थिक तौर पर मजबूत देशों को कमजोर देशों को बोझ उठाना गवारा नहीं था। नतीजतन एकता की एक बड़ी कोशिश की मौत हो गई।
लेखक विजय राना बीबीसी हिंदी सर्विस से जुड़े रहे हैं। यह टिप्पणी उनसे दीपक मंडल की बातचीत पर आधारित है।
Published By Rahul Sankrityayan