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ब्रिटेन का ब्रेक अप: कूटनीति के मोर्चे पर होगी भारत की अग्निपरीक्षा

ब्यूरो/ अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sat, 25 Jun 2016 05:04 AM IST
ब्रिटेन और ईयू से द्विपक्षीय संबंधों की विभिन्न मोर्चे पर नए सिरे से करनी होगी व्याख्या
ब्रिटेन और ईयू से द्विपक्षीय संबंधों की विभिन्न मोर्चे पर नए सिरे से करनी होगी व्याख्या
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आखिरकार ब्रिटेन के जनमत सर्वेक्षण के नतीजे ने साफ कर दिया कि 28 सदस्यों का संघ यूरोपीय यूनियन (ईयू) के सदस्यों की संख्या घट कर 27 रह जाएगी। ब्रिटेन में बीते कुछ वर्षों से आम जनमानस में जिस प्रकार ईयू के खिलाफ बयार बही थी, उससे जनमत सर्वेक्षण के नतीजे का अहसास पहले ही हो गया था। अब जबकि ब्रिटेन का ईयू से बाहर जाना तय है तो स्वाभाविक रूप से भारत पर इसका व्यापक कूटनीतिक  और राजनीतिक असर होगा। वैसे भी वैश्विक खुली अर्थव्यवस्था के इस युग में ऐसी घटनाओं का दुनिया पर असर पड़ना स्वाभाविक है।
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जहां तक भारत का सवाल है तो ईयू और ब्रिटेन से बेहतर और बहुआयामी संबंध होने के कारण इसका असर भी व्यापक होगा। भारत पर इस घटना के कूटनीतिक असर पर अपनी बात रखने से पहले हमें ब्रिटेन की सामने आई राय का ईयू देशों पर भविष्य में पड़ने वाले असर की भी विवेचना करनी होगी। क्योंकि ब्रिटेन की तरह अन्य सदस्य देश भी धीरे-धीरे अलग राह की ओर बढ़ सकते हैं। नीदरलैंड में शुरू हुई इस आशय की हलचल इसी बात का संकेत है।

जहां तक भारत पर राजनीतिक और कूटनीतिक असर की बात है तो हमें अपने देश से ईयू और ब्रिटेन के साथ द्विपक्षीय संबंधों पर ध्यान देना होगा। इसमें सबसे बड़ी बात कॉमनवेल्थ पार्टनरशिप पर नए सिरे से कूटनीतिक पहल करनी होगी। ब्रिटेन और ईयू से अपने द्विपक्षीय संबंधों को विभिन्न मोर्चे पर नए सिरे से व्याख्या करनी होगी। दरअसल हमारे कई द्विपक्षीय करार ईयू से हैं। अब जबकि ब्रिटेन इसका अंग नहीं होगा तो ऐसे कई मामलों की नई तरीके से व्याख्या की जरूरत होगी। ब्रिटेन और ईयू के अन्य देशों में विदेश मंत्रालय को नए कार्यालय स्थापित करने होंगे।

अब नई परिस्थिति में जरूरी नहीं कि अंतरराष्ट्रीय मसलों पर अब भी ईयू और ब्रिटेन की सोच एक तरह की हो। जाहिर तौर पर ऐसी स्थिति में भारत को खुद के हित में दोनों से अलग-अलग कूटनीतिक पहल की जरूरत होगी। मेरा मानना है कि ब्रिटेन के ईयू से अलग होने की घटना ईयू के अन्य देशों पर भी अलग-अलग प्रभाव छोड़ेंगे। ब्रिटेन की तर्ज पर कुछ और देश ईयू से अलग होने की पहल कर सकते हैं। चूंकि ईयू में ब्रिटेन का आर्थिक योगदान बहुत ज्यादा है और इसमें शामिल कई देशों की माली हालत ठीक नहीं है। इसमें शामिल आर्थिक रूप से मजबूत फ्रांस और जर्मनी में जल्द ही चुनाव होने के कारण ईयू से बाहर आने की सियासत तेज हो सकती है। जाहिर तौर पर ऐसी स्थिति आने पर भारत को कूटनीतिक तौर पर हर मोर्चे पर नए सिरे से पहल करनी होगी।

मेरे हिसाब से इस घटना का व्यापक असर ब्रिटेन सहित ईयू के अन्य देशों में नौकरी कर भारतीयों के भविष्य पर भी पड़ेगा। ब्रिटेन के आम लोगों की सोच प्रवासियों के लिए अच्छी नहीं है। ऐसे में घरेलू राजनीतिक दबाव में सरकारें प्रवासियों के प्रति सख्त रुख अपनाने के लिए घरेलू कानून को सख्त बनाएंगे। जाहिर तौर पर इसका असर वहां रहने वाले भारतीयों के रोजगार पर पड़ेगा। हां, भारत के लिए सकारात्मक पक्ष यह है कि वह ब्रिटेन के साथ द्विपक्षीय व्यापार के क्षेत्र में नये समझौते के जरिये लाभ हासिल कर सकता है। दरअसल, ब्रिटेन के चाहते हुए भी ईयू ने भारत की खुद के साथ मुक्त व्यापार संधि करने की इच्छा पूरी नहीं होने दी थी।

( शशांक शेखर, पूर्व विदेश सचिव की हिमांशु मिश्र से बातचीत पर आधारित )
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टूट गया यूरोपीय एकता का सपना

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