ELECTION SPECIAL: पीतल नगरी मुरादाबाद, नोटबंदी और मुस्लिम वोटर
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नोटबंदी की मुहिम उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को किस तरह से प्रभावित कर रही है इसका अंदाजा मुरादाबाद के पीतल के एक कारखाने के मालिक अख्तर अली और उनके साथियों के विचारों से जाहिर होता है। वो कहते हैं, "वोट तो शायद हम वैसे भी समाजवादी पार्टी को देते, लेकिन नोटबंदी की मार ने हमारे इस इरादे को पुख्ता कर दिया है। "पीतल के 6 हजार करोड़ रुपए सालाना कारोबार वाले इस उद्योग का आधा माल विदेश भेजा जाता है। लेकिन अब धंधा मंदा है। पीतल नगरी में नोटबंदी शब्द शायद किसी गाली से कम नहीं।
यहां के कारीगर और कारखानों के मालिक इस शब्द को जुबान पर लाना नहीं चाहते । अख्तर अली का दावा है कि नोटबंदी के कारण उनका धंधा 90 फीसदी तक कम हो गया है। वो कहते हैं, "हमारा कारोबार कैश पर होता है। नोटबंदी के कारण लेबर नहीं आता, कई मशीनें बंद करनी पड़ीं। मजबूरी में बच्चों को कारखाने में लगाना पड़ा। "अख्तर अली का दावा बढ़ा-चढ़ा कर बयान देने की एक कोशिश हो सकती है, लेकिन इस हकीकत से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि पीतल उद्योग के इस गढ़ में नोटबंदी की मार का असर हर कारखाने पर महसूस किया जा सकता है।
नोटबंदी कैसे कर रही पीतल उद्योग को प्रभावित
मुरादाबाद में मकबरा कहे जाने वाले मोहल्ले में पीतल का सामान बनाने वाले कारखाने घर-घर में लगे हैं। तंग गलियों और पुराने मकानों से लगातार मशीनों के चलने की आवाजें आती हैं। लगभग सभी घरों के बाहर कारीगर पीतल के सामानों में नक्काशी करते या उन्हें तराशते नजर आते हैं। किसी कारखाने में कच्चे पीतल को पिघलाने का काम होता है तो किसी में पीतल के बर्तन या कैंडल होल्डर को तराशने का काम चल रहा रहा होता है और कहीं उन्हें चमकाने का। मुगलों के दौर में शुरू हुए इस उद्योग में उत्पादन का काम मुस्लिम कारीगरों पर टिका हुआ है जो पहले से ही गरीबी और निरक्षरता के शिकार हैं।
अब अख्तर अली का उदाहरण ही ले लीजिए। कहने को वो एक कारखाने के मालिक हैं, लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है।उस पर से उनके भाई और बच्चे भी एक ही कारखाने की कमाई पर निर्भर करते हैं। अली संकोच करते हुए आहिस्ता से कानों में बताते हैं कि वो सात बेटों और तीन बेटियों के बाप हैं। "मैं पुराने ज़माने का हूं ना। मेरे बच्चों के बच्चे कम हैं।"उनके कारोबार में उनके सभी बेटे शामिल हैं। इसे आर्थिक मामलों के माहिर छिपी हुई बेरोजगारी कहते हैं।
उनके भाई और भाई के बेटे भी उनके कारखाने से जुड़े हैं।वो कहते हैं, "मैंने कुछ खास पढ़ाई नहीं की। बड़े बेटों की पढ़ाई अधिक नहीं हुई। छोटे बच्चे पढ़ रहे हैं, लेकिन वो भी कहां जाएंगे?"इसमें उनकी मानसिकता का भी दोष है। वो खुद स्वीकार करते हैं कि उनकी मानसिकता ऐसी है कि वो किसी और के लिए काम नहीं कर सकते। ये उनका पुश्तैनी पेशा है। इसीलिए निजी या सरकारी नौकरियों की उन्हें जरूरत महसूस नहीं होती । इसीलिए उत्तर प्रदेश में बढ़ती हुई बेरोजगारी उनके लिए चिंता का विषय नहीं हैं। सियासी पार्टियों को इसका अंदाजा है।
रोजगार नहीं ऋण दिलाने का वादा कर रहे उम्मीदवार
अगले विधानसभा चुनाव में मुरादाबाद शहर से खड़े उम्मीदवार उन्हें या मुस्लिम युवाओं को रोजगार देने का वादा नहीं कर रहे हैं।असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के उम्मीदवार हाजी शहाबुद्दीन बीबीसी से कहते हैं कि वो चुने गए तो शहर में परिवर्तन लाएंगे।लेकिन समाजवादी और कांग्रेस पार्टी गठबंधन पीतल उद्योग से जुड़े कारखानों के मालिकों और कारीगरों को बेहतर सुविधाएं दिलाने की बात कर रहा है।सपा के चुनावी मुहिम में उद्योग से जुड़े लोगों को कम दर पर ऋण दिलाने के वादे किए जा रहे हैं।
मुरादाबाद की शहर और देहात की दो विधानसभा सीटों में हर तरफ अखिलेश यादव और राहुल गांधी की तस्वीरें पोस्टरों पर छाई हुई हैं।पीतल नगरी में साइकिल और पंजे के निशान जगह-जगह नजर आते हैं।भाजपा की उपस्थिति फीकी और कमजोर लगती है। ऐसा महसूस होता है पार्टी यहां दम नहीं लगा रही है।पीतल नगरी के निवासी कहते हैं कि अगर मुसलमान मतदाताओं का वोट न बंटा तो मुरादाबाद की दो सीटों पर उनका फैसला निर्णायक होगा। मुस्लिम वोटों के बंटवारे का डर अख्तर अली और उनके साथियों को परेशान कर रहा है।