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High Court: न्याय तक पहुंच हर नागरिक का मौलिक अधिकार, अपीलीय देरी माफ की जा सकती है, हाईकोर्ट का अहम फैसला

Thu, 14 Sep 2023 05:46 PM IST
नितिन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई Published by: नितिन गौतम Updated Thu, 14 Sep 2023 05:46 PM IST
सार

खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि एनआईए अधिनियम को भी अन्य कानूनों के साथ जोड़कर पढ़ा जाना चाहिए और यह अपने आप में पूर्ण संहिता नहीं है। 

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bombay high court said access to justice fundamental right delay in filing appeal in nia cases accepted
बॉम्बे हाईकोर्ट (फाइल फोटो) - फोटो : पीटीआई

विस्तार

बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक अहम टिप्पणी में कहा है कि न्याय तक पहुंच हर नागरिक का मौलिक अधिकार है और इसे भ्रामक या संयोग जैसे विषयों के अधीन नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने कहा कि अपीलीय अदालतें, देरी को माफ कर सकती हैं और अनिवार्य 90 दिनों से अधिक समय में दायर अपीलों पर भी सुनवाई कर सकती हैं। 
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क्या है मामला
एनआईए द्वारा गिरफ्तार फैजल मिर्जा ने बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर कर, जमानत के लिए अपील दायर करने में हुई 838 दिनों की देरी को माफ करने की मांग की थी। बता दें कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी अधिनियम की धारा 21(5) के तहत आदेश की तारीख से 90 दिनों के भीतर ही अपील की जा सकती है। इसके बाद दायर अपील पर विचार नहीं किया जाएगा। फैजल मिर्जा ने विशेष एनआईए अदालत द्वारा उसकी जमानत याचिका खारिज करने के मार्च 2020 के आदेश के 838 दिन बाद अब आदेश को चुनौती देते हुए अपील दायर की है। जिस पर जस्टिस रेवती मोहिते डेरे और जस्टिस गौरी गोडसे की खंडपीठ ने सुनवाई की। 
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अपील मुकदमे का विस्तार
खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि एनआईए अधिनियम को भी अन्य कानूनों के साथ जोड़कर पढ़ा जाना चाहिए और यह अपने आप में पूर्ण संहिता नहीं है। पीठ ने कहा कि 'निर्दोषता का अनुमान मानव का अधिकार है। इस सिद्धांत का आधार भारतीय न्यायशास्त्र है। निर्दोषता का अनुमान, आरोपी के लाभ के लिए है। कोर्ट ने कहा कि अपील मुकदमे का विस्तार है। अपील दायर करना एक मौलिक अधिकार है और इस अधिकार को भ्रामक या संयोग के अधीन नही किया जा सकता।'
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एनआईए के रुख से कोर्ट ने जताई नाराजगी
उच्च न्यायालय ने एनआईए के विरोधाभासी रुख पर भी नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि आरोपी द्वारा दायर याचिका पर एजेंसी ने कहा है कि देरी को माफ नहीं किया जा सकता लेकिन अन्य हाईकोर्ट्स में एजेंसी ने खुद ही याचिका दायर कर अपने द्वारा दायर अपील में देरी के लिए माफी की मांग की थी। हाईकोर्ट ने कहा न्याय तक पहुंच एक मौलिक अधिकार है और इसे कमजोर नहीं किया जा सकता। अगर फैसले के 90 दिनों के भीतर अपील करने के प्रावधान को जरूरी माना जाता है तो यह न्याय का मखौल उड़ाने जैसा होगा। 
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