बीजेपी को नोटबंदी ने नहीं कर्जमाफी के वादे ने जिताया यूपी: शिवसेना
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अपने पुराने सहयोगी भाजपा के साथ तनावपूर्ण संबंधों की दूरियां बढ़ाने वाले इस लेख में शिवसेना प्रमुख ने भाजपा और मोदी पर निशाना साधा है। इसी का नतीजा रहा है कि महाराष्ट्र में हुए हालिया स्थानीय निकाय चुनाव में दोनों दलों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था।
रविवार को मुखपत्र के संपादकीय में कहा गया है कि यूपी में भाजपा को पूर्ण बहुमत के पीछे चुनाव अभियान के दौरान प्रधानमंत्री द्वारा किसानों की कर्जमाफी जैसे वादे हैं, न कि यह नोटबंदी के फैसले का असर है। इसका फायदा भाजपा को यूपी और उत्तराखंड दोनों राज्यों में मिला। हालांकि पंजाब में अकाली से गठबंधन और गोवा में परिकर जैसे नेता होने के बावजूद भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा।
'यूपी में अखिलेश-राहुल के बचकाने नेतृत्व को जनता ने नकार दिया'
पत्र में कहा गया है कि मणिपुर में भी भाजपा बहुमत के काफी दूर खड़ी नजर आई। इन राज्यों के मतदाताओं ने भाजपा को नकार दिया जबकि भाजपा ने यहां भी यूपी जैसा ही चुनाव अभियान चलाया था।संपादकीय में राममंदिर के निर्माण को लेकर भी सवाल उठाया गया और पूछा गया है कि क्या भाजपा राम मंदिर का निर्माण कराएगी। कब्रिस्तान और श्मशान के मुद्दे को लेकर वोटों के ध्रुवीकरण और हिंदुत्व कार्ड के इस्तेमाल पर भी लेख में मोदी को आडे़ हाथों लिया गया है।
मोदी पर चुनाव अभियान के दौरान समान नागरिक संहिता और राम मंदिर जैसे मुद्दे को भी भुनाने की बात कही गई है। इसके साथ ही यूपी नेतृत्व की तुलना बिहार में नीतीश कुमार और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी से करते हुए कहा गया है कि यूपी में अखिलेश व राहुल के बचकाने नेतृत्व को जनता ने नकार दिया। यादव और दलितों का वोट भाजपा को जाना अखिलेश के लिए सीख है। हालांकि मोदी और अमित शाह की सोशल इंजीनियरिंग के चलते भाजपा को यूपी में दो तिहाई सीटों की जीत के साथ करिश्माई कामयाबी मिली।