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BJP vs AAP: क्या केजरीवाल को लगेगा बिजली सरचार्ज का झटका, भाजपा ने फंसाया

Fri, 12 Jul 2024 08:16 PM IST
Amit Sharma Digital अमित शर्मा
Updated Fri, 12 Jul 2024 08:16 PM IST
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सार
भाजपा का आरोप है कि अरविंद केजरीवाल सरकार एक तरफ तो लोगों को मुफ्त बिजली देने का ढिंढोरा पीटती है, जबकि सच्चाई यह है कि वह बिजली पर सरचार्ज में बढ़ोतरी कर लोगों को महंगी बिजली उपलब्ध करा रही है।
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BJP protests against increase in electricity prices in Delhi
बिजली की बढ़ी कीमतों के विरोध में प्रदर्शन करते भाजपा कार्यकर्ता - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अरविंद केजरीवाल की राजनीतिक यात्रा में बिजली और पानी के मुद्दों का बहुत बड़ा योगदान था। उन्होंने अपने आंदोलन के दिनों में तत्कालीन शीला दीक्षित सरकार पर बिजली कंपनियों से सांठगांठ कर लोगों को महंगी बिजली देने का आरोप लगाया। जनता को मुफ्त बिजली देने के लोकलुभावन नारे के साथ वे सत्ता में आए। लेकिन जब से दिल्ली में बिजली की कीमतों में भारी वृद्धि हुई है, भाजपा ने केजरीवाल सरकार को घेर लिया है। 



भाजपा का आरोप है कि अरविंद केजरीवाल सरकार एक तरफ तो लोगों को मुफ्त बिजली देने का ढिंढोरा पीटती है, जबकि सच्चाई यह है कि वह बिजली पर सरचार्ज में बढ़ोतरी कर लोगों को महंगी बिजली उपलब्ध करा रही है। दिल्ली भाजपा ने शुक्रवार को बिजली की कीमतों में भारी बढ़ोतरी के विरोध में जमकर प्रदर्शन किया और सरकार से इस बढ़ोतरी को वापस लेने की मांग की। आगामी दिल्ली विधानसभा चुनाव को देखते हुए भाजपा ने जिस तरह का आक्रामक रुख अपनाया है, आम आदमी पार्टी को इसका बड़ा नुकसान हो सकता है। 


आरोप- 

  •  दिल्ली भाजपा अध्यक्ष वीरेंद्र सचदेवा ने आरोप लगाया है कि 2015 में PPAC मात्र 1.7 फीसदी था। इसे बढ़ाकर अब 37 फीसदी कर दिया गया है। BSES राजधानी के नए प्रस्ताव के लागू होते ही यह लगभग 46 फीसदी हो जायेगा। 2015 में पेंशन सरचार्ज 1 फीसदी था। आज यह 7.5 फीसदी कर दिया गया है। बिजली मीटर की कीमत और लोड अधिभार केजरीवाल सरकार के दस साल में तीन गुना तक बढ़ा दिए गए हैं।
  •  2011 में जब शीला दीक्षित सरकार ने बिजली बिल बढ़ाया था, तब केजरीवाल ने जमकर विरोध किया। इससे दबाव में आई शीला दीक्षित सरकार ने बिजली बिल बढ़ाने की जगह सरचार्ज लगाने की व्यवस्था की। यह PPAC दर 1.5 फीसदी रखी गई। लेकिन BJP ने इसका विरोध किया। कुछ नागरिक संगठन कोर्ट भी गये।
  • 2014 में तत्कालीन ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल ने पॉवर डिस्कॉम से बातचीत कर PPAC पर रोक लगाई। अगस्त 2014 से सितंबर 2015 तक दिल्ली में बिजली बिलों में PPAC नहीं लगा। लेकिन भाजपा के अनुसार, केजरीवाल सरकार ने बाद में फिर से PPAC लागू किया (क्योंकि बिजली कम्पनियां उत्पादन लागत बढ़ने के आधार पर बिजली बिल में बढ़ोतरी करने की मांग कर रही थी)।
  • भाजपा का आरोप है कि राजनीतिक लाभ को देखते हुए अरविंद केजरीवाल सरकार ने प्रति यूनिट बिजली के मूल्य नहीं बढ़ाये जो लोगों को प्रत्यक्ष तौर पर दिखाई देता है, लेकिन पिछले दरवाजे से बिजली पर PPAC लागू करवा दिया। इससे बिजली कंपनियों की चांदी हो गई, लेकिन लोगों के लिए बिजली महंगी होती चली गई। 
  • आरोप है कि केजरीवाल ने दिल्ली में बिजली टैरिफ को तय करने के लिए PPAC को बिजनेस रेगुलेशन प्लान का हिस्सा बना कर इसे कानूनी मान्यता दे दी। यानी अब कानूनन बिजली बिल में PPAC लगाने का विरोध नहीं किया जा सकता। यह बिजली कंपनियों का अधिकार बन गया है। इसे समाप्त करने के लिए भी सरकार के स्तर पर कानूनों में बदलाव करना पड़ेगा। 

कहां फंसा है पेंच? 
दरअसल, PPAC लागू करने में प्रावधान यह कर दिया गया है कि गर्मियों में जब बिजली की खपत बहुत अधिक बढ़ जाती है, बिजली कम्पनियों को अचानक अतिरिक्त बिजली खरीदनी पड़ती है जिसके लिए उन्हें अतिरिक्त कीमत चुकानी पड़ती है। इसके लिए इस समय में बिजली कंपनियां बिजली के सरचार्ज PPAC में बढ़ोतरी कर इस अतिरिक्त लागत को वसूल सकती हैं।  लेकिन भाजपा का कहना है कि यह एक छलावा है। यदि आगामी आवश्यकता को देखते हुए पहले ही अतिरिक्त बिजली खरीद ली जाए, तो उपभोक्ताओं पर यह भार नहीं पड़ेगा। कई अन्य राज्य इसी व्यवस्था के अंतर्गत आने वाली आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए पहले ही बिजली की खरीद कर अतिरिक्त भार से बचती है। 

AAP का जवाब
दिल्ली सरकार में कैबिनेट मंत्री आतिशी मार्लेना ने कहा कि भाजपा दुष्प्रचार कर रही है। बिजली बिल में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई है। गर्मियों में लगने वाला PPAC अतिरिक्त भार है, जो केवल तीन महीने के लिए लगाया जाता है। उन्होंने भाजपा पर बिजली के मुद्दे का राजनीतिकरण करने का आरोप लगाया। 

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