दलित नेता के लिए लड़ने वाले भाजपा सांसद रहे हैं सबसे बड़े दलित दंगे के आरोपी
- पनवारी दंगों के मुख्य आरोपी रहे हैं चौ. बाबूलाल
- बाबूलाल ने ही किया था जाटों की भीड़ का नेतृत्व
- तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव भी पहुंचे थे पनवारी
- दंगों में कई लोगों की हो गई थी मौत
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आगरा में विहिप नेता अरुण माहौर की मौत के बाद उन्हें श्रद्धाजंलि देने के लिए हुई सभा में जिस समय भाजपा सांसद और केन्द्रीय मंत्री रामशंकर कठेरिया दुश्मनों
को सबक सिखाने की बात कर रहे थे उसी दौरान उनके मंच पर बैठे फतेहपुर सीकरी के सांसद चौधरी बाबूलाल भी दलितों के हक के लिए संघर्ष का आह्वान कर
रहे थे।
एक दलित नेता की मौत पर सांसद बाबूलाल ने भी प्रदेश सरकार और विपक्षियों को जमकर घेरा, बाद में वह यहां तक भी बोल गए कि हत्या का बदला न लिया
जाए तो क्या हत्यारों की आरती उतारी जाए। उन्हीं भाजपा सांसद बाबूलाल के बारे में खुलासा हुआ है कि उप्र में दलितों के खिलाफ हुए सबसे बड़े दंगों में वह
मुख्य आरोपी रहे हैं।
अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस द्वारा दी गई खबर के अनुसार पुलिस रिकार्ड में जून 1990 में दलितों के खिलाफ हुए दंगों में बाबूलाल ने जाटों की उस भीड़ का
इकट्ठा किया था जिसने पनवारी गांव में दलितों के घर में चल रहे विवाह समारोह पर हमला किया। इस दौरान भड़के दंगों में कई लोगों की मौत हो गई थी।
गांव में दलितों के 87 परिवार रहते थे, उनमें से एक को छोड़कर बाकी को जाटों द्वारा गांव से जबरन बाहर निकाल दिया गया था। जाटों की उस भीड़ को बाबूलाल
ही उकसा रहे थे उन्हीं के हाथ में भीड़ का नेतृत्व था। उस समय बाबूलाल अछनेरा ब्लॉक के प्रमुख थे और तेजी से एक जाट नेता के तौर पर पहचान बना रहे
थे।
भारत सिंह कर्दम, जिनकी छोटी बहन मुंद्रा की शादी 21 जून 1990 को पनवारी गांव में होनी थी, उस वाक्ये को याद करते हुए सिहर जाते हैं। कर्दम के अनुसार
बाबू लाल आज दलितों के लिए चिंता कर रहे हैं वो पनवारी दंगों के मुख्य आरोपी रहे हैं।
उन्होंने ही लोगों को यह कहकर भड़काया था कि दलितों की बारात जाट कालोनी से नहीं गुजर सकती इससे जाटों का अपमान होगा। कर्दम आरोप लगाते हैं कि
उनकी मंशा जानकर हमने अपना रास्ता बदलने का निर्णय ले लिया था लेकिन अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूरी करने के लिए उन्होंने गांव को दंगों की आग में
झोंक दिया।
जाटों के मोहल्ले से दलितों की बारात निकालने पर भड़के थे दंगे
वो बताते हैं कि भारी सुरक्षा के बावजूद जाटों ने शादी की बारात पर हमला किया, जिससे पूरे क्षेत्र में दंगा भड़क उठा। पनवारी गांव में दलितों के घर जला दिए गए
जिसकी आग गांव से बाहर निकलकर आगरा और नजदीकी जिलों तक पहुंच गई। काफी लोग उन दंगों में मारे गए और आगरा को कई दिनों तक कफ्र्यू का दंश
झेलना पड़ा। हालांकि इस संबंध में पक्ष जानने के लिए बाबूलाल तो उपलब्ध नहीं हो सके लेकिन उनके निजी सहायक ने बताया कि वह अस्वस्थ हैं।
वहीं कर्दम आगे आरोप लगाते हैं कि हथियारबंद जाटों ने पूरी बारात को घेर लिया, उन्हें देखकर हम डर गए थे। मजबूरी में हमें वहां से भागना पड़ा और हमारा
सबकुछ वहीं छूट गया।
कर्दम आगरा के एससी/एसटी कोर्ट में आज भी पीड़ितों की ओर से उस मुकदमे की पैरवी कर रहे हैं। वो अखबारों की कटिंग और गांव में जले हुए दलितों के घरों
की तस्वीरें दिखाते हैं। उनमें से एक तस्वीर विवाह समारोह में मेहमानों के लिए बने पकवानों की है और दूसरी जाटव कालोनी में मरे पड़े मवेशियों की।
उस हिंसा में दलित बिरादरी की रमाबाई सोनकर की भी उस समय मौत हो गई थी जब वह जाटों को रोकने का प्रयास कर रही थी। आज तक उसके शव का पता
नहीं चल सका है।
कर्दम ने कोर्ट में यह दावा किया था कि उस दंगे के मुख्य आरोपी बाबूलाल ही थे। पनवारी दंगों की विभिषिका का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि
तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी तक को भी गांव में आना पड़ा था।
बाबूलाल ने किया था जाटों की भीड़ का नेतृत्व
हालांकि हिंसा से भयभीत दलितों ने सुरक्षित पनाहगाह के लिए पनवारी गांव और आसपास के इलाके को छोड़ दिया था। उस दंगे में अपना घर गंवा चुके मांगे
लाल बताते हैं कि उस समय ज्यादातर लोग दिहाड़ी मजदूरी करने वाले थे, जाटों ने हमारे घरों में आग लगा दी।
वह सबकुछ बाबूलाल की वजह से हुआ। मांगे लाल अब महल गांव में रहते हैं। मांगेलाल बताते हैं कि जाटों ने बसों से खींचकर खींचकर हमारे लोगों को मारा
था। कर्दम के अनुसार उस समय प्रशासन ने सभी पीड़ितों को घर देने का वादा किया था लेकिन आज तक किसी को घर उपलब्ध नहीं करवाया गया। दूसरी ओर चौधरी
बाबूलाल ने रविवार को अरुण महौर की श्रद्धाजंलि सभा में दावा किया था कि उन्हें विभिन्न मामलों में तीन बार रासुका का सामना करना पड़ा था।
उनमें से एक 1984 में विजेन्द्र सिंह की हत्या के मामले में थी। जिसमें हाइकार्ट से उन्हें बेल मिली थी। इसके अलावा 1993 में विधानसभा चुनावों में फतेहपुर
सीकरी में एक बूथ ऑफिसर को धमकाने पर भी उन्हें रासुका का सामना करना पड़ा था।
हालांकि लोकसभा चुनावों के दौरान भी बाबूलाल उस समय विवादों में आ गए थे जब शमशाबाद में हुए झगड़े के बाद उन्होंने प्रशासन को पनवारी कांड दोहराने
की धमकी दे डाली थी।