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स्मरण भीष्म साहनीः आम आदमी का लेखक

Mon, 08 Aug 2016 01:26 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Mon, 08 Aug 2016 01:26 PM IST
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Birthday of Bhism Shahni

पन्द्रह डाउन गाड़ी के छूटने में दो –एक मिनट की देर थी। हरी बत्ती दी जा चुकी थी और सिगनल डाउन हो चुका था। मुसाफिर अपने–अपने डिब्बों में जाकर बैठ चुके थे, तभी दो फटेहाल औरतों में हाथापाई होने लगी। एक औरत दूसरी की गोद में से बच्चा छीनने की कोशिश करने लगी और बच्चेवाली औरत एक हाथ से बच्चे को छाती से चिपकाए दूसरे से उस औरत के साथ जूझती हुई, गाड़ी में चढ़ने की कोशिश करने लगी ।

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“छोड़, तुझे मौत खाए, छोड़, गाड़ी छूट रही है... ।”
“नहीं दूंगी, मर जाऊंगी तो भी नहीं दूंगी....।

भीष्म साहनी की चर्चित रचना माता–विमाता की यह पंक्तियां उनकी लेखनी को बयां करने के लिए काफी हैं। भीष्म साहनी को यूं ही प्रेमचंद की पंक्ति का कथाकार नहीं कहा जाता। उनकी हर रचना में आम आदमी की पीड़ा और उसका संघर्ष झलकता है, शायद वो जो उन्होंने शुरूआती वर्षों में स्वयं झेला। पाकिस्तान के रावलपिंडी में 8 अगस्त 1915 को पैदा हुए भीष्म साहनी का आज जन्मदिवस है। 
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लाहौर के पंजाब विश्वविद्यालय से पीएचडी करने वाले बलराज साहनी यूं तो जीवन भर शिक्षण और साहित्य साधना ही करते रहे लेकिन कभी व्यापार में भी हाथ आजमाया था। बात न बनी तो विभाजन के बाद भारत आ गए। यहां आकर समाचार पत्रों में लिखने का काम मिला लेकिन मन रमा भारतीय जन नाट्स संघ (इप्टा) के साथ। शायद बड़े भाई बलराज साहनी की तरह उन्हें भी अभिनेता बनने का चस्का लग चुका था। हालांकि यह काम भी ज्यादा दिन रास नहीं आया और
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फिर वापस शिक्षण और लेखन में लौट आए। 

दिल्‍ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बने, लेकिन जल्द ही रूस की राजधानी मास्को में विदेशी भाषा प्रकाशन में अनुवादक का काम मिल या। यहां रहकर ही भीष्म साहनी के साहित्य लेखन ने उड़ान भरनी शुरू की। रूस में उन्होंने टालस्टॉय और आस्ट्रोवस्की जैसे महान लेखकों की किताबों का हिंदी में अनुवाद किया। जिससे उन्हें पहचान मिली। 

प्रेमचंद की प्रथा के अग्रणी लेखक थे भीष्म साहनी

Birthday of Bhism Shahni

रूस से वापस लौटे तो पूरी तरह लेखन में रम गए। इसके बाद उनकी किताब तमस ने विभाजन की त्रासदी को जिस प्रकार बयां किया उसने लोगों को अंदर तक झकझोर दिया। 

भीष्म साहनी ने जिस तरह से आम आदमी के दर्द को कागज पर उकेरा उसने उन्हें प्रेमचंद की परंपरा का अग्रणी लेखक बना दिया। अपने लेखन के द्वारा उन्होंने ताउम्र मानवीय मूल्यों की हिमायत की। वामपंथी विचारधारा से जुड़े साहनी ने कभी उसको अपनी लेखनी पर हावी नहीं होने दिया। 

उनकी कहानियां चीफ की दावत, ओ हरामजादे, फैसला, चीललें, झूमर और अमृतसर आ गया है में आम आदमी के संघर्ष और जद्दोजहद का जो शानदार वर्णन किया गया है शायद ही ऐसा पहले किया गया हो। उनके उपन्यास झरोखे, कड़ियां, तमस, बसंती, मय्यादास की माड़ी, कुंतो और नीलू नीलिमा नीलोफर में भी उन्होंने इसे जारी रखा। 

बड़े भाई बलराज साहनी के कदमों पर चलते हुए उन्होंने कुछ फिल्मों में भी काम किया। जिनमें मोहन जोशी हाजिर हो, उनके उपन्यास पर बनी फिल्म तमस, लिटिल बुद्धा और मिस्टर एंड मिसेज अय्यर प्रमुख हैं। साहित्य में उनके योगदान को देखते हुए केंद्र सरकार ने उन्हें पदभूषण और साहित्य अकादमी सम्मान से भी सम्मानित किया। 

इसके अलावा विदेश में उन्हें एफ्रो एशियन राइटर्स असोसिएशन का लोटस अवार्ड और 1983 में सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड भी मिला। साल 11 जुलाई 2003 में साहित्य का यह चितेरा हमसे दूर हो गया।

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