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चारा घोटाला: 1985 से चल रहा था घोटाले का खेल, 950 करोड़ रुपये की हुई थी हेराफेरी

Sun, 24 Dec 2017 10:23 AM IST
टीम डिजिटल, अमर उजाला
टीम डिजिटल, अमर उजाला Updated Sun, 24 Dec 2017 10:23 AM IST
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Bihar Fodder Scam: CAG indicated about irregularities of Bihar Government, It stats 1985

बिहार के साथ-साथ देश की राजनीति में तूफान खड़ा करने वाला चारा घोटाला हालांकि 1996 में उजागर हुआ लेकिन इसके 11 साल पहले यानी 1985 में ही भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने राज्य के कोषागारों से फर्जी निकासी की ओर इशारा किया था, लेकिन तब किसी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया और जब बाद में इसका घड़ा फूटा तो पता चला कि यह खेल दो दशकों से चल रहा था और इसमें लगभग 950 करोड़ रुपये की हेराफेरी की गई, जिसमें नेताओं और अधिकारियों से लेकर व्यापारियों ने जमकर चांदी काटी। सरकारी खजाने की इस लूट को भ्रष्टाचार के माफिया राज का पहला उदाहरण माना जाता है।

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इस घोटाले में पशुधन के फर्जी आंकड़े दिखाकर उनके लिए चारा, दवाइयों और पशुपालन के उपकरण की खरीद के फर्जी बिल पेश किए गए और सरकारी खजाने से अवैध निकासी की गई। भारत के तत्कालीन सीएजी टीएन चतुर्वेदी ने बिहार के कोषागारों और विभागों से हर महीने का लेखाजोखा मिलनेे में हो रही देरी की ओर तब के मुख्यमंत्री चंद्रशेखर सिंह का ध्यान आकृष्ट कराया था।
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सीएजी ने मुख्यमंत्री को आगाह भी किया था कि इस देरी के पीछे सरकारी खजाने में हेराफेरी एक वजह हो सकती है। सिंह के बाद भी राज्य के कई मुख्यमंत्रियों को इस बारे में चेतावनी दी गई लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ क्योंकि इस खेल में नेता, अधिकारी और बिजनेसमैन सभी शामिल थे।

बिहार पशुपालन संगठन ने भी खोली थी पोल
बिहाल पशुपालन संगठन ने भी 1985 में ही एक संवाददाता सम्मेलन के जरिए पशुपालन माफिया की पोल खोल दी थी। इसके बाद संगठन की कार्यकारी समिति को ही बदल दिया गया और डॉ. दिनेश्वर शर्मा को उसका महासचिव बना दिया गया। शर्मा बाद में इस घोटाले में आरोपी बनाए गए। उन पर 300 करोड़ रुपये की हेराफेरी का आरोप लगा। इससे पता चलता है कि पशुपालन माफिया कितना ताकतवर था।

इंस्पेक्टर विधुभूषण द्विवेदी ने 1992 में इस घोटाले को उजागर किया था

Bihar Fodder Scam: CAG indicated about irregularities of Bihar Government, It stats 1985
lalu prasad yadav
विधुभूषण द्विवेदी का क्यों हुआ तबादला
सीएजी के बाद राज्य के भ्रष्टाचार रोधी सतर्कता विभाग के इंस्पेक्टर विधुभूषण द्विवेदी ने 1992 में इस घोटाले पर विभाग के महानिदेशक जी. नारायण को अपनी रिपोर्ट सौंपी जिसमें मुख्यमंत्री के भी शामिल होने की बात कही गई थी। इस पर कोई कार्रवाई करने के बजाय राज्य सरकार ने द्विवेदी को सतर्कता विभाग से हटाकर किसी और विभाग में भेज दिया। हालांकि झारखंड हाईकोर्ट के आदेश पर उन्हें बहाल कर दिया गया और बाद में वे इस घोटाले के गवाह भी बने।

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पश्चिमी सिंहभूम में छापे से खुला मामला
1995 आते-आते राज्य में इस घोटाले की इतनी चर्चा हो गई कि सरकार को सक्रियता दिखानी पड़ी। राज्य के सभी जिलाधिकारियों को छापे की कार्रवाई करने का आदेश दिया गया। ऐसे ही एक छापे में पश्चिमी सिंहभूम के तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर अमित खरे ने चाईबासा ट्रेजरी पर छापा मारकर ढेर सारे दस्तावेज बरामद किए जिनसे घोटाले की बू आ रही थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में इसकी जांच के लिए एक जनहित याचिका दायर की गई और शीर्ष अदालत के आदेश पर पटना हाईकोर्ट ने 1996 में यह मामला सीबीआई को सौंप दिया। उसके बाद जो हुआ वह इतिहास है।
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