Bihar Election Analysis: नतीजों को यूं समझिए... एनडीए की एकजुटता, सोशल इंजीनियरिंग, महिलाओं का भरपूर समर्थन
बिहार चुनाव 2024 में एनडीए को ऐतिहासिक जीत मिली। जानें कैसे एकजुटता, सोशल इंजीनियरिंग, महिलाओं का समर्थन, मोदी-नीतीश फैक्टर और मजबूत प्रबंधन ने एनडीए को 202 सीटों तक पहुंचाया। पूरी रिपोर्ट पढ़ें...
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विस्तार
बिहार की जनता ने विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सुनामी ला दी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अनुभवी जोड़ी का ऐसा जादू चला कि एनडीए के पांच दलों को 202 सीटें मिल गईं, जो पिछले तीन चुनाव का रिकॉर्ड है। इससे पहले 2010 में भाजपा-जदयू गठजोड़ को 206 सीटें मिली थीं। 243 सदस्यीय विधानसभा में विपक्षी महागठबंधन सिर्फ 35 सीटों पर सिमट गया।
सबसे खास बात है, भाजपा का विधानसभा में सबसे बड़ा दल बनना। राज्य के इतिहास में पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था। भाजपा के 89 विधायक जीते हैं, जबकि दूसरे नंबर पर जनता दल (यू) है, जिसके 85 उम्मीदवार जीत हासिल करने में सफल रहे। चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के 19 उम्मीदवार जीते। जीतन राम मांझी की हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) के छह में 5 और उपेंद्र कुशवाहा के राष्ट्रीय लोकतांत्रिक मोर्चा के 6 में 4 उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की।
1. एकजुटता व सौहार्दपूर्ण सीट बंटवारा, पूरे चुनाव पर निगरानी
चुनाव एनडीए ने चुनाव से बहुत पहले ही सौहार्दपूर्ण तरीके से सोट बंटवारा किया। भाजपा-जदयू ने 101-101 सीटों पर लड़ने का फैसला किया। लोजपा (रामविलास) के खाते में 29, हम (एस) के खाते में छह व आरएलएम के खाते में पांच सीटें गई। सुनिश्चित किया गया कि हर पार्टी उन क्षेत्रों में लड़े, जहां उसकी जमीनी स्तर पर मजबूत उपस्थिति और चुनावी अपील हो। इससे वोटों का बंटवारा कम हुआ। जीतनराम मांझी जैसे नेताओं ने खुले तौर पर पीएम मोदी और गठबंधन के प्रति अटूट समर्थन की घोषणा की, जिससे एकता का परिचय मिला। गृह मंत्री अमित शाह ने खुद पूरे चुनाव पर निगरानी रखी। नाराज नेताओं-कार्यकर्ताओं को मनाया, बागियों को बैठवाया।
2. जंगल राज का डर फिर से उभरा
पीएम मोदी समेत भाजपा के शीर्ष नेताओं ने राजद के 1990-2005 के शासनकाल के दौरान जंगल राज के डर को जोरदार तरीके से उठाया।
- कानून-व्यवस्था की भयावहता ने मतदाताओं को राजद काल के अराजक व हिंसक अतीत की याद दिला दी। इसकी तुलना एनडीए के स्थिरता व सुशासन के वादे से की गई। उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा के काफिले पर हमले जैसी घटनाओं से आरोपों की पुष्टि हुई।
- एनडीए ने खुद को गुंडाराज की वापसी के खिलाफ एकमात्र विकल्प के रूप में पेश किया।
- भाजपा की इस रणनीति ने व्यापक मतदाता आधार को संगठित किया, खासकर उन लोगों को जिन्होंने पहले अराजकता के दौर को देखा था।
3. पारंपरिक विचारधाराओं से इतर व्यापक जाति-प्रबंधन
एनडीए की जीत का अहम कारण समन्वित सोशल इंजीनियरिंग रही। बिहार की राजनीति मुस्लिम यादव (एमवाई) गठबंधन पर टिकी रही है, जिसका फायदा राजद को मिला था। जवाब में एनडीए ने अति पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) और महादलित समुदायों को साधा।- भाजपा ने सवर्ण जातियों को एकजुट किया, जबकि नीतीश की जदयू ने कुर्मियों व अति पिछड़ों के बीच मजबूत आधार हासिल किया, जो बिहार की आबादी का लगभग 36% है।
- लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास), राष्ट्रीय लोक मोर्चा और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा ने एनडीए की दलित और पिछड़ी जातियों के बीच पहुंच को बढ़ाया, जिससे व्यापक और विविध गठबंधन बना जो पारंपरिक विचारधाराओं से ऊपर था।
- महागठबंधन की नवीनतम सोशल-इंजीनियरिंग दांव खारिज। मुकेश सहनी की वीआईपी नाकाम। उप-मुख्यमंत्री का दांव भी बेदम। पुष्टि हुई कि सिर्फ जातीय गणित ही जमीनी स्तर पर लगातार काम किए बिना मजबूत सामाजिक गठबंधन नहीं तोड़ सकता
4. 10,000 रुपये ने पलट दी पूरी बाजी
नीतीश का मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना में महिला उद्यमियों को व्यवसाय शुरू करने के लिए किलों में 2.1 लाख रूपये देने का वादा।
- 1.21 करोड़ से अधिक महिलाओं के खातों में 10,000 रुपये की पहली किस्त ने पलट दी पूरी बाजी।
- महिलाओं का उत्साहजनक मतदान। कई जिलों में पुरुषों की तुलना में 10-20% ज्यादा।
- महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए नीतीश सरकार के प्रयास और भाजपा की राष्ट्रीय पहुंच।
5. मोदी-नीतीश फैक्टर, बेहतर छवि, डबल इंजन पर भरोसा
पीएम मोदी एवं सीएम नीतीश की स्वच्छ व सुशासन देने वाली छवि। नीतीश की सुशासन बाबू की छवि ने एनडीए को मजबूत आधार दिया और मतदाताओं ने डबल इंजन सरकार पर एक बार फिर भरोसा जताया।
- विपक्ष की ओर से स्वास्थ्य और बढ़ती उम्र को लेकर किए जा रहे हमलों के बावजूद मतदाताओं के बीच नीतीश सबसे विश्वसनीय नेता बने रहे।
- बिहार का मतलब नीतीश कुमार और टाइगर अभी जिंदा है जैसे नारे व्यापक रूप से गूंजे, जिसने मतदाताओ में उनकी स्वीकार्यता और मजबूत हुई।
- विपक्षी महागठबंधन में बिखराव का भी एनडीए को लाभ मिला। महागठबंधन के घटक दलों के बीच कई सीटों पर दोस्ताना मुकाबला हुआ, जिसका सीधा लाभ एनडीए को मिला।