बैंकों के विलय पर सरकार के विरोध में मजदूर संघ परिवार, हो सकता है बड़ा फैसला
- मजदूर संघ ने बैंकों के निजीकरण की तरफ बढ़ाया गया कदम बताया
- बैंक अधिकारियों के चार संगठन आगामी पांच सितंबर को करेंगे बैठक
- एआईबीओसी ने कहा- अनिश्चितकालीन हड़ताल पर भी जाना पड़े तो जाएंगे
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नरेंद्र मोदी सरकार के सार्वजनिक क्षेत्र के कुछ बैंकों के विलय के फैसले पर संघ परिवार की श्रमिक इकाई भारतीय मजदूर संघ 'बीएमएस' ने मोर्चा खोल दिया है। बीएमएस का कहना है कि वह सरकार की इस नीति के खिलाफ हैं। इस मामले में बैंकों के अन्य यूनियनों और संगठनों से संपर्क में हैं और सब मिल कर जो भी निर्णय लेंगे, उस पर अमल होगा।
भारतीय मजदूर संघ के महासचिव बिरजेश उपाध्याय ने अमर उजाला से बातचीत के दौरान कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के कुछ बैंकों के सरकार की नीति के वह खिलाफ हैं। यह कुछ और नहीं, बल्कि बैंकों के निजीकरण की तरफ बढ़ाया गया एक कदम है। यह अर्थव्यवस्था के हित में नहीं है, क्योंकि इससे रोजगार के अवसर कम होंगे और समाज के हाशिये पर रहने वाले लोग बैंकिंग सुविधा से धीरे धीरे दूर होते जाएंगे।
उन्होंने एक दशक पहले आई विश्वव्यापी मंदी को याद करते हुए कहा कि उस समय जब अमेरिका में मंदी आई थी तो उसका कारण कुछ बड़े बैंकों का फेल होना था। उस समय भी भारत पर उस मंदी का कोई खास असर इसलिए नहीं हुआ क्योंकि तब भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के छोटे-छोटे बैंकों की अर्थव्यवस्था पर मजबूत पकड़ थी। वह आम जनता से सीधे जुड़े थे। अब बैंक तो बड़े हो जाएंगे, लेकिन वह आम जनता से, हाशिये पर रहने वाले परिवारों से दूर हो जाएंगे।
यूएफबीयू से मिल कर बनाएंगे रणनीति
बैंक में काम करने वाले अधिकारियों के सबसे बड़े संगठन ऑल इंडिया बैंक आफिसर्स कंफेडरेशन -एआईबीओसी- के महासचिव सौम्य दत्ता ने बताया कि बैंक के सभी मान्यता प्राप्त यूनियनों के पदाधिकारी शीघ्र ही बैठ कर आगे की रणनीति तय करेंगे। बैंक अधिकारियों के चार संगठन आगामी पांच सितंबर को बैठ रहे हैं।
इसके बाद 11 सितंबर को यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियन की बैठक हो रही है। इसमें कर्मचारियों की पांच यूनियन और अधिकारियों के चार संगठन शामिल हैं। उसी में आगे की रणनीति तय की जाएगी।
लड़ाई होना तय है
एआईबीओसी की दिल्ली इकाई के अध्यक्ष पंकज कपूर का कहना है कि लड़ाई होना तय है क्योंकि यह सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के अस्तित्व की लड़ाई है। सरकार ने पहले भी स्टेट बैंक के समूह के बैंकों का विलय किया, लेकिन अभी भी वहां सहयोगी बैंक के अधिकारियों एवं कर्मचारियों को स्टेट बैंक के अधिकारियों और कर्मचारियों की तरह सुविधा नहीं मिल रही है।
इसी तरह बैंक ऑफ बड़ौदा में जो विजया बैंक और देना बैंक का विलय हुआ, वहां सभी कर्मचारियों की सेवा शर्तें समान नहीं है। अभी भी उनके बीच भेद-भाव जारी है। यही हालत हाल में अन्य बैंकों के कर्मचारियों के साथ भी होगा। इसलिए अब सरकार से अब लंबी लड़ाई लड़ी जाएगी और इसमें यदि अनिश्चितकालीन हड़ताल पर भी जाना पड़े तो वैसा होगा।