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ईमानदारी और सादगी की मिसाल, आसान नहीं है मनोहर परिकर बनना

Sun, 17 Mar 2019 11:23 PM IST
संदीप भट्ट अतुल सिन्हा, नई दिल्ली
अतुल सिन्हा, नई दिल्ली Published by: संदीप भट्ट Updated Sun, 17 Mar 2019 11:23 PM IST
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Becoming a Manohar Parrikar, An Example of Integrity and Simplicity
मनोहर परिकर

पूरा देश एक ईमानदार, सरल, जमीन से जुड़े और सही अर्थों में एक इंसान के तौर पर पहचाने जाने वाले मनोहर परिकर को दिल से नमन कर रहा है। परिकर का असमय जाना गोवा के लिए ही नहीं पूरे देश के लिए एक सदमे की तरह है। इस दौर में जब ईमानदारी और सादगी की बड़ी बडी बातें की जाती हों, सियासत में जड़ जमा चुके भ्रष्टाचार को हटाने और नेताओं की फिजूलखर्ची रोकने के बड़े बड़े दावे किए जाते हों, ऐसे में परिकर जैसे नेता का जाना कम से कम आम जनता के लिए बेहद तकलीफदेह है।

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मुझे याद है 2016 के चुनावी सरगर्मियों वाले गोवा का वो माहौल जब मनोहर परिकर वहां के लोगों के दिलों में धड़कते हुए महसूस होते थे। 4 फरवरी 2017 को गोवा में चुनाव थे और परिकर तब केन्द्र में रक्षामंत्री थे। 2014 से पहले तक परिकर ने गोवा की आम जनता के दिलों में अपनी जो जगह बनाई थी, उसे उनकी जगह मुख्यमंत्री बनाए गए लक्ष्मीकांत पारसेकर बचा नहीं पाए। पारसेकर को गोवा की जनता ने चुनाव में खारिज ही नहीं किया, भाजपा को किनारे कर कांग्रेस को सबसे बड़ी पार्टी बना दी। अब इसे अमित शाह या नरेन्द्र मोदी की तात्कालिक सियासी सूझबूझ कहिए, या मनोहर परिकर को लेकर गोवा के लोगों का स्नेह कि इस हालत में भी वहां परिकर के नाम पर भाजपा सरकार बना ले गई। गोवा के लोग इस बात से नाराज़ थे कि आखिर उनके नेता को दिल्ली क्यों ले जाया गया।  
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दरअसल गोवा में चलने वाली कसीनों, संस्कृति, पर्यटन और मछुआरों की समस्याओं के बीच बेहतरीन तालमेल बिठाकर, विरोधियों को भी अपने साथ लेकर बेहद दोस्ताना तरीके से सरकार चलाने के हुनर में माहिर मनोहर परिकर की सादगी उनकी सबसे बड़ी पूंजी थी। कहीं भी किसी भी वक्त और किसी भी तरह चले जाना, साइकिल से विधानसभा आना या फिर किसी भी सामान्य आदमी की तरह गोवा की सड़कों पर घूमना, लोगों से मिलना जुलना और सबकी बात सुनना मनोहर परिकर की खासियत थी। इसे गोवा के तमाम समुद्र तटों के करीब बने छोटे छोटे ढाबेनुमा होटलों के अलावा डोना पौला के रास्ते में आने वाले चर्च से लेकर वहां के दुकानदारों तक मानते हैं। वो तब भी यही कहते थे कि अगर परिकर दिल्ली नहीं गए होते तो गोवा में भाजपा फिर से बड़ी ताकत के तौर पर उभरती। गोवा के विपक्षी दलों के नेता और यहां तक कि कांग्रेसी नेता प्रताप सिंह राणे तक परिकर की निजी तौर पर तारीफ करते नहीं थकते।    

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अब उनके गुजर जाने के बाद गोवा की सियासत एक बार फिर गर्माने वाली है। खासकर तब जब लोकसभा के चुनाव को लेकर हलचलें तेज हैं और पार्टी यहां की 2 सीटों के लिए तो आश्वस्त रही ही है कि परिकर के रहते वो दोनों भाजपा के खाते में आएगी। लेकिन अब नए मुख्यमंत्री की बात हो या फिर आने वाले चुनावों की, गोवा में  भाजपा के लिए परिकर का जाना एक बड़ा झटका है। हालांकि पिछले दिनों जब से राफेल का मुद्दा सियासत में गर्माने लगा और ये खबर भी उड़ी कि परिकर के पास राफेल की फाइलें हैं और उनसे सच सामने आने का खतरा है तब पार्टी के लिए एक मुश्किल जरूर खड़ी हो गई थी। लेकिन इस बारे में तमाम तथ्य अपने साथ लिए पूर्व रक्षामंत्री और ईमानदारी की मिसाल मनोहर परिकर अब हमेशा के लिए खामोश हो गए।

आज भाजपा का हर नेता मनोहर परिकर को याद करते हुए यह कहने से बाज नहीं आ रहा कि वो सादगी के मिसाल थे, वो बेहद ईमानदार और सरल थे, और तो और हवाई चप्पल पहनकर कहीं भी चले जाते थे, सूट बूट की संस्कृति से एकदम दूर थे। आखिर जब आप मनोहर परिकर की इन तमाम खूबियों को इतना पसंद करते हैं, आम लोगों को बढ़ चढ़ कर अपने इस नेता की ये खूबियां बताते हैं तो भला आप अपने जीवन में भी यह सादगी क्यों नहीं ला सकते। क्या ये जरूरी है कि देश में ईमानदार और सादगी वाले नेता सिर्फ मनोहर परिकर ही हो सकते हैं। अगर आप उनसे ऐसा कुछ भी सीख सकते हैं या जीवन में उतार सकते हैं तो उतार लीजिए, शायद यही परिकर साहब को असली श्रद्धांजलि होगी।

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