कानों देखी: दामाद श्री बम फोड़ने की तैयारी, भागवत जी की अग्निपरीक्षा
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दामाद श्री बम फोड़ने की तैयारी
दामाद श्री यानी राबर्ट वाड्रा। जब से मोदी सरकार सत्ता में आए हैं, पंचिंग बैग बने हुए हैं। खबर है कि पिछले सप्ताह ही जांच एजेंसियां इस बम को फोड़ने (गिरफ्तार) की तैयारी में थी, लेकिन बात आगे नहीं बढ़ पाई। वाड्रा का करीबी माने जाने वाले मनोज अरोड़ा एजेंसियों की गिरफ्त में है। पूछताछ का सिलसिला चल रहा है। वाड्रा से एक बार पूछताछ हो चुकी है। छह फरवरी को फिर मनी लांड्रिग मामले में जामनगर हाऊस तलब किए गए हैं। यह वाड्रा से दूसरी पूछताछ होगी। कु छ सूत्रों की मानें तो वाड्रा पर गिरफ्तारी की तलवार लटकी हुई है। हालांकि बताते हैं कि प्रियंका गांधी वाड्रा को कांग्रेस महासचिव बनाए जाने के बाद इस तरह की अटकलें दूर की कौड़ी हो सकती हैं। एक बड़े नेता का इसके पीछे निराला तर्क है। सूत्र का कहना है कि गुलाम नबी आजाद लखनऊ निकल चुके थे। प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के शिवपाल सिंह यादव और राजा भैय्या कांग्रेस के साथ चुनावी तालमेल की उम्मीद जगाए थे। दिल्ली में भी राजनीतिक हलचल होनी थी। आजाद को भी नहीं पता था कि आज ही उनका प्रभार छिन जाएगा, लेकिन बताते हैं कि अचानक सूई तेजी से घूमी। वह हरियाणा के प्रभारी बना दिए गए। विदेश में बैठी प्रियंका को ज्योतिरादित्य के साथ कांग्रेस महासचिव बना दिया गया। अब तैयारी आगे के चुनाव अभियान की है।
गडकरी जी चुप्पम...चुप्प
केन्द्रीय भूतल परिवहन, जहाजरानी मंत्री नितिन गडकरी काम के ही नहीं बोलने में भी शानदार नेता हैं। देश में सड़क, हाई-वे, एक्सप्रेसवे का जाल बिछाने वाले गड़करी आजकल बयानों को लेकर भी चर्चा में है। गडकरी को प्रधानमंत्री मोदी, भाजपा अध्यक्ष शाह और संघ के बीच में दूरी बढ़ाने वाला कारक भी माना जाता है। गड़करी को आरएसएस के भीतर एक धड़ा भावी पीएम के रूप में देख रहा है। कुछ भाजपा के नेता भी यही उम्मीद पाले हैं। कहा जा रहा है कि अमित शाह और प्रधानमंत्री की गुडबुक में इस पद के नड्डा से अच्छा चेहरा समझ में नहीं आ रहा है। इन सब डेवलपमेंट के बीच में नितिन गडकरी ने अपने बयानों से न केवल पीएम बल्कि भाजपा हाई कमान को भी छलनी कर दिया है। सूत्र बताते हैं कि इसकी शिकायत संघ तक पहुंच गई है। वहां से गडकरी को बयान में थोड़ा संभलने का संकेत आया है। बताते हैं इसके बाद से गडकरी जी ने कुछ दिन चुप्पम...चुप्प रहने का फैसला किया है।
भागवत जी की अग्निपरीक्षा
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने राहत की सांस ली है। संघ के भीतर माना जा रहा है कि भागवत जी कठिन अग्निपरीक्षा के दौर से गुजर रहे हैं। उनकी यह परीक्षा राम मंदिर मुद्दा और केन्द्र सरकार की नीति को लेकर है। संघ के अनुषांगिक संगठन, प्रधानमंत्री मोदी और शाह के विरोधी समेत सब आग में घी का काम कर रहे हैं। भागवत को चिढ़ाने के लिए प्रवीण भाई तोगड़िया लगातार जहर बुझे तीर छोड़ रहे हैं। इतना ही नहीं केएन गोविंदाचार्य समेत अन्य भी सक्रिय हैं। इससे भागवत की परीक्षा कड़ी होती रही है। मोहन भागवत लगातार अपने स्टैंड से जस्टिफाई करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन संघ के भीतर सवालों की झड़ी लगातार बढ़ती जा रही है।
बिहार लाया बहार
तीन दशक बाद कांग्रेस को बिहार में बहार नजर आ रही है। बिहार से लोकसभा चुनाव 2019 के लिए प्रत्याशियों की लाइन लगातार लंबी हो रही है। इससे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी गदगद हैं। राहुल गांधी की खुशी का ठिकाना तब नहीं रहा, जब वह पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान पर पहुंचे। कांग्रेस अध्यक्ष ने वहां की भीड़ की देखते ही अपने साथियों को कई बार धन्यवाद दिया। कांग्रेस अध्यक्ष ने गांधी मैदान और कांग्रेस कार्यकर्ताओं के उत्साह को देखकर बिहार प्रदेश कांग्रेस के स्टैंड के साथ बने रहने का मन बनाया है। यानी बिहार में कांग्रेस महागठबंधन के साथ तालमेल में लोकसभा की 40 में से 12 सीटों के दावे को मजबूत कर दिया है।
एक दूसरे को मात देते शरद पवार और सुप्रिया सूले
किसी पिता के लिए बेटी के बारे में अपने नक्शे कदम पर होने की बात सुनना अच्छा ही लगेगा। शरद पवार साहब भी उन्हीं में से एक हैं। हंसमुख, मिलनसार सुप्रिया सूले काफी कुछ पवार साहब पर गई हैं। जिस तरह से पवार साहब के हर राजनीतिक दल में हितैशी हैं, उसी तरह सुप्रिया सूले की तमाम राजनीतिक दलों के नेताओं से अच्छी निभती हैं। भाजपा की मानाक्षी लेखी, समाजवादी पार्टी नेता नीरज शेखर, भाजपा के निशिकांत दूबे, डीएमके की कनिमोझी समेत सभी से सुप्रिया बड़े सहज ढंग से मिलती हैं। संसद का सत्र चल रहा हो तो एक गाड़ी में तीन-चार सांसदों का एक साथ जाना आम है। बड़े दिन बाद छह फरवरी को सुप्रिया सूले शाम को करीब चार बजे संसद भवन परिसर में पिता शरद पवार के साथ दिखाई दी। मीडिया भी नहीं थी और सांसदों की हलचल भी नहीं थी। पिता और पुत्री के साथ कुछ महाराष्ट्र से आए लोग थे और पिता-पुत्री गांधी जी की प्रतिमा के साथ खड़े होकर तस्वीर खिंचवा रहे थे।
आखिर प्रियंका से इतना क्यों परेशान है भाजपा?
प्रियंका गांधी वाड्रा को उनके भाई कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कांग्रेस महासचिव बना दिया है। जब से प्रियंका महासचिव बनी हैं, भाजपा नेताओं के निशाने से राहुल गांधी को थोड़ा राहत मिल गई है। भाजपा के नेता इसे मां-बेटा-बहन की पार्टी बताने में जुट गए हैं। लेकिन अंदरखाने से भाजपा के भीतर प्रियंका के आने की हलचल देखी जा रही है। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि वह प्रियंका के भाषण, जनसभा और अमेठी में चुनाव प्रचार का यू ट्यूब पर वीडियो देख रहे हैं। ताकि प्रियंका पर एक समझ बनाकर राजनीति और मतदाताओं के बीच में कांग्रेस महासचिव को करारा जवाब दे सकें। भाजपा की एक केन्द्रीय मंत्री का मानना है कि अमेठी में इस बार प्रियंका का जादू नहीं चलेगा। वहीं दूसरी केन्द्रीय मंत्री का कहना है कि चुनाव मैदान में आने के बाद कुछ भी छिपा नहीं रहेगा। आने दीजिए इधर भी तैयारी पूरी है। लेकिन इतना साहस दिखाने के बाद भी भाजपा के कई नेता मान रहे हैं कि 2019 की लड़ाई थोड़ा कड़ी होती जा रही है। बताते हैं इस कुछ असर तो प्रियंका का भी रहेगा।
बसपा रोज निर्णय नहीं लेती
बसपा महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा बड़े सुकून में हैं। क्योंकि अब उनसे गठबंधन को लेकर कोई सवाल नहीं पूछता। सतीश चंद्र मिश्रा का कहना है कि जिसे कंधा खोजकर राजनीति करनी हो, वह करे। बसपा और सपा का गठबंधन उ.प्र. में 50 से अधिक सीटें लेकर आ रहा है। मिश्रा के मुताबिक आगे गठबंधन के बारे में लोग चाहे तो कयास भी लगाते रहें, लेकिन बहन कु मायावती ने अपना रास्ता तय कर लिया है। हाथी इतनी जल्दी जल्दी अपना स्टैंड नहीं बदलता। कांग्रेस और प्रियंका के सवाल पर भी बसपा को कोई हिचक नहीं है। पार्टी नेताओं का कहना है कि पार्टी का रुख साफ है और उ.प्र. का चुनाव भाजपा बनाम सपा-बसपा गठबंधन होने जा रहा है। हालांकि समाजवादी पार्टी के नेता अभी इस मुद्दे पर अब संभलकर बोल रहे हैं।