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ग्रीन गुजरात: बनास बायो-सीएनजी मॉडल, कचरे से कंचन और ग्रामीण समृद्धि का नया राष्ट्रीय मानक
Thu, 26 Mar 2026 10:07 PM IST
Rahul Kumar
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अहमदाबाद।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अहमदाबाद।
Published by: Rahul Kumar
Updated Thu, 26 Mar 2026 10:07 PM IST
सार
बनासकांठा में स्थापित यह मॉडल पिछले छह वर्षों से सफलतापूर्वक संचालित हो रहा है। एक संयंत्र प्रतिदिन लगभग 100 मीट्रिक टन गोबर प्रोसेस करता है और करीब 50-55 करोड़ रुपये की लागत से तैयार होता है।
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बनास बायो-सीएनजी मॉडल
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘वेस्ट टू वेल्थ’, आत्मनिर्भर भारत और हरित ऊर्जा के विजन को धरातल पर उतारते हुए गुजरात का विकास मॉडल अब एक सफल राष्ट्रीय मिसाल बनकर उभरा है। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के मार्गदर्शन में विकसित बनास बायो-सीएनजी प्लांट मॉडल को केंद्रीय जलशक्ति मंत्रालय और केंद्रीय सहकारिता विभाग के संयुक्त प्रयासों से देश के लगभग 15 राज्य अपने यहां लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। बनास डेयरी द्वारा विकसित यह प्रोजेक्ट गोबर जैसे पारंपरिक अपशिष्ट को स्वच्छ ईंधन और जैविक उर्वरक में बदलकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था की तस्वीर बदल रहा है।
गुजरात सरकार ने इस अभिनव पहल की व्यापक संभावनाओं को देखते हुए बायो-सीएनजी क्षेत्र को अपनी बजटीय प्राथमिकताओं में शीर्ष पर रखा है। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व में राज्य सरकार ने सहकारी दुग्ध उत्पादक संघों द्वारा नए प्लांट स्थापित करने के लिए 60 करोड़ रुपए का विशेष प्रावधान किया है। इस बजटीय सहायता का उद्देश्य डेयरी क्षेत्र को स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन का केंद्र बनाना और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाना है। उल्लेखनीय है कि इस योजना के तहत राज्य में चरणबद्ध तरीके से लगभग 10 बायो-सीएनजी प्लांट स्थापित करने की योजना प्रस्तावित है।
बनासकांठा में 40 मीट्रिक टन प्रतिदिन गोबर प्रसंस्करण क्षमता वाला बनास बायो-सीएनजी प्लांट पिछले 6 वर्षों से सफलतापूर्वक संचालित एक प्रूवन मॉडल है। इसकी सफलता से प्रेरित होकर बनासकांठा में 5 विशाल बायो-सीएनजी प्लांट्स शुरू करने पर काम जारी है। वर्तमान में नियोजित 5 प्लांट्स में से 2 संयंत्रों ने परिचालन शुरू कर दिया है, जबकि तीसरा प्लांट अपने पूर्णता के अंतिम चरण में है।
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प्रत्येक प्लांट प्रतिदिन लगभग 100 मीट्रिक टन (1 लाख किलो) गोबर को वैज्ञानिक पद्धति से प्रोसेस करता है। लगभग 50-55 करोड़ रुपए की निवेश लागत से निर्मित यह संयंत्र आधुनिक तकनीक और इन्फ्रास्ट्रक्चर का एक ऐसा उत्कृष्ट उदाहरण है जो यह सिद्ध करता है कि कैसे इकोलॉजी और इकोनॉमी दोनों साथ-साथ चल सकते हैं और कैसे पर्यावरण संरक्षण, किसानों की समृद्धि और औद्योगिक प्रगति तीनों एक साथ संभव हैं।
बनासकांठा में स्थापित बायो-सीएनजी संयंत्रों के दायरे में लगभग 20 किलोमीटर के आसपास स्थित 20-25 गांवों के पशुपालक परिवार जुड़े हुए हैं, जो नियमित रूप से गोबर की आपूर्ति करते हैं। किसानों को गोबर के बदले 1 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से भुगतान सुनिश्चित किया गया है, जिससे अनुमानित 400-450 पशुपालक परिवारों को अतिरिक्त आय भी प्राप्त हो रही है। गोबर संग्रहण और परिवहन के लिए लगभग 13 ट्रैक्टर-ट्रॉली उपयोग में लाई जा रही है, जो लगभग 4-4 मीट्रिक टन प्रति ट्रिप क्षमता के साथ गोबर को संयंत्र तक पहुंचाती हैं, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और स्थानीय आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिल रहा है।
इतना ही नहीं, यह संयंत्र बहु-उत्पाद आधारित आर्थिक मॉडल पर कार्य करता है, जिसके तहत प्रतिदिन लगभग 1,800 किलोग्राम कंप्रेस्ड बायोगैस (सीएनजी) का उत्पादन होता है, जिसे करीब 75 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से बाजार में उपलब्ध कराया जाता है। इसके साथ ही लगभग 25 मीट्रिक टन ठोस जैविक उर्वरक और 75 मीट्रिक टन तरल जैविक उर्वरक का उत्पादन भी होता है, जिन्हें क्रमशः लगभग 6 रुपए प्रति किलोग्राम और 0.50 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से बेचा जाता है। इन तीनों उत्पादों से संयंत्र को प्रतिदिन लगभग 3 लाख रुपए से अधिक का राजस्व प्राप्त होता है, जो वार्षिक रूप से करीब 12 करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है।
गुजरात की यह अभिनव परियोजना न केवल ऊर्जा के क्षेत्र में, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी एक क्रांतिकारी कदम है। यह मॉडल प्रतिवर्ष लगभग 6,750 टन सीओ2 ई (कार्बन डाइऑक्साइड इक्विवेलेंट) ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने की क्षमता रखता है, जो जलवायु परिवर्तन की वैश्विक चुनौती के खिलाफ गुजरात की बड़ी भागीदारी को दर्शाता है। स्वच्छ ईंधन का उत्पादन, रसायनों से मुक्त जैविक उर्वरक की उपलब्धता और वैज्ञानिक अपशिष्ट प्रबंधन का यह त्रिकोणीय संगम 'ग्रीन बनासकांठा' से होते हुए 'ग्रीन गुजरात' के व्यापक संकल्प को हकीकत में बदल रहा है।
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गुजरात सरकार ने इस अभिनव पहल की व्यापक संभावनाओं को देखते हुए बायो-सीएनजी क्षेत्र को अपनी बजटीय प्राथमिकताओं में शीर्ष पर रखा है। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व में राज्य सरकार ने सहकारी दुग्ध उत्पादक संघों द्वारा नए प्लांट स्थापित करने के लिए 60 करोड़ रुपए का विशेष प्रावधान किया है। इस बजटीय सहायता का उद्देश्य डेयरी क्षेत्र को स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन का केंद्र बनाना और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाना है। उल्लेखनीय है कि इस योजना के तहत राज्य में चरणबद्ध तरीके से लगभग 10 बायो-सीएनजी प्लांट स्थापित करने की योजना प्रस्तावित है।
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बनासकांठा में 40 मीट्रिक टन प्रतिदिन गोबर प्रसंस्करण क्षमता वाला बनास बायो-सीएनजी प्लांट पिछले 6 वर्षों से सफलतापूर्वक संचालित एक प्रूवन मॉडल है। इसकी सफलता से प्रेरित होकर बनासकांठा में 5 विशाल बायो-सीएनजी प्लांट्स शुरू करने पर काम जारी है। वर्तमान में नियोजित 5 प्लांट्स में से 2 संयंत्रों ने परिचालन शुरू कर दिया है, जबकि तीसरा प्लांट अपने पूर्णता के अंतिम चरण में है।
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प्रत्येक प्लांट प्रतिदिन लगभग 100 मीट्रिक टन (1 लाख किलो) गोबर को वैज्ञानिक पद्धति से प्रोसेस करता है। लगभग 50-55 करोड़ रुपए की निवेश लागत से निर्मित यह संयंत्र आधुनिक तकनीक और इन्फ्रास्ट्रक्चर का एक ऐसा उत्कृष्ट उदाहरण है जो यह सिद्ध करता है कि कैसे इकोलॉजी और इकोनॉमी दोनों साथ-साथ चल सकते हैं और कैसे पर्यावरण संरक्षण, किसानों की समृद्धि और औद्योगिक प्रगति तीनों एक साथ संभव हैं।
बनासकांठा में स्थापित बायो-सीएनजी संयंत्रों के दायरे में लगभग 20 किलोमीटर के आसपास स्थित 20-25 गांवों के पशुपालक परिवार जुड़े हुए हैं, जो नियमित रूप से गोबर की आपूर्ति करते हैं। किसानों को गोबर के बदले 1 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से भुगतान सुनिश्चित किया गया है, जिससे अनुमानित 400-450 पशुपालक परिवारों को अतिरिक्त आय भी प्राप्त हो रही है। गोबर संग्रहण और परिवहन के लिए लगभग 13 ट्रैक्टर-ट्रॉली उपयोग में लाई जा रही है, जो लगभग 4-4 मीट्रिक टन प्रति ट्रिप क्षमता के साथ गोबर को संयंत्र तक पहुंचाती हैं, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और स्थानीय आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिल रहा है।
इतना ही नहीं, यह संयंत्र बहु-उत्पाद आधारित आर्थिक मॉडल पर कार्य करता है, जिसके तहत प्रतिदिन लगभग 1,800 किलोग्राम कंप्रेस्ड बायोगैस (सीएनजी) का उत्पादन होता है, जिसे करीब 75 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से बाजार में उपलब्ध कराया जाता है। इसके साथ ही लगभग 25 मीट्रिक टन ठोस जैविक उर्वरक और 75 मीट्रिक टन तरल जैविक उर्वरक का उत्पादन भी होता है, जिन्हें क्रमशः लगभग 6 रुपए प्रति किलोग्राम और 0.50 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से बेचा जाता है। इन तीनों उत्पादों से संयंत्र को प्रतिदिन लगभग 3 लाख रुपए से अधिक का राजस्व प्राप्त होता है, जो वार्षिक रूप से करीब 12 करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है।
गुजरात की यह अभिनव परियोजना न केवल ऊर्जा के क्षेत्र में, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी एक क्रांतिकारी कदम है। यह मॉडल प्रतिवर्ष लगभग 6,750 टन सीओ2 ई (कार्बन डाइऑक्साइड इक्विवेलेंट) ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने की क्षमता रखता है, जो जलवायु परिवर्तन की वैश्विक चुनौती के खिलाफ गुजरात की बड़ी भागीदारी को दर्शाता है। स्वच्छ ईंधन का उत्पादन, रसायनों से मुक्त जैविक उर्वरक की उपलब्धता और वैज्ञानिक अपशिष्ट प्रबंधन का यह त्रिकोणीय संगम 'ग्रीन बनासकांठा' से होते हुए 'ग्रीन गुजरात' के व्यापक संकल्प को हकीकत में बदल रहा है।