बाबरी बनाए जाने से लेकर ढांचा विध्वंस के आरोपियों के बरी होने तक, जानें 492 सालों का इतिहास

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Wed, 30 Sep 2020 02:45 PM IST
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Babari Masjid Demolition Case: From the construction of the Babri Masjid to the acquittal of those accused of demolition, know the entire history

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छह दिसंबर 1992 को अयोध्या में हुए ढांचा विध्वंस मामले में लगभग 28 वर्षों तक चली कानूनी कार्रवाई के बाद बुधवार को सीबीआई की विशेष अदालत ने अपना फैसला सुनाया। अदालत ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया। विशेष अदालत के न्यायाधीश एस.के. यादव ने फैसला सुनाते हुए कहा कि ढांचा विध्वंस की घटना पूर्वनियोजित नहीं थी। यह एक आकस्मिक घटना थी। उन्होंने कहा कि आरोपियों के खिलाफ कोई पुख्ता सुबूत नहीं मिले, बल्कि आरोपियों ने उन्मादी भीड़ को रोकने की कोशिश की थी। आइए राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद से संबंधित घटनाएं के बारे में सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं। 
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1528- मुगल बादशाह बाबर के कमांडर मीर बाकी ने बाबरी मस्जिद का निर्माण कराया। 

1885— महंत रघुवीर दास ने विवादित स्थल के बाहर तंबू लगाने की इजाजत देने के लिए फैजाबाद जिला अदालत में अर्जी दाखिल की। न्यायालय ने इसे खारिज कर दिया।

1949- बाबरी मस्जिद के मध्य गुंबद के ठीक नीचे राम लला की मूर्तियां रख दी गईं।

1950- गोपाल विशारद ने रामलला की पूजा का अधिकार हासिल करने के लिए फैजाबाद जिला अदालत में वाद दायर किया। परमहंस रामचंद्र दास ने मूर्तियां रखने और उनकी पूजा जारी रखने के सिलसिले में वाद पेश किया।


1959- निर्मोही अखाड़ा ने विवादित स्थल पर कब्जा दिलाने के आग्रह के सिलसिले में वाद दायर किया।

1961- उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने विवादित स्थल पर दावे का वाद दाखिल किया।

1 फरवरी 1986- स्थानीय अदालत ने सरकार को हिंदू श्रद्धालुओं के लिए विवादित स्थल को खोलने का आदेश दिया।

14 अगस्त 1989- इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने विवादित स्थल पर यथास्थिति बनाए रखने के आदेश दिए।

6 दिसंबर 1992 - बाबरी मस्जिद विवादित ढांचा ढहा दिया गया।

3 अप्रैल 1993- विवादित स्थल पर जमीन अधिग्रहण के लिए केंद्र सरकार ने अयोध्या में अधिग्रहण संबंधी कानून पारित किया। इस कानून को चुनौती देने के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय में इस्माइल फारुकी समेत कई वादियों ने वाद दायर किया।

24 अक्टूबर 1994- उच्चतम न्यायालय ने इस्माइल फारुकी मामले में कहा कि मस्जिद इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं है।

अप्रैल 2002- उच्चतम न्यायालय ने विवादित स्थल पर मालिकाना हक से जुड़े वाद की सुनवाई शुरू की।

13 मार्च 2003 - उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अधिग्रहीत जमीन पर किसी भी तरह की पूजा या इबादत संबंधी गतिविधि नहीं की जाएगी।

30 सितंबर 2010- इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने विवादित स्थल को तीन हिस्सों में बांटने और उन्हें सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला को देने के आदेश दिए।

9 मई 2011- उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगाई।

21 मार्च 2017- तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति जेएस खेहर ने सभी पक्षकारों को आपसी सुलह समझौते का सुझाव दिया।

19 अप्रैल 2017— उच्चतम न्यायालय ने बाबरी विध्वंस मामले को लेकर रायबरेली की विशेष अदालत में चल रही कार्यवाही को लखनऊ स्थित सीबीआई की विशेष अदालत (अयोध्या प्रकरण) में स्थानांतरित कर दिया। साथ ही पूर्व में आरोप के स्तर पर बरी किए गए अभियुक्तों के खिलाफ भी मुकदमा चलाने का आदेश दिया।

30 मई 2017— लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, विनय कटियार, साध्वी ऋतम्भरा और विष्णु हरि डालमिया पर साजिश रचने का आरोप लगाया गया।

31 मई 2017— बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में अभियोजन की कार्यवाही शुरू हुई।

13 मार्च 2020— सीबीआई की गवाही की प्रक्रिया तथा बचाव पक्ष की जिरह भी पूरी हुई। मामले में 351 गवाह और 600 दस्तावेजी साक्ष्य सौंपे।

4 जून 2020— अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 113 के तहत अभियुक्तों के बयान दर्ज होना शुरू हुए।

14 अगस्त 2020— अदालत ने सीबीआई को लिखित बहस दाखिल करने का आदेश दिया।

31 अगस्त 2020— सभी अभियुक्तों की ओर से लिखित बहस दाखिल।

1 सितंबर 2020— दोनों पक्षों की मौखिक बहस पूरी हुई।

16 सितंबर 2020— अदालत ने 30 सितंबर को अपना फैसला सुनाने का आदेश जारी किया। न्यायाधीश एस के यादव ने मामले के सभी अभियुक्तों को फैसला सुनाए जाने वाले दिन अदालत में हाजिर होने के निर्देश दिए।

30 सितंबर - विशेष सीबीआई अदालत ने अपना फैसला सुनाया। सभी आरोपी बाइज्जत बरी हुए। 

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