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तब अटल ने हाथ थामकर सोमनाथ को इस्तीफा देने से रोका, भावुक हो गए थे चटर्जी

Tue, 14 Aug 2018 02:05 AM IST
हिमांशु मिश्र, अमर उजाला, नई दिल्ली
हिमांशु मिश्र, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Tue, 14 Aug 2018 02:05 AM IST
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Atal Bihari Vajpayee prevented Somnath Chatterjee for resigning from Lok Sabha Speaker post

विचारधारा की दृष्टि से राजनीति के विपरीत धुव्र पर खड़े पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी और लोकसभा के पूर्व स्पीकर सोमनाथ चटर्जी की दोस्ती हैरान करने वाली थी। मनभेद की जगह मतभेद की राजनीति करने वाले दोनों राजनेताओं ने इसका अहसास कई मौके पर कराया। 

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2006 में एक समय ऐसा भी आया जब वाजपेयी ने चटर्जी का हाथ थामकर उन्हें स्पीकर पद से इस्तीफा नहीं देने के लिए मनाया। वहीं, 2008 में वापजेयी के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने के लिए चटर्जी प्रोटोकॉल की परवाह नहीं करते हुए कुर्सी से खड़े हो गए थे। दोनों राजनेता 10 बार सांसद रहे और दोनों को ही 1984 में हार का सामना भी करना पड़ा।
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2006 के शीतकालीन सत्र के दौरान अनाज के बदले तेल घोटाला मामले में हंगामे के दौरान चटर्जी ने कुछ सरकारी कामकाज निपटा लिए। इससे खफा राजग ने न सिर्फ उनका बहिष्कार किया, बल्कि उन पर पक्षपात का आरोप लगाते हुए पत्र भी लिखा। उस समय वाजपेयी राजग के अध्यक्ष थे। इसलिए पत्र में सबसे पहला हस्ताक्षर उन्हीं का था। पत्र में वाजपेयी का हस्ताक्षर देखते ही सोमनाथ भावुक हो गए। उन्होंने तत्काल इस्तीफा देने का फैसला किया। 
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इसकी सूचना मिलते ही वाजपेयी दौड़कर सोमनाथ के पास पहुंचे और उन्हें यह कहकर इस्तीफा नहीं देने के लिए मना लिया कि उन्होंने स्वेच्छा से नहीं बल्कि पार्टी लाइन के तहत पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं। सोमनाथ ने कहा कि अगर वाजपेयी को उनकी ईमानदारी पर शक है तो वह एक पल के लिए भी पद पर नहीं रहना चाहते। तब वाजपेयी ने कहा कि व्यक्तिगत तौर पर उन्हें चटर्जी की ईमानदारी पर कोई शक नहीं है। इसका खुलासा स्पीकर पद का कार्यकाल पूरा होने से ठीक पहले चटर्जी ने खुद ही किया था।
 

अटल ने घर पहुंचवाया सोमनाथ का पासपोर्ट

Atal Bihari Vajpayee prevented Somnath Chatterjee for resigning from Lok Sabha Speaker post

आपातकाल के दौरान जब सोमनाथ ने नवीकरण के लिए अपना पासपोर्ट विदेश मंत्रालय में जमा कराया तो पासपोर्ट उन्हें वापस नहीं किया गया। तब विदेश जाने के इच्छुक सोमनाथ ने पश्चिम बंगाल के तत्कालीन सीएम सिद्घार्थशंकर राय से कई बार गुहार लगाई, लेकिन बात नहीं बनी।

1977 में सत्ता परिवर्तन के बाद जब वाजपेयी विदेश मंत्री बने तो सोमनाथ ने उन्हें आपबीती सुनाई। तब वाजपेयी के निर्देश पर मंत्रालय का एक अधिकारी उसी शाम पासपोर्ट पहुंचाने चटर्जी के घर पहुंचा। 

अटल को टोकने पर लालू से नाराज हो गए चटर्जी
2002 के गोधराकांड पर 2005 में लोकसभा में तब भारी हंगामा हुआ जब तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने इसके लिए संघ को जिम्मेदार ठहराया। इस पर वाजपेयी कुछ बोलना चाहते थे, लेकिन उनके भाषण के बीच लालू उन्हें बार-बार टोक रहे थे। इससे खफा चटर्जी ने लालू को सख्त लहजे में वाजपेयी के भाषण के दौरान टोका-टोकी नहीं करने की हिदायत दी।

एक साथ हारे चुनाव
दिलचस्प संयोग है कि वाजपेयी और चटर्जी दस-दस बार सांसद रहे। दोनों ने एक साथ राजनीति को अलविदा कहा। 1984 के आम चुनाव में इंदिरा गांधी की मौत के बाद चली सहानुभूति लहर में दोनों नेताओं को हार का सामना करना पड़ा। बोलपुर संसदीय क्षेत्र से चटर्जी को पहली बार पश्चिम बंगाल की वर्तमान सीएम ममता बनर्जी के हाथों शिकस्त मिली तो ग्वालियर में वाजपेयी दिवंगत माधवराव सिंधिया से चुनाव हार गए।

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