फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   Asian Games: India Lost To Iran In Kabaddi

अब तो कबड्डी में भी फिसड्डी

Fri, 31 Aug 2018 09:10 PM IST
डॉ. आशीष जैन, नई दिल्ली
डॉ. आशीष जैन, नई दिल्ली Updated Fri, 31 Aug 2018 09:10 PM IST
विज्ञापन
Asian Games: India Lost To Iran In Kabaddi
और ये कबड्डी...कबड्डी....कबड्डी करते कराते भारतीय पुरुष टीम मैदान से बाहर आ गए। फिर देसी महिलाएं किसी से कम हैं क्या? समान अधिकारों की अनुशंसा करने वाली महिला आयोग समिति की सलाह पर नारे लगाते हुए महिला टीम ने भी मैदान से बाहर आकार ही अपनी बंधी सांस खोली। 
विज्ञापन


भारतीय पुरुष और महिला टीम ने एक दूसरे के साथ कंधे से कंधा मिला कर 2018 खेलों के एशियाई संस्करण में ईरान को अभूतपूर्व विजय भेंट दी। आज तक एशियाई खेलों में ऐसा कभी नहीं हुआ, कांग्रेस की सरकारों में भी नहीं। उड़ती चिड़िया से सुना है, ये साहेब का मास्टर स्ट्रोक है। अब इन दो पदकों के रूप में भेंट की गईं स्वर्ण मुद्राओं के एवज में ईरान उपहार में मुफ्त तेल देगा जिससे देश में गरीबी कम होगी और रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे।
विज्ञापन


उधर, खेल गांव में जहां खिलाड़ी अपना बोरिया बिस्तर बांध स्वदेश लौट कर अमृतसरी कुल्चे खाने के दिवा स्वप्न देख रहे हैं, वहीं भारतीय दल के अधिकारी ईरान को भेंट दी गई इस एतिहासिक जीत पर लांछनों की खो-खो खेलते हुए दिखाई दिये। 
विज्ञापन
विज्ञापन


खिलाड़ियों ने खेलगांव ऐसे आपाधापी में खाली कर दिया मानो गांव में हैजा फैल गया हो। स्वदेश पहुंचते ही खिलाड़ी अब प्रीमियर लीग की तैयारी आरंभ करेंगे व शीघ्र ही प्रीमियर लीग के पुष्कर मेले में खरीदे बेचे जाएंगे। नेपथ्य में गीत बज रहा है– ऐसा देश है मेरा...... ओ ओ ऐसा देश है मेरा.....

भारत में खेलों को त्योहारों की मान्यता है। जैसे रंग होली में और पटाखे दिवाली पर ही चलाये जाते हैं, उसी प्रकार इन खेलों के नियम कॉमनवेल्थ व एशियाई खेलों के समय ही समझे व दोहराए जाते हैं। मैं भी इसी बहुसंख्यक वर्ग में जन्मा हूं। अत: मुझे कभी भी खेल चर्चाओं में आरक्षण की सुविधा नहीं मिली। यद्यपि जो खेलों के जानकार बन इन चर्चाओं में भाग लेते हैं, वे सेपकतारो व वुशु का उच्चारण तक ठीक से नहीं कर सकते। पर उन आरक्षितों के लिए नियमों में ढील दी गई है। 

भारतीय राजनीति भी भारतीय कबड्डी से भिन्न नहीं है। उदाहरनार्थ, कबड्डी दो देशों के बीच खेला जाने वाला खेल है, एक देश अपने खिलाड़ी को विपक्षी दल के अध्यक्ष के रूप में अपना वर्चस्व सिद्ध करने हेतु दूसरे देश में अकेला ही धकेल देता है। वह अनमना अधेड़ किन्तु युवा अध्यक्ष कभी इस विषय को, तो कभी उस विषय को स्पर्श करता है, पर घर लौटने से पहले ही पैर लड़खड़ा जाते हैं और सांस टूट जाती है। वह इन्ही विषयों द्वारा धर-दबोचा जाता है।

दूसरी ओर अपने घर में खड़े दल के बचे सदस्य, विषय - विवादों से दबे अध्यक्ष का ताली बजा कर उत्साह वर्धन करते हैं और अपनी स्वामिभक्ति व परिवार के प्रति अपनी निष्ठा दर्शाते हुए अपनी अपनी पदक तालिका में अंक बढ़ाते हैं। वहीं, बेचारा अध्यक्ष दर्शक दीर्घा में उपस्थित निष्ठुर दर्शकों के असंसदीय प्रतिसादों का भागी बनता है। राजनीति से विपरीत यह खिलाड़ी कबड्डी के खेल में आउट घोषित किया जाता है। परंतु भारत की राजनीति में इस अध्यक्ष का ज़ोर शोर से स्वागत होता है। हालांकि, दोनों ही परिस्थितियों में खेलने वाले दल की संख्या बल में कमी होती है।

भारत में जन्मे दो खेल, कबड्डी और खो-खो। एक खेल, जिसमें जो प्रतिभागी अपने क्षेत्र से थोड़ा भी  बाहर जाता है, उसके प्रतिद्वंदी उसकी टांग खींच कर धराशाई करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। गिरा देने पर तालियां भी बजाने की परंपरा है। दूसरा खेल खो-खो का है, जहां आप आराम से बैठे व्यक्ति को उसकी पीठ पर धक्का मार कर अपनी जिम्मेदारी उसे ठेल देते हैं। अब वह बेचारा भागता है और आप उसकी जगह आराम से बैठ जाते हैं। प्राय: खो-खो का आयोजन हर पराजय के उपरांत किया जाता है।

अनायास ही यह प्रश्न मन में कौंधता है, क्या ये खेल आज कल की प्रचिलित राजनीति से प्रेरित हैं या राजनीति इन खेलों से। जो भी हो इन दोनों में कई समानताएं हैं, इसीलिए कबड्डी में हम सर्वश्रेष्ठ थे। पर आज, जब हम कुटिल राजनीति में इतने पारंगत हैं, टांग खींच कर गिरना हमारी दिनचर्या का हिस्सा है, गिरे हुए को देख कर ताली बजाना सामाजिक उपलब्धि माना जाता है, तो फिर हम कबड्डी में फिसड्डी कैसे हो सकते हैं?

वर्तमान में देश की राजनीति को देखते हुए हमे कबड्डी में ‘वॉक आउट’ ही मिल जाना चाहिए। ओलंपिक कमेटी को तो हमे स्पर्धा में नाम लिखवा लेने पर ही स्वर्ण पदक दे देना चाहिए। पर नियति को यह स्वीकार न था, और आज यह दिन हमे देखना पड़ रहा है की ईरान जैसे देश ने हमे अपने जन्मसिद्ध अधिकार से वंचित किया। कदाचित वहां की राजनीति भी कबड्डीनुमा हो गई है।


हम देसी भी भावुक हैं और एक बड़े दिल से सुसज्जित हैं। 1983 में इंग्लैंड के मैदान पर ही इंग्लैंड में जन्मे क्रिकेट का विश्वकप घर लेकर आए थे तभी से एक फांस सी दिल में चुभी हुई थी। हम जानते हैं यह पीड़ा कितनी गहन होती है। तब से वह विजय दांत में सेम के रेशे की तरह अटकी हुई थी जिसे हम निरंतर कुरेद रहे थे। आज कबड्डी में पराजित हो कर हमने प्रायश्चित्त कर दिया है। अब मन कुछ हल्का हो गया है। प्रभु कृपा करें।

॥इति॥

लेखक परिचय:
डॉ. आशीष जैन,
वरिष्ठ परामर्शदाता
श्वास रोग विभाग

मैक्स सुपर स्पेशिएलिटी हॉस्पिटल
साकेत, नई दिल्ली

 
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed