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चिंताजनक: एशिया के अंतिम उष्णकटिबंधीय ग्लेशियर्स 99% तक सिमटे, 2030 तक हिमनद पूरी तरह गायब होने की आशंका
Wed, 03 Jun 2026 05:56 AM IST
Pavan
अमर उजाला नेटवर्क, जकार्ता/पापुआ
अमर उजाला नेटवर्क, जकार्ता/पापुआ
Published by: Pavan
Updated Wed, 03 Jun 2026 05:56 AM IST
सार
इंडोनेशिया के पापुआ प्रांत में एशिया के अंतिम उष्णकटिबंधीय हिमनद तेजी से खत्म हो रहे हैं। 1850 के बाद उनका क्षेत्रफल 99 फीसदी घट चुका है और 2030 तक पूरी तरह गायब होने का खतरा है। वैज्ञानिक इसे जलवायु परिवर्तन और अल नीनो के प्रभाव की गंभीर वैश्विक चेतावनी मान रहे हैं।
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जलवायु परिवर्तन और अल नीनो की संयुक्त मार
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
जलवायु परिवर्तन और अल नीनो की संयुक्त मार ने एशिया के आखिरी उष्णकटिबंधीय हिमनदों (ग्लेशियर्स) को अस्तित्व के संकट में पहुंचा दिया है। इंडोनेशिया के पापुआ प्रांत में स्थित पुंचक जया पर्वत पर मौजूद हिमनदों पर किए ताजा अध्ययन में सामने आया है कि वर्ष 1850 के बाद से उनका क्षेत्रफल 99 फीसदी तक घट चुका है, जबकि पिछले 44 वर्षों में यहां की 97 फीसदी बर्फ समाप्त हो गई है। अगर यही हालात रहे तो बचे अंतिम दो हिमनद 2030 के तक पूरी तरह गायब हो सकते हैं।
यह भी पढ़ें- AI सुरक्षा पर ट्रंप का बड़ा कदम: उन्नत मॉडल की जांच के दिए आदेश; राष्ट्रीय सुरक्षा जोखिमों की होगी समीक्षा
इंडोनेशिया के पापुआ विश्वविद्यालय से जुड़े वैज्ञानिकों के अध्ययन के अनुसार वर्ष 1850 में पुंचक जया के हिमनदों का कुल क्षेत्रफल लगभग 19.3 वर्ग किमी था। यह क्षेत्र करीब 3,500 फुटबॉल मैदानों के बराबर माना जाता है, लेकिन वर्ष 2022 से 2024 के बीच यह घटकर केवल 0.16 से 0.23 वर्ग किमी रह गया, जो लगभग 40 फुटबॉल मैदानों के बराबर है। शोधकर्ताओं के मुताबिक कभी इस क्षेत्र में छह प्रमुख हिमनद मौजूद थे, लेकिन अब उनमें से केवल दो कार्स्टेंज और ईस्ट नॉर्थवॉल फर्न ही बचे हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि वैश्विक तापमान में वृद्धि हिमनदों के क्षरण का मुख्य कारण है, लेकिन इंडोनेशिया में अल नीनो ने इस प्रक्रिया को और तेज कर दिया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह केवल एक स्थानीय पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि दुनिया भर में ग्लेशियरों पर बढ़ते जलवायु दबाव की गंभीर चेतावनी है।
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दुनिया के लिए शुरुआती चेतावनी
प्रमुख शोधकर्ता माइक कैपलन इन हिमनदों को कोयले की खान में कैनरी के समान मानते हैं। पुराने समय में खदानों में जहरीली गैसों की पहचान के लिए कैनरी पक्षियों का उपयोग किया जाता था। यदि पक्षी प्रभावित होता था तो यह आसन्न खतरे का संकेत माना जाता था।
पर्यावरण संग सांस्कृतिक विरासत भी दांव पर
पुंचक जया के हिमनद स्थानीय पापुआ आदिवासी समुदायों के लिए केवल बर्फ का भंडार नहीं हैं बल्कि अपने पूर्वजों की आत्माओं से जुड़ा पवित्र स्थल मानते हैं। ऐसे में इन हिमनदों का समाप्त होना केवल प्राकृतिक धरोहर का नुकसान नहीं होगा, बल्कि स्थानीय समुदायों की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान पर भी गहरा प्रभाव डालेगा।
यह भी पढ़ें- Britain: भारतीय मूल की महिला पर हत्या का केस दर्ज; लंदन से लीसेस्टर पहुंची वैन में मिला था व्यक्ति का शव
जलवायु संकट का प्रतीक बनते हिमनद
वैज्ञानिकों का कहना है कि पापुआ के हिमनदों का तेजी से गायब होना इस बात का संकेत है कि जलवायु परिवर्तन अब पृथ्वी के सबसे संवेदनशील प्राकृतिक तंत्रों को प्रभावित कर रहा है। उनका मानना है कि यदि वैश्विक तापमान वृद्धि की मौजूदा प्रवृत्ति जारी रही तो दुनिया के अन्य पर्वतीय हिमनद भी इसी तरह सिकुड़ते जाएंगे, जिससे उन पर निर्भर पारिस्थितिकी तंत्रों और मानव समुदायों के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।
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इंडोनेशिया के पापुआ विश्वविद्यालय से जुड़े वैज्ञानिकों के अध्ययन के अनुसार वर्ष 1850 में पुंचक जया के हिमनदों का कुल क्षेत्रफल लगभग 19.3 वर्ग किमी था। यह क्षेत्र करीब 3,500 फुटबॉल मैदानों के बराबर माना जाता है, लेकिन वर्ष 2022 से 2024 के बीच यह घटकर केवल 0.16 से 0.23 वर्ग किमी रह गया, जो लगभग 40 फुटबॉल मैदानों के बराबर है। शोधकर्ताओं के मुताबिक कभी इस क्षेत्र में छह प्रमुख हिमनद मौजूद थे, लेकिन अब उनमें से केवल दो कार्स्टेंज और ईस्ट नॉर्थवॉल फर्न ही बचे हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि वैश्विक तापमान में वृद्धि हिमनदों के क्षरण का मुख्य कारण है, लेकिन इंडोनेशिया में अल नीनो ने इस प्रक्रिया को और तेज कर दिया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह केवल एक स्थानीय पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि दुनिया भर में ग्लेशियरों पर बढ़ते जलवायु दबाव की गंभीर चेतावनी है।
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दुनिया के लिए शुरुआती चेतावनी
प्रमुख शोधकर्ता माइक कैपलन इन हिमनदों को कोयले की खान में कैनरी के समान मानते हैं। पुराने समय में खदानों में जहरीली गैसों की पहचान के लिए कैनरी पक्षियों का उपयोग किया जाता था। यदि पक्षी प्रभावित होता था तो यह आसन्न खतरे का संकेत माना जाता था।
- पापुआ के ये छोटे हिमनद भी दुनिया को यही चेतावनी दे रहे हैं। आकार में छोटे होने के कारण ये सबसे पहले समाप्त हो रहे हैं, लेकिन यह संकेत है कि यदि वैश्विक तापमान वृद्धि पर नियंत्रण नहीं पाया गया तो भविष्य में बड़े हिमनद भी इसी खतरे का सामना करेंगे।
पर्यावरण संग सांस्कृतिक विरासत भी दांव पर
पुंचक जया के हिमनद स्थानीय पापुआ आदिवासी समुदायों के लिए केवल बर्फ का भंडार नहीं हैं बल्कि अपने पूर्वजों की आत्माओं से जुड़ा पवित्र स्थल मानते हैं। ऐसे में इन हिमनदों का समाप्त होना केवल प्राकृतिक धरोहर का नुकसान नहीं होगा, बल्कि स्थानीय समुदायों की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान पर भी गहरा प्रभाव डालेगा।
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जलवायु संकट का प्रतीक बनते हिमनद
वैज्ञानिकों का कहना है कि पापुआ के हिमनदों का तेजी से गायब होना इस बात का संकेत है कि जलवायु परिवर्तन अब पृथ्वी के सबसे संवेदनशील प्राकृतिक तंत्रों को प्रभावित कर रहा है। उनका मानना है कि यदि वैश्विक तापमान वृद्धि की मौजूदा प्रवृत्ति जारी रही तो दुनिया के अन्य पर्वतीय हिमनद भी इसी तरह सिकुड़ते जाएंगे, जिससे उन पर निर्भर पारिस्थितिकी तंत्रों और मानव समुदायों के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।