'आशा' ने मौत के मुंह में जाने से बचाई हजारों जान, सफलता की रोचक कहानी
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'आशा' जिसने अपने नाम को सार्थक कर दिखाया। कोई एक नहीं, दो-चार नहीं, बल्कि हजारों जान बचा ली। उस दलदली रास्ते में गहरा जंगल था, जंगली हाथी थे और मूसलधार बरसात, इन सब की परवाह किए बिना 'आशा' आगे बढ़ती गई। उड़ीसा के हर गांव-शहर, जहां मलेरिया तेजी से फैलता जा रहा था, 'आशा' ने उसे रोक दिया। मच्छरों को मारने से लेकर, लोगों के सैंपल लेने, उनकी जांच करने और इलाज, आशा ने यह सब कर दिखाया। नतीजा, दो साल पहले तक उड़ीसा में करीब 250 लोग मलेरिया से मारे गए थे और हजारों मरीज चारपाई पर थे, अब मरने वालों का आंकड़ा 3 पर पहुंच गया है।
सफलता की कहानी...पहले पायदान पर बाधा आ खड़ी हुई
नेशनल वेक्टर बोर्न डिजीज कंट्रोल प्रोग्राम के हेड एवं उड़ीसा सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग के निदेशक डॉ. एमएम प्रधान का कहना है कि शुरु में मलेरिया के खिलाफ लड़ाई इतनी आसान नहीं रही। सरकार के सामने प्रोजेक्ट रख दिया गया, मगर कभी पैसे का अभाव तो कहीं इच्छाशक्ति जवाब दे गई। बाद में उन्हें लगा कि प्रोजेक्ट को देखना चाहिए। प्रदेश के वित्त सचिव ने मलेरिया को परास्त करने वाली लड़ाई की प्रोजेक्ट रिपोर्ट मंगवा ली। सचिव ने कहा, डॉ. प्रधान को एक मौका दिया जाए। बस, यहीं से सफलता की एक अनूठी कहानी शुरु हो गई। कॉम्प्रेहन्सिव केस मेनेजमेंट प्रोग्राम (सीसीएमपी) लांच हो गया।
तीन सालों में करीब 1300 'आशा' वर्कर तैयार की गई
डॉ. प्रधान ने बताया, इस लड़ाई में सबसे अहम कड़ी आशा वर्कर रही। मलेरिया से निपटने की हर ट्रेनिंग उन्हें दे दी गई। यहां तक कि ब्लड सैंपल लेना और उसकी जांच करना, यह सब सिखा दिया गया। साथ ही लोगों को उनकी रिपोर्ट के आधार पर क्या इलाज देना है, आशा वर्करों ने ये काम भी बखूबी कर दिखाया। मलेरिया के करीब 90 फीसदी केस ग्रामीण इलाकों से और दस फीसदी शहरों में पाए गए।
दलदल, पानी और जंगली हाथियों ने 'आशा' के कदम रोकने चाहे, मगर नहीं
उड़ीसा का खासतौर से दक्षिणी इलाका, जंगलों से भरा है। बरसात भी होती रहती है। जंगली हाथी भी किसी को उठाकर फेंक देते हैं। ये ऐसे खतरे थे, जिनका सामना एक महिला यानी 'आशा वर्कर' को करना था। शुरु में दिक्कतें आई। आशा वर्करों ने अपने स्तर पर इन बाधाओं को पार किया। कई बार उन्हें अपने घर वापस लौटने में रात भी हो जाती। जंगली हाथी से बचने के लिए बीच रास्ते में छिपना पड़ा या राह बदलनी पड़ी। इन सब बाधाओं के बावजूद आशा ने अपना लक्ष्य हासिल कर लिया। उनकी बदौलत मलेरिया के केसों में 85-90 फीसदी गिरावट आ गई। 2016 में मलेरिया से 250 व्यक्ति मारे गए, 2017 में 17 मौतें और पिछले साल 3 लोगों के मारे जाने की सूचना है।
टेस्ट-ट्रीट-ट्रैक.... इन तरीकों से मिली जीत
आशा वर्करों ने मलेरिया पर काबू पाने के लिए 3टी का सहारा लिया। यानी टेस्ट, ट्रीटमेंट और ट्रैक। टेस्ट करने के बाद रोगियों का इलाज शुरु किया गया और फिर आशा वर्कर ने नियमित तौर पर उनकी निगरानी की। हर मरीज का साप्ताहिक चैकअप शुरू हुआ। इसके लिए बाकायदा एक कार्ड बनाया गया, जिसमें हर विजिट की रिपोर्ट दर्ज की जाती थी।
5.5 किलोमीटर तक मच्छर का रास्ता रोक दिया गया
डॉ. प्रधान बताते हैं कि उड़ीसा में जो मच्छर है वह एक दिन में 5.5 किलोमीटर का रास्ता तय कर लेता है। जिस जगह पर मलेरिया पीड़ितों का इलाज चल रहा था, वहां से चारों तरफ के साढ़े पांच किलोमीटर के इलाके को भी पूरी तरह से मच्छर रोधी बनाया गया। इसके लिए दवा छिड़काव और मच्छरदानी व दूसरे तरीकों से लोगों को मच्छरों की पहुंच से दूर कर उनका नियमित ब्लड टेस्ट किया जाता रहा।