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क्या यूपी में भी दलित वोटों पर दावा ठोंक सकेंगे अरविंद केजरीवाल? मायावती-कांग्रेस से होगी कड़ी टक्कर

Sun, 16 Feb 2020 09:26 PM IST
अनवर अंसारी अमित शर्मा, नई दिल्ली
अमित शर्मा, नई दिल्ली Published by: अनवर अंसारी Updated Sun, 16 Feb 2020 09:26 PM IST
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Arvind Kejriwal can able stake claim on Dalit votes UP, Mayawati Congress face tough competition
Delhi Chief Minister Arvind Kejriwal - फोटो : ANI

नब्बे के दशक में कांशीराम और मायावती ने दलित राजनीति को एक नए मुकाम तक पहुंचाया। उन्होंने दलित वर्ग में आत्मसम्मान और नई चेतना का विकास किया। वे समाज के आदर्श बन गए और दलित वर्ग के बीच उन्हें विशेष सम्मान प्राप्त हुआ। 

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दिल्ली की राजनीति में ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि यहां दलित समाज ने शीला दीक्षित युग से आगे निकलते हुए अरविंद केजरीवाल के रुप में अपना नया आदर्श खोज लिया है। दिल्ली की सभी सुरक्षित सीटों पर भारी मतों से आम आदमी पार्टी के प्रत्याशियों की जीत यही संकेत देती है। 
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लेकिन क्या दिल्ली के बाहर भी अरविंद केजरीवाल दलित समाज का यह प्यार पाने में कामयाब रहेंगे? अगर वे दिल्ली के आगे उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति में अपना हाथ आजमाते हैं तो क्या उन्हें वहां भी इस समाज का यही समर्थन मिल पाएगा?
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दलित चिंतक अशोक भारती कहते हैं कि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि दलित समाज ने अरविंद केजरीवाल को अपना नेता मान लिया है। उन्हें मिला समर्थन अरविंद केजरीवाल के उस काम को समर्थन माना जाना चाहिए जिसे उन्होंने दलित समाज के लोगों के लिए किया है। 

पहले यही समर्थन कांग्रेस के लिए हुआ करता था। लेकिन जब कांग्रेस की पकड़ ढीली पड़ी तो दलित वर्ग का यही समर्थन दूसरे दलों के पास खिसक गया। इसलिए अगर अरविंद केजरीवाल को दलित समाज से अपना समर्थन बरकरार रखना है तो उन्हें इसी वर्ग के लोगों को बड़ी भूमिका में सामने लाना होगा जिससे दलित समाज ज्यादा लगाव महसूस कर सके। अगर इस समर्थन को दलित वर्ग की भागीदारी से मजबूत नहीं किया गया तो कल फिर यह अपने लिए दूसरा ठिकाना तलाश सकता है।

अगर आम आदमी पार्टी उत्तर प्रदेश में अपनी भूमिका की तलाश करती है तो क्या आप को यही सफलता मिल पाएगी? खासकर उस स्थिति में जबकि दलित वोटों की ज्यादा बड़ी ताकत बहुजन समाज पार्टी वहां पहले से ही मजबूत स्थिति में है। 

कांग्रेस भी अपना यह खोया जनाधार वापस पाने की छटपटाहट में है। अशोक भारती का कहना है कि दलित समाज बहुत रणनीतिक वोटिंग करता है। वह अपना वोट बेकार नहीं जाने देना चाहता। दिल्ली में कांग्रेस-बसपा के कमजोर होने के कारण वह आम आदमी पार्टी का समर्थन करता है। 

इसी प्रकार यूपी में वह उसके साथ जाएगा जो भाजपा को हरा सके। ऐसे में यूपी के दलित वोटरों पर अरविंद केजरीवाल का जादू चल पाएगा, इसमें संदेह है। हां, अगर वे स्थानीय युवा नेताओं को साथ लेकर अपनी रणनीति बनाते हैं तो वे मायावती के वोट बैंक में बड़ा सेंध अवश्य लगा सकते हैं।

गजब का सम्मान

दलित समाज के लोगों के बीच अरविंद केजरीवाल के लिए पैदा हुआ सम्मान आश्चर्यचकित कर देता है। अरविंद केजरीवाल के शपथ ग्रहण समारोह में गोकलपुरी (सुरक्षित) विधानसभा सीट से पहुंचे उदयवीर (35 वर्ष) दलित समाज से हैं। वे अपने चारों ओर झाड़ू के तिनके बिखेरे हुए हैं। हर तिनके पर अरविंद केजरीवाल की छोटी-छोटी फोटो लगी हुई हैं। 

अरविंद केजरीवाल की फोटो से मयूर पंख सा आभास देते हुए नाचते उदयवीर कहते हैं कि वे 'अरविंद केजरीवाल जी' से बहुत प्रभावित हैं और उन्हें अपना समर्थन देने यहां आए हैं। उन्हीं की तरह त्रिलोकपुरी से आए राजेंद्र गौतम कहते हैं कि अरविंद केजरीवाल ने उनके समाज को सम्मान दिया है जो आज तक किसी दूसरे दल ने नहीं दिया। 

नगर निगम में झाड़ू लगाने वाले सफाई कर्मचारी का बेटा अगर विधायक बनता है तो यह केवल अरविंद केजरीवाल के कारण संभव हुआ है। जाहिर है कि वे 'केजरीवाल जी' को अपना समर्थन देने के लिए यहां (रामलीला मैदान) आए हैं।

एक अन्य दलित युवक अशोक कुमार का कहना है कि अरविंद केजरीवाल के रोड शो के दौरान एक महिला की उनसे हाथ जोड़े तस्वीर बहुत वायरल हुई थी। विपक्ष इसे भले ही प्रचार का हथकंडा बताए, लेकिन अगर आप अरविंद केजरीवाल के रोड शो में गए हैं तो आपको एहसास हो जाता है कि यह लगाव बनावटी नहीं था।

अरविंद केजरीवाल ने यह सम्मान किसी जाति के होने के कारण नहीं, बल्कि अपने काम की वजह से हासिल किया है जो उन्होंने सबके लिए किया है। कई विधानसभा क्षेत्रों में दलित समाज के लोग आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार का नाम तक नहीं जानते थे। उन्हें केवल यह पता होता था कि उन्हें आम आदमी पार्टी को समर्थन देना है, और इसके लिए झाड़ू पर बटन दबाना है।

राजनीतिक चिंतकों का कहना है कि इस प्रकार की सोच केवल मायावती की राजनीति के दौरान देखने को मिली थी जब लोगों को उम्मीदवार का नाम नहीं याद रहता था, बल्कि उन्हें केवल बसपा, मायावती और हाथी का निशान याद रहता था। 2014 के आम चुनाव में नरेंद्र मोदी के लिए भी इसी तरह की स्थिति देखी गई थी। इसके बाद अब अरविंद केजरीवाल ने इस तरह की सफलता हासिल की है।  

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