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फिलहाल एड्स का एकमात्र ट्रीटमेंट-एआरटी, दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने लगाई मुहर

Wed, 20 Jul 2016 03:35 AM IST
दयाशंकर शुक्ल सागर/ डरबन
दयाशंकर शुक्ल सागर/ डरबन Updated Wed, 20 Jul 2016 03:35 AM IST
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ART is The only treatment of AIDS
एड्स पर फैसला

एंटीरिटरोवायरल थेरेपी यानी एआरटी एड्स रोगियों के लिए वरदान साबित हो रही है। कांफ्र्रेंस में यहां आए दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने इलाज की इस थैरपी पर अपना भरोसा जताया। उनका कहना है कि इस दवा के अलावा एचआईवी मरीज के पास और कोई दूसरा विकल्प नहीं है।

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संक्रमण का पता चलते ही इस दवा को लेना शुरू कर देना चाहिए। यह दवा वायरस को तो खत्म नहीं करती लेकिन एचआईवी ग्रस्त इंसान की जिंदगी आसान कर सकती है। बस शर्त यह है कि बीपी की तरह यह दवा हर रोज ली जाए।
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पूरी दुनिया में लगभग 37 मिलियन लोग एचआईवी से ग्रस्त हैं। इनमें से सिर्फ 17 मिलियन लोगों को ही यह दवा मिल पा रही है। जबकि इस दवा पर प्रति मरीज सालाना खर्च सिर्फ 7000 रुपये है।
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एआर ट्रीटमेंट, तीन दवाओं का ऐसा काकटेल है जो शरीर में एचआईवी वायरस को बढ़ने से रोकता है। एड्स मरीज के लिए यह बहुत राहत की बात है। अंधेरे में जैसे उम्मीद की एक किरण। पहले समझें, एआरटी काम कैसे करता है।

शरीर में दाखिल होने के बाद एचआईवी वायरस सबसे पहले खून में मिल जाता है। करीब छह हफ्ते खून की किसी जांच में ये पकड़ में नहीं आता। इसे वैज्ञानिक विंडो पीरियड कहते हैं। फिर ये वायरस खामोशी से कोशिका में दाखिल हो जाता है और उसी में अपना घर बना लेता है। थोड़े ही वक्त में यह वायरस डीएनए में दाखिल हो जाता है।

इसे वैज्ञानिकों ने एचआईवी डीएनए नाम दिया है। इस तरह संक्रमित कोशिका जब और कोशिकाएं बनाती है तो एचआईवी डीएनए सक्रिय हो जाता है। वह एचआईवी वायरस के लिए शरीर में काफी ज्यादा मात्रा में कच्चा माल तैयार कर देता है। और एचआईवी ग्रस्त मरीज का सीडी4 काउंट तेजी से गिरकर 200 सेल्स से भी नीचे चला जाता है।

गिरता हुआ सीडी4 काउंट रोग प्रतिरोधक क्षमता को बुरी तरह से नष्ट कर देता है। इस तरह मरीज की रोगों से लड़ने की क्षमता में गुणात्मक कमी आ जाती है। वह बहुत जल्दी-जल्दी सर्दी जुकाम, बुखार, टीवी जैसे रोगों से ग्रस्त होने लगता है। दिक्कत की बात है कि उस पर कोई अन्य दवा भी काम नहीं करती।

दवा के चमत्कारिक नतीजे
एंटीरिटरोवायरल थेरेपी के कई चमत्कारिक नतीजे सामने आए हैं। एचआईवी संक्रमित मरीज अगर पता चलते ही इस दवा को लेना शुरू कर दे तो हो सकता है उसके खून की जांच में इस वायरस की गिनती यानी वायरल लोड दिखे ही नहीं।

लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि वह एचआईवी से मुक्त हो गया। इससे यह जरूर होगा कि वह न केवल सामान्य जीवन आसानी से जी सकता है बल्कि उससे दूसरों को एचआईवी से संक्रमित होने का खतरा भी कम हो जाता है।

भारत में सिर्फ आधे मरीजों को मिल रही दवा

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कांफ्रेंस में वैज्ञानिकों ने कहा एचआईवी से ग्रस्त हर मरीज को यह दवा लेनी चाहिए। ये बात डब्लूएचओ की नई गाइड लाइन में भी है। लेकिन भारत सरकार देश में कुल 21 लाख एचआईवी ग्रस्त मरीजों में आधे से भी कम लोगों को यह दवा मुहैया करा पा रही है।

सरकार की प्राथमिकता में गर्भवती महिलाएं, पंद्रह साल से कम उम्र के बच्चे और टीबी ग्रस्त एचआईवी मरीज हैं। अभी एटीआर क्लीनिकों पर यह दवा सिर्फ उन एचआईवी ग्रस्त मरीज को दी जाती है जिनका सीडी4 काउंट 350 सेल्स से नीचे है।

यहां कांफ्र्रेंस में भारत सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे नाको के डिप्टी डायरेक्टर जनरल डा. नरेश गोयल ने मंगलवार को यहां बताया कि अभी पिछले महीने एक अधिसूचना जारी कर हमने 500 सेल्स सीडी4 काउंट वाले मरीजों को भी यह दवा देने का फैसला किया है।

गोयल ने कहा अभी हम कम बजट के कारण केवल 9.5 लाख मरीजों को दवा के दायरे में ले पाए हैं। जल्द ही इस कार्यक्रम में डेढ़ लाख मरीज और जुड़ जाएंगे। जबकि डब्लूएचओ की नई गाइड लाइन 2015 कहती है कि सभी एचआईवी मरीजों को ये दवा देना अनिवार्य है।

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