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Analysis: जातीय स्वाभिमान और असंतोष के भंवर में गुजरात अस्मिता और हिंदुत्व

Wed, 29 Nov 2017 03:35 PM IST
विनोद अग्निहोत्री
विनोद अग्निहोत्री Updated Wed, 29 Nov 2017 03:35 PM IST
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Analysis: gujarat pride and hindutva are unsatisfied in gujarat assembly election

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के धुआंधार गुजरात दौरे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तूफानी प्रचार ने गुजरात विधानसभा चुनाव के मुद्दों को धार दे दी है। मुकाबला अब सीधे गुजरात अस्मिता और हिंदुत्व की कॉकटेल बनाम जातीय स्वाभिमान और 22 साल के भाजपा शासन से पैदा हुए सवालों के गठजोड़ के बीच है।

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पिछले दो दशक में पहली बार गुजरात में भाजपा के ब्रांड हिंदुत्व और नरेंद्र मोदी के गुजराती अस्मिता के कार्ड को जातीय स्वाभिमान और बदलाव की आकांक्षा से कड़ी चुनौती मिल रही है। गुजरात के एक बड़े राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखने वाले व्यवसायी नाम न छापने की शर्त पर  कहते हैं कि 1985 में माधव सिंह सोलंकी ने जब जातीय स्वाभिमान के खाम कार्ड को खेलकर 149 सीटों की जीत का रिकॉर्ड बनाया था, उसके बाद संघ ने पश्चिम भारत के इस राज्य को जहां 5 गांधी और सरदार पटेल जैसे नेता पैदा हुए, को अपने हिंदुत्व की पहली प्रयोगशाला बनाया और उसके बाद कांग्रेस की जड़ें यहां से जो उखड़ीं, वो आज तक वापस नहीं जम पाईं।
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पढ़ें: गुजरात चुनाव: चरम पर पहुंचा प्रचार, आज रण में आमने-सामने होंगे मोदी-राहुल
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लेकिन इस बार जातीय स्वाभिमान फिर हिंदुत्व के लिए चुनौती बनकर सामने आया है और यह चुनौती बेहद कड़ी है। लड़ाई इस कदर कांटे की बन गई है कि न तो भाजपा नेता 150 सीटें जीतने का दावा कर पा रहे हैं और न ही अपने पक्ष में तमाम कारण होने के बावजूद कांग्रेस अभी सत्ता वापसी का भरोसा लोगों में पैदा कर पाई है।

चुनाव आयोग के नियमों और प्रतिबंधों की वजह से अहमदाबाद में चुनावी गरमागरमी पैदा नहीं हो सकी है

Analysis: gujarat pride and hindutva are unsatisfied in gujarat assembly election

चुनाव आयोग के नियमों और प्रतिबंधों की वजह से अहमदाबाद जैसे जीवंत शहर में भी चुनावी गरमागरमी पैदा नहीं हो सकी है, लेकिन महाशक्तिशाली भाजपा के लिए चुनौती बनकर उभरे तीन युवा नेताओं हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवाणी के दांव क्या गुल खिलाएंगे इसकी चर्चा हर तरफ है।

इन्हीं तीनों ने दो दशक बाद हिंदुत्‍व की मजबूत इमारत की ईंटे दरकानी शुरू कर दी हैं। हार्दिक पटेल राज्य के 15 फीसदी पाटीदारों  को अनामत आंदोलन के जरिए गोलबंद कर रहे हैं जबकि अल्पेश ओबीसी आरक्षण पर आंच न आने देने के नाम पर 34 फीसदी ओबीसी जातियों के हितों के प्रतीक के रूप में उभरे, वहीं उना कांड से दलितों पर अत्याचार को मुद्दा बनाकर जिग्नेश ने राज्य के नौ फीसदी दलितों को हिंदुत्व के छाते से खींचने की कोशिश की है।

कांग्रेस और खासकर राहुल गांधी ने इस सामाजिक अंतर्विरोध को हवा देते हुए उसे राज्य में 22 साल से सत्ता पर काबिज भाजपा की आर्थिक नीतियों की असफलता का नतीजा बताते हुए कांग्रेस को एक विकल्प के रूप में खड़ा कर दिया है। जातीय स्वाभिमान की इस लड़ाई में पाटीदारों, ओबीसी और दलितों के अलावा राजपूतों की एक बिरादरी गिरासिया राजपूत भी कूद पड़ी है। भाजपा के हिंदुत्व के बरगद में यह बिरादरी भी एक मजबूत डाल रही है, लेकिन इस बार इनमें भी असंतोष के सुर सुनाई पड़ रहे हैं।

बोटाड जिले के भाजपा नेता प्रवीण सिंह कहते हैं कि जिस तरह टिकट बंटवारे में गिरासिया राजपूतों को भाजपा ने अनदेखा किया है, उसका असर करीब 35 सीटों पर पड़ सकता है। इसके अलावा भावनगर जिले के बुधेला गांव में गोचर भूमि पर कब्जे को लेकर भाजपा प्रदेश अध्यक्ष जीतू वाघाणी के साथ राजपूतों का जो झगड़ा हुआ, हालांकि विवाद अब शांत हो गया, लेकिन उसने भी इस बिरादरी को नाराज किया। विश्व हिंदू परिषद से जुड़े शैलेश भाई मानते हैं कि इस बार जातीय स्वाभिमान की आहट तो है लेकिन गुजरात में हिंदुत्व की जड़ें खासी गहरी हैं, इसलिए ज्यादा चिंता वाली बात नहीं है।

चुनाव में अभी तक मुसलमानों का विरोध मुद्दा नहीं

Analysis: gujarat pride and hindutva are unsatisfied in gujarat assembly election
पीएम मोदी

पहली बार चुनाव में अभी तक मुसलमानों का विरोध मुद्दा नहीं है। कांग्रेस ने भी अभी तक ऐसा कोई काम नहीं किया है, जिसे भाजपा लपक ले और अपने हिंदुत्व की धार को तेज कर सके। हालांकि 27 दिसंबर को अपनी चुनावी सभाओं में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान और हाफिज सईद के नाम पर कांग्रेस को घेरते हुए अप्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रवाद और हिंदुत्व का कार्ड खेला तो साथ ही उन्होंने जातीय स्वाभिमान की चुनौती का मुकाबला करने के लिए पटेलों और गुजरात के साथ अन्याय का जिक्र करते हुए भी कांग्रेस पर हमला किया।

मोदी ने गुजरात अस्मिता का दांव चलते हुए राहुल गांधी के गुजरात के बेटे के खिलाफ बयानबाजी पर भी निशाना साधा। लंबे समय तक गुजरात की राजनीति को करीब से जानने वाले वरिष्ठ पत्रकार आर.के. मिश्रा कहते हैं कि मोदी जी को जो बात चुनाव के आखिरी चरण में कहनी चाहिए थी, उसे उन्होंने अपनी पहली ही सभा में कह दिया। मिश्रा के मुताबिक लोग उनसे इस बयान की उम्मीद आखिरी दौर के प्रचार में कर रहे थे। इससे जाहिर है कि भाजपा नेतृत्व और खुद मोदी इसे भांप चुके हैं कि इस बार जातीय स्वाभिमान की चुनौती गंभीर है।

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