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चिंता: अफगानिस्तान में अमेरिका हारा, अब क्या सीरिया जैसे बनेंगे हालात, भारत न करे सेना तैनात

Wed, 14 Jul 2021 01:15 AM IST
सुरेंद्र जोशी शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: सुरेंद्र जोशी Updated Wed, 14 Jul 2021 01:15 AM IST
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सार
अफगानिस्तान के मौजूदा हालात चिंताजनक हो गए हैं। तालिबान का कहना है कि 'जिहाद एक इबादत है और इबादत जारी रहनी चाहिए'। रूस, चीन, पाकिस्तान, तुर्की, उज्बेक, ताजिक, तुर्कमेनिस्तान, ईरान की वहां के हालात पर सीधी नजर है। विदेशी मामलों के जानकारों का कहना है कि भारत को वहां सेना तैनात करने का सोचना भी नहीं चाहिए। 
 
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America lost in Afghanistan, will the situation become like Syria, India is advised not to deploy army
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

भारत के कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय मामले के विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका अफगानिस्तान में हार गया। तालिबान के सैन्य कमांडर हाजी हिकमत काफी पहले ही घोषणा कर चुके हैं कि अमेरिका अफगानिस्तान में हार गया है। पिछले सप्ताह अमेरिका ने गुपचुप तरीके से अपने सैनिकों को वापस बुला लिया और तब से दुनिया के आधा दर्जन से अधिक देशों में हड़कंप की स्थिति है। भारतीय सुरक्षा के जानकारों और विदेश नीति के विशेषज्ञों ने अपने देश से भी अफगानिस्तान के मामले में संवेदनशीलता बरतने, सैन्यबल की तैनाती आदि से परहेज करने की सलाह दी है।



सेना तैनाती पर सोचना भी गुनाह
विदेश मामलों के जानकार प्रो. एसडी मुनि कहते हैं कि वहां सैन्य या सुरक्षा बल तैनाती जैसे कदम पर सोचना भी गुनाह है। हालत यह है कि अफगानिस्तान में अमेरिका और भारत द्वारा प्रशिक्षित 20 हजार के करीब अफगान सुरक्षा बलों ने ताजकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और आसपास के देशों की सीमाओं में शरण ले ली है। यह स्थिति तालिबान के भय के कारण बन रही है। दूसरी तरह तालिबान लगातार अफगानिस्तान में लगातार एक नए शहर पर कब्जा करने का अभियान जारी रखे है।


भारत सरकार संवेदनशील, लगातार रख रही नजर: बागची
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने बताया कि सरकार अफगानिस्तान के हालात पर लगातार नजर रख रही है। पूर्व विदेश सचिव शशांक कहते हैं कि वहां तो हर रोज हालात जटिल होने की तरफ बढ़ रहे हैं। तालिबान का अफगानिस्तान पर प्रभाव बढ़ता जा रहा है। लग रहा है कि पड़ोसी देश में गृह युद्ध जैसे हालात पैदा हो जाएंगे। हालांकि भारत ने अफगानिस्तान में किसी तरह का कोई हस्तक्षेप नहीं किया है। 

सावधानी से कदम बढ़ाने की जरूरत

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत का उद्देश्य वहां लोगों को शिक्षित करना, सैनिकों को प्रशिक्षित करना, ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने में मदद देना, बांध का निर्माण तथा संसाधनों का विकास तक सीमित था। लेकिन इसके बावजूद सावधानी से कदम बढ़ाने की आवश्यकता है। फिलवक्त स्थिति की गंभीरता को देखते हुए भारत ने दूतावास में लोगों की संख्या बहुत सीमित कर दी है। वाणिज्यिक दूतावास की भी स्थिति इसी तरह की है। तमाम देशों ने अपने वाणिज्यिक दूतावासों को बंद करने का निर्णय ले लिया है।

क्यों सता रहा है तालिबान हुकूमत आने से डर?
जिहाद एक इबादत है और यह इबादत जारी रहनी चाहिए। तालिबान के सैन्य कमांडर हाजी हिकमत की यह घोषणा ही सब कुछ बताने के लिए काफी है, क्योंकि तालिबान का यकीन अफगानिस्तान में एक शरिया हुकूमत कायम करने में है। तालिबान के प्रवक्ता सुहैल शाहीन की भाषा भी धीरे-धीरे बदलती जा रही है। खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों के जानकारों का कहना है कि हालांकि तालिबान ने पहले की गलतियों से काफी सबक लिया है। उसकी भाषा में यह सबक दिखाई पड़ रहा है, लेकिन उसके खूंखार, बर्बर तरीके में फर्क आने की संभावना कम है। पिछले साल अफगानिस्तान से लौटे सूत्र की माने तो अफगानिस्तान में अब तालिबान की स्थिति काफी मजबूत है। उसे टक्कर देने वाला कोई नहीं है। 

90 के दशक में था नादर्न अलायंस

सूत्र का कहना है कि नब्बे के दशक में अफगानिस्तान में नादर्न अलायंस होता था। इसके सैन्य कमांडर अहमद शाह मसूद थे। तब बुरहानुद्दीन रब्बानी जैसी शख्सियत भी थी। बताते हैं अहमद शाह मसूद की हत्या के बाद नादर्न अलायंस धीरे-धीरे बिखर गया है। अब उनके बेटे अहमद मसूद की न तो वह ताकत है और न ही लोगों के बीच अहमद शाह मसूद जैसा रुतबा। अभी स्थानीय सैन्य कमांडरों के पास अपना संगठन तो है, लेकिन न तो उनके पास पर्याप्त संसाधन हैं और न हथियार।

दोस्तम ले सकते हैं मोर्चा
हेरात, कंधार, काबुल समेत कई क्षेत्र का दौरा कर चुके सूत्र की मानें तो अफगानिस्तान में अब्दुल रशीद दोस्तम तालिबान से मोर्चा लेने वाले सैन्य कमांडरों में हैं। दोस्तम उज्बेक मूल के हैं और अपने बेटे यार मोहम्मद के साथ लोगों को एकजुट कर रहे हैं, लेकिन तालिबान के मुकाबले उनकी क्षमता काफी कम है। यही स्थिति ताजिक मूल के अतामोहम्मद नूर और हाजारा क्षेत्र में रसूख रखने वाले मोहम्मद मोहाकिक की भी है। सैन्य कमांडर इस्माइल खान के क्षेत्र हेरात में तालिबान पहले ही कब्जा कर चुका है।

क्या सीरिया बन जाएगा अफगानिस्तान?
कुछ भारतीय जानकारों ने कहा कि अभी इस पर प्रतिक्रिया देना ठीक नहीं है, लेकिन इस तरह की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। संभव है कि अमेरिका वहां सीरिया जैसा प्रयोग करे। तुर्की की काबुल में मौजूदगी और अपने सैनिकों को रोक कर रखना, तालिबान के प्रवक्ता द्वारा तुर्की को अपने सैनिकों को वापस बुलाने की चेतावनी भी एक संकेत कर रही है। 

विदेश मामलों के जानकार एस के शर्मा कहते हैं कि अफगानिस्तान में अपने हितों की रक्षा के लिए वहां तमाम कबीलों के सरदार हैं। अमेरिका ने पहले पाकिस्तान से बलूचिस्तान में अपने सैन्य अड्डे की अनुमति मांगी थी, लेकिन पाकिस्तान ने मना कर दिया। संभव है कि काबुल में मौजूदगी के जरिए तुर्की अमेरिका को साध सके। क्योंकि काबुल के हवाई मार्ग से ही मध्य एशिया की उड़ानें होती हैं। यहां की मौजूदगी भी महत्वपूर्ण है। वैसे भी नाटो के सदस्य देश तुर्की और अमेरिका के रिश्ते में कडुवाहट आई है। तुर्की रूस के करीब चला गया था। संभव है कि इस बहाने तुर्की सब कुछ साधने की जुगत में हो। इसलिए तुर्की की भूमिका पर न केवल तालिबान, अफगानिस्तान के तमाम गुटों, बल्कि दुनिया के देशों की निगाह है। 

रूस, चीन, पाकिस्तान, ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान सब परेशान

ताजकिस्तान से अफगानिस्तान की सीमा कोई 1344 किमी लगती है। इसके अलावा उज्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ईरान समेत अन्य देशों से लगती है। सभी पड़ोसी देश अफगानिस्तान में अस्थिरता फैलने की आशंका से परेशान हैं। सभी देशों ने अपने सीमाओं की रक्षा के लिए अफगानिस्तान सीमा पर सैनिकों की संख्या बढ़ाना शुरू कर दिया है। 

तुर्कमेनिस्तान तो राकेट लांचर, लड़ाकू विमान तैनात करने की योजना बना रहा है। रूस ने टैंकों और सैन्य दस्तों को भेजने का मन बनाया है। चीन, पाकिस्तान और तालिबानी नेताओं से संपर्क के सहारे अपना हित साधने में जुटा है। इस पूरे प्रयास में चीन, रूस, ईरान क्षेत्र में किसी तीसरी शक्ति के दखल को रोकने और सामूहिक प्रयास से समस्या के समाधान का रास्ता ढूंढने में लगे हैं।

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