‘हिंदी हैं हम’: अंतरराष्ट्रीय वेबिनार- भाषिक संस्कार ही हमें अपनी संस्कृति से जोड़ते हैं
हिंदी हमारी मातृभाषा है। यह विचारों, भावनाओं और संवेदनाओं को व्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम है। इसी के जरिये हम अपनी बात को सहजता और सुगमता से दूसरों तक पहुंचा पाते हैं।
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हिंदी हमारी मातृभाषा है। यह विचारों, भावनाओं और संवेदनाओं को व्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम है। इसी के जरिए हम अपनी बात को सहजता और सुगमता से दूसरों तक पहुंचा पाते हैं। हिंदी की लोकप्रियता और पाठकों से उसके रिश्तों को सम्मान देते हुए अमर उजाला ‘हिंदी हैं हम’ अभियान चला रहा है। इसी अभियान की कड़ी में विदेशों में हिंदी के संवाहकों से हिन्दी की स्थिति और उसके संवर्धन के लिए विस्तार से विचार विमर्श किया गया। इस वेबिनार में रेखा राजवंश, कवयित्री और लेखिका (सिडनी, ऑस्ट्रेलिया), सुभाषिनी लता कुमार, हिंदी भाषा और साहित्य की प्राध्यापिका (नेशनल यूनिवर्सिटी, फिजी), डॉ. पुष्पा भारद्वाज, हिंदी अनुवादक और वैलिंगटन में प्रौढ़ों को हिंदी पढ़ाने में योगदान (न्यूजीलैंड), आराधना झा श्रीवास्तव (सिंगापुर), संतोष गुप्ता (ऑस्ट्रेलिया) और नवीन कुमार सिंह (दक्षिण कोरिया) शामिल हुए।
सबसे पहले रेखा राजवंशी ने ऑस्ट्रेलिया में हिन्दी की स्थिति से अवगत कराया। उन्होंने हिंदी के विकास के लिए सिडनी में सप्ताहांत में हिन्दी अध्यापन कार्य किया। अपने वक्तव्य में यह कहा कि सिडनी में नई पीढ़ी अपनी जरूरतों के लिए हिन्दी सीखना चाहते थे। उनके कुछ विद्यार्थी सिर्फ इसलिए हिन्दी सीख रहे थे क्योंकि उनको भारतीय लड़के-लड़कियों से शादी करनी थी। एक ऑस्ट्रेलियाई लड़की सिर्फ इस लिए हिन्दी सीख रही थी ताकि वह हिन्दी बोलकर अपने होने वाले सास-ससूर का दिल जीत सके। उन्होंने हिन्दी शिक्षण के और भी कई रोचक किस्से सुनाए। रेखा जी ने आगे कहा कि विदेश आकर हम प्रांतों से निकल कर सिर्फ भारतीय होते हैं। यहाँ आकर ज्यादा भारतीय हो जाते हैं। लोग जड़ों से जुड़े रहना चाहते हैं। यहाँ हिन्दी फिल्मों का भी लोगों में काफी क्रेज है।
कनबेर हिन्दी स्कूल के संस्थापक संतोष कुमार गुप्ता ने कहा कि लोग हिन्दी बोलते वक्त खुद को ही समझते हैं। सोचते हैं कि हिन्दी बोलने पर पूरा सम्मान नहीं मिलेगा। उन्होंने उदाहरण दिया कि जिस तरह जापान, रूस, फ्रांस, जर्मनी आदि के राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री अपनी मातृ भाषा में बोलते हैं उसी तरह हमारे राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री को विदेशों में हिन्दी में ही अपना भाषण देना चाहिए। ताकि हमारे नौनिहालों के मन में अपनी मातृभाषा के प्रति सम्मान का भाव जागे। आगे उन्होंने कहा कि बच्चों को लगता है हिंदी की कोई आवश्यकता नहीं है लेकिन उन्हें यह समझना होगा कि अपनी मातृभाषा सिर्फ भाषा नहीं है बल्कि उसके साथ अपनी संस्कृति भी जुड़ी हुई है, अगर अपनी भाषा छोड़ देंगे तो अपनी संस्कृति भी छूट जाएगी।
आराधना झा श्रीवास्तव, सिंगापुर में रहती हैं और स्वतंत्र लेखन करती हैं। सिंगापुर में कई संस्थाओं के सहयोग से हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए कार्य कर रही हैं। उन्होंने बताया कि सिंगापुर की यह विशेषता है कि यहाँ द्वितीय भाषा के रूप में हिन्दी पढ़ाई जाती है। उन्होंने वहाँ के ऐसे विद्यार्थियों को देखा जो धारा-प्रवाह हिन्दी बोलते हैं। एक विदेशी छात्र ने तो सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता 'लक्ष्मी बाई' धारा-प्रवाह गा कर लोगों को चकित कर दिया। उन्होंने आगे कहा कि हमें भारतीय संस्कृति के प्रति सम्मान के भाव को कभी कम नहीं होने देना चाहिए। एक ही तरह के लोग सभी जगह मिलेंगे। परिवार समाज की प्राथमिक इकाई है इसलिए सभी माता-पिता को अपने बच्चों को भाषा का संस्कार देना चाहिए। विश्व के किसी भी कोने में रह कर अगर ऐसा करेंगे तो हिंदी का भविष्य उज्जवल है। सिंगापुर संगम पहली ऑनलाइन हिंदी पत्रिका है।