नोटबंदी के बाद देश का पहला कैशलेस गांव बना ठाणे का धसई
नोटबंदी के बाद देश में कैशलेस यानी नगद भुगतान से मुक्त गांव बनाने की शुरुआत हो गई है। इसका शुभारंभ देश की आर्थिक राजधानी मुंबई से करीब 150 किलोमीटर दूर ठाणे जिले के मुरबाड़ तालुका स्थित धसई गांव में हुआ है जहां बृहस्पतिवार को सूबे के वित्तमंत्री सुधीर मुनगंटीवार ने डेविड कार्ड से चावल खरीदा। अब यहां किराणा व्यापारी से लेकर महाराष्ट्र के मशहूर व्यंजन वडापाव बेचने वाले भी अपनी दुकान में स्वैप मशीन रखे हैं और लोगों ने इसका इस्तेमाल भी शुरू कर दिया है। इससे धसई गांव देश का पहला ऐसा गांव बन गया है। जहां नगदी की जरूरत नहीं रह गई है और प्लास्टिक मनी कार्ड से सभी लेनदेन शुरू होे चुका है।
ठाणे जिले का धसई गांव दूसरे गांवों जैसा ही है। इस गांव में कभी तहसीलदार नहीं आते थे लेकिन, राज्य के वित्तमंत्री पहुंचे। धसई गांव एक बड़े ग्रामीण बाजार के रूप में भी प्रसिद्ध है। यहां की आबादी दस हजार है। इस गांव में डेढ़ सौ से अधिक व्यापारी प्रतिदिन एक करोड़ रुपये का व्यवसाय करते हैं। धसई सहकारी सोसायटी से कई व्यापारी जुड़े हुए हैं जिनका दुग्ध, अनाज और किराणा का व्यवसाय है।
धसई बाजार में न सिर्फ गांव के लोग बल्कि आसपास के गांव आनंदवाड़ी, पलू, सोनावले, रामपुर, कलंबाड़, मिल्हे, देवरी खेवारे और जायगाव के नागरिक और व्यापारी भी यहां खरीदी-बिक्री के लिए आते हैं। धसई बाजार आसपास के करीब 70 गांवों का केंद्र है। इस गांव को कैशलेस बनाने में मुंबई की स्वतंत्रवीर सावरकर स्मारक संस्था ने अहम योगदान दिया है।
स्मारक के कार्यकारी अध्यक्ष रणजीत सावरकर बताते हैं कि धसई गांव 50 फीसदी पिछड़ा हैं जहां आदिवासियों की भी आबादी है। शुरुआत में लोगों को लगता था कि ऐसा नहीं हो सकता लेकिन, बाद में लोगों ने सहयोग किया।
सभी के पास है जन धन एकाउंट और डेविड कार्ड
रणजीत सावरकर ने बताया कि यहां के प्रत्येक नागरिकों का जन धन के तहत बैंक एकाउंट है। इसलिए डेविड कार्ड के इस्तेमाल में कोई दिक्कत नहीं है। अब सभी लोग वड़ापाव से लेकर सब्जी, अनाज ही नहीं, बल्कि अपने डेविड कार्ड से सैलून और मोटर गैरेज सहित खेती के लिए ट्रैक्टर के किराए का भी भुगतान कर सकते हैं।
इसमें बैंक ऑफ बड़ौदा के शीर्ष अधिकारियों महाप्रबंधक नवतेज सिंह, डीजीएम श्रीधर राव और विपणन प्रबंधक कौस्तुभ शुक्ल का सहयोग मिला जिससे नोटबंदी के बाद धसई देश का पहला कैशलेस गांव बन सका।
रणजीत सावरकर ने बताया कि पहले इस गांव को पायलट प्रोजेक्ट के तहत चुना गया था। अब दूसरे गांव को भी कैशलेस बनाने की दिशा में काम शुरू है। बता दें कि अमर उजाला ने ही सबसे पहले इस गांव के कैशलेस बनने की खबर ब्रेक की थी और अब इसकी शुरुआत भी हो गई है।