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केंद्र बनाम राज्य: गर्दन झुक जाती तो टल सकता था मोदी और दीदी के बीच का विवाद, बदलेगा मुख्य सचिवों का काम करने का तरीका

Tue, 01 Jun 2021 05:49 PM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Tue, 01 Jun 2021 05:49 PM IST
सार

पूर्व चीफ सेक्रेटरी राकेश मेहता बताते हैं, मुख्यमंत्री की सलाह पर केंद्र ही तो चीफ सेक्रेटरी की नियुक्ति करता है। पीएमओ या सीएमओ के बीच कई बार टकराहट हो जाती है, लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं है कि आप राज्य के शीर्ष अधिकारी को तंग करना शुरू कर दें...

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After alapan bandyopadhyay issue centre could change the working responsibilities of chief secretaries of states
पीएम मोदी, अलपन बंद्योपाध्याय और ममता बनर्जी - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

पश्चिम बंगाल के चीफ सेक्रेटरी अलपन बंदोपाध्याय को लेकर प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच विवाद गहराता जा रहा है। ममता बनर्जी ने बंदोपाध्याय को मुख्य सचिव पद से रिटायर कर अपना प्रमुख सलाहकार बना लिया है। दूसरी तरफ केंद्र ने अलपन को आपदा प्रबंधन एक्ट 2005 के तहत कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया है। उन्हें तीन दिन में नोटिस का जवाब देना है। हालांकि इस मामले में ज्यादा कुछ नहीं हो सकेगा, क्योंकि बंदोपाध्याय अब रिटायर हो गए हैं। उनकी पेंशन और रिटायरमेंट से संबंधित दूसरी औपचारिकताएं पश्चिम बंगाल में ही पूरी होंगी। 1975 बैच के आईएएस अधिकारी राकेश मेहता जो 2007 और 2011 के बीच दिल्ली के मुख्य सचिव रहे हैं, उनका कहना है कि राज्य प्रशासन की ओर से अगर थोड़ी बहुत गर्दन झुक जाती तो आज प्रधानमंत्री मोदी और ममता बनर्जी के बीच यह विवाद आगे नहीं बढ़ता। अलपन बंदोपाध्याय, मात्र एक ईमेल या फोन कॉल कर पीएमओ को समय रहते सफाई दे देते कि वे पहले से तय किसी बैठक में हिस्सा ले रहे हैं, तो प्रधानमंत्री कार्यालय और मुख्यमंत्री कार्यालय का अहम नहीं टकराता। खैर, इस प्रकरण से मुख्यसचिवों की भूमिका में अब बड़ा बदलाव संभावित है।

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राजनीतिक लड़ाई में आईएएस का इस्तेमाल हो रहा है

पूर्व चीफ सेक्रेटरी राकेश मेहता बताते हैं, दरअसल अलपन बंदोपाध्याय के मामले में पीएमओ और सीएमओ का अहंकार टकरा रहा है। देश का प्रधानमंत्री किसी राज्य में जाकर कोई बैठक बुलाएं और उसमें राज्य का शीर्ष अधिकारी ही न पहुंचे तो वह एक गलत परंपरा को जन्म दे देता है। मुख्यमंत्री की सलाह पर केंद्र ही तो चीफ सेक्रेटरी की नियुक्ति करता है। यह लड़ाई तो राजनीतिक है, लेकिन इसमें एक आईएएस अधिकारी का इस्तेमाल किया जा रहा है। पीएमओ या सीएमओ के बीच कई बार टकराहट हो जाती है, लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं है कि आप राज्य के शीर्ष अधिकारी को तंग करना शुरू कर दें।

आईएएस अधिकारी अपने मुख्यमंत्री से बाहर कैसे जा सकता है, मगर उसे प्रधानमंत्री के प्रोटोकॉल को भी ध्यान में रखना है। इस प्रकरण में बात आगे नहीं बढ़ती, यदि अलपन बंदोपाध्याय पीएमओ को एक ईमेल लिख देते या फोन कर देते। उन्हें यही बताना था कि वे पहले से तय किसी बैठक में हिस्सा लेने जा रहे हैं। उनकी इस सफाई से पीएमओ खफा नहीं होता। सिविल सर्वेंट हैं, कभी-कभार झुकना भी पड़ता है। इस तरह के विवाद को टालने के लिए दोनों तरफ से यानी पीएमओ और सीएमओ, द्वारा कदम आगे बढ़ाया जाना चाहिए।

नोटिस जारी कर पीएमओ अपनी अप्रसन्नता जाहिर कर रहा है

डीओपीटी द्वारा अलपन बंदोपाध्याय को कारण बताओ नोटिस जारी करने के मामले में राकेश मेहता का कहना है, केंद्र इस कदम से अपनी अप्रसन्नता जाहिर कर रहा है। यहां पर भी बात अहम पर आकर टिक जाती है। ये सोचने वाली बात है कि तीन माह में केंद्र, बंदोपाध्याय से क्या काम करा लेता। उन्हें कौन सा मंत्रालय मिल जाता। बंदोपाध्याय के खिलाफ कोई मामला नहीं है, विजिलेंस जांच पेंडिंग नहीं है। उनकी पेंशन भी नहीं रोकी जा सकती।

राकेश मेहता बताते हैं, जब मैं दिल्ली में चीफ सेक्रेटरी था तो मुख्यमंत्री शीला दीक्षित कई बार कह देती थीं कि एलजी की बैठक में जाओ या न जाओ। कई बार हम खुद ही कह देते थे कि जनहित से जुड़ी अहम फाइल पर चर्चा करनी है, जाना चाहिए। वे कह देती थीं, ठीक है जाओ। यह एक आईएएस अधिकारी के ऊपर भी निर्भर करता है कि वह स्थितियों को कैसे हैंडल करता है। अब बंदोपाध्याय के मामले के बाद यह संभावित है कि डीओपीटी मुख्य सचिवों की भूमिका और प्रोटोकॉल को लेकर कुछ नए दिशा निर्देश जारी करे। बतौर मेहता, मुझे लगता है कि सरकार ऐसा करेगी। हो सकता है कि नए नियमों के बाद चीफ सेक्रेटरी की भूमिका कुछ बदल जाए।

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दीदी ने कहा, नौकरशाह को बंधुआ मजदूर मानते हैं पीएम

ममता बनर्जी ने इस मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर जमकर हमला बोला है। उन्होंने कहा, पीएम मोदी, नौकरशाहों के साथ बंधुआ मजदूर की तरह व्यवहार करते हैं। यदि किसी नौकरशाह को उसकी जीवनभर की बेहतरीन सेवाओं के लिए अपमानित किया जाएगा तो सरकार और पीएम के लिए क्या संदेश बाहर जाएगा। केंद्र सरकार में बहुत से बंगाली आईएएस अधिकारी हैं। क्या मैं प्रधानमंत्री से सलाह किए बिना उन्हें वापस बुला सकती हूं। मंगलवार को इस विवाद में बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ भी कूद पड़े हैं। उन्होंने मंगलवार को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को झूठा करार दे दिया। धनखड़ ने कहा, यास तूफान से हुए नुकसान की समीक्षा के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बंगाल में बैठक की थी। इस बैठक में ममता बनर्जी नहीं पहुंचीं। बैठक से गायब होने की जो वजह उन्होंने बताई, वह झूठी है। ममता बनर्जी ने 27 मई को रात सवा ग्यारह बजे मुझे मैसेज किया था। ममता ने फोन पर इस बात के संकेत दिए कि वह और उनके अधिकारी पीएम की बैठक में नहीं जाएंगे। उनकी झूठी बातों से मजबूर होकर मैंने पूरा रिकॉर्ड सामने रख दिया है।

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