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अधीर का दीदी को ऑफर: बचे विधायकों-सांसदों संग कांग्रेस में लौटें ममता, जानें बंगाल टीएमसी को लेकर क्या कहा?
Thu, 01 Oct 2026 06:05 PM IST
अस्मिता त्रिपाठी
पीटीआई, कोलकाता।
पीटीआई, कोलकाता।
Published by: अस्मिता त्रिपाठी
Updated Thu, 01 Oct 2026 06:05 PM IST
सार
कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी से कांग्रेस में लौटने की अपील की है। उन्होंने कहा कि ममता अपने बचे विधायकों और सांसदों के साथ कांग्रेस में शामिल हों। चौधरी ने बंगाल में ममता का नेतृत्व स्वीकार कर उनके साथ काम करने की इच्छा जताई।
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कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने गुरुवार को टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी से अपील की। उन्होंने कहा कि वे अपने बचे हुए विधायकों और सांसदों के साथ पार्टी में वापस आ जाएं। उन्होंने कहा कि कांग्रेस पश्चिम बंगाल में उनका नेतृत्व स्वीकार करने को तैयार है।
चौधरी ने क्या कहा?
चौधरी की यह अपील ऐसे समय में आई है जब टीएमसी अपने गठन के बाद से सबसे बड़े संगठनात्मक संकट से जूझ रही है। 2026 के विधानसभा चुनावों में हार के बाद पार्टी के विधायी और संसदीय दोनों ही विंग में अलग-अलग बगावत देखने को मिली है। पार्टी में हुई फूट का जिक्र करते हुए राज्य कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष चौधरी ने कहा, 'इस समय किसी अलग पार्टी की जरूरत नहीं है। विधानसभा चुनावों में हार के बाद टीएमसी में अब कुछ खास नहीं बचा है।' बनर्जी ने लगभग तीन दशक पहले कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस बनाई थी।
उन्होंने कहा, 'हम ममता बनर्जी से आग्रह करेंगे कि वे अपने सभी बचे हुए विधायकों और सांसदों के साथ कांग्रेस में शामिल हो जाएं। हम बंगाल में उनका नेतृत्व स्वीकार करेंगे और उनके साथ मिलकर काम करेंगे।'
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क्या है पूरा मामला?
294 सदस्यों वाली विधानसभा के चुनावों में टीएमसी ने 80 सीटें जीती थीं, जबकि भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। हालांकि, चुनाव नतीजों के कुछ ही हफ्तों के भीतर टीएमसी की विधायक दल में फूट पड़ गई। 58 बागी विधायकों ने पार्टी से निकाले गए नेता रिताब्रता बनर्जी को अपना नेता प्रतिपक्षचुना और विधानसभा अध्यक्ष ने इस विरोधी गुट को मान्यता दे दी।
बगावत के बाद टीएमसी में क्या हुआ?
इस बगावत के बाद टीएमसी के संसदीय विंग में भी उथल-पुथल मच गई और बागी सांसदों ने भी ममता बनर्जी के नेतृत्व को चुनौती दी। विधानसभा और संसद में एक साथ हुई इस फूट ने चुनाव के बाद शुरू हुए मतभेद को पार्टी की पहचान और भविष्य को लेकर एक बड़े संगठनात्मक संघर्ष में बदल दिया है।
चौधरी ने बनर्जी के कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्षी मंच से हालिया जुड़ाव को उनके विलय के प्रस्ताव से जोड़ने की कोशिश की। उन्होंने कहा, 'चूंकि उन्होंने कांग्रेस के नेतृत्व वाले इंडिया गठबंधन का सहारा लिया है, इसलिए उन्हें पार्टी में शामिल हो जाना चाहिए। बंगाल में, हम कांग्रेस में आपके नेतृत्व में काम करेंगे।' लोकसभा में पार्टी के पूर्व नेता ने बनर्जी से 'अपना बोझ पीछे छोड़कर' कांग्रेस में शामिल होने को भी कहा - यह इशारा उनके भतीजे और टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी की ओर था।
इस प्रस्ताव में एक तरह का राजनीतिक विरोधाभास है। टीएमसी खुद 1998 में बनर्जी के कांग्रेस से अलग होने के बाद बनी थी और बाद में कांग्रेस और लेफ्ट फ्रंट दोनों को चुनौती देकर अपनी राजनीतिक पहचान बनाई थी। इसने 2011 में लेफ्ट फ्रंट के 34 साल के शासन को खत्म किया और अगले 15 वर्षों तक बंगाल की राजनीति पर दबदबा बनाए रखा। हालांकि, टीएमसी सांसद सौगत रॉय ने कहा कि पार्टी ऐसे प्रस्ताव पर तभी विचार करेगी जब वह कांग्रेस नेतृत्व की ओर से औपचारिक रूप से आएगा।
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चौधरी ने क्या कहा?
चौधरी की यह अपील ऐसे समय में आई है जब टीएमसी अपने गठन के बाद से सबसे बड़े संगठनात्मक संकट से जूझ रही है। 2026 के विधानसभा चुनावों में हार के बाद पार्टी के विधायी और संसदीय दोनों ही विंग में अलग-अलग बगावत देखने को मिली है। पार्टी में हुई फूट का जिक्र करते हुए राज्य कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष चौधरी ने कहा, 'इस समय किसी अलग पार्टी की जरूरत नहीं है। विधानसभा चुनावों में हार के बाद टीएमसी में अब कुछ खास नहीं बचा है।' बनर्जी ने लगभग तीन दशक पहले कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस बनाई थी।
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उन्होंने कहा, 'हम ममता बनर्जी से आग्रह करेंगे कि वे अपने सभी बचे हुए विधायकों और सांसदों के साथ कांग्रेस में शामिल हो जाएं। हम बंगाल में उनका नेतृत्व स्वीकार करेंगे और उनके साथ मिलकर काम करेंगे।'
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क्या है पूरा मामला?
294 सदस्यों वाली विधानसभा के चुनावों में टीएमसी ने 80 सीटें जीती थीं, जबकि भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। हालांकि, चुनाव नतीजों के कुछ ही हफ्तों के भीतर टीएमसी की विधायक दल में फूट पड़ गई। 58 बागी विधायकों ने पार्टी से निकाले गए नेता रिताब्रता बनर्जी को अपना नेता प्रतिपक्षचुना और विधानसभा अध्यक्ष ने इस विरोधी गुट को मान्यता दे दी।
बगावत के बाद टीएमसी में क्या हुआ?
इस बगावत के बाद टीएमसी के संसदीय विंग में भी उथल-पुथल मच गई और बागी सांसदों ने भी ममता बनर्जी के नेतृत्व को चुनौती दी। विधानसभा और संसद में एक साथ हुई इस फूट ने चुनाव के बाद शुरू हुए मतभेद को पार्टी की पहचान और भविष्य को लेकर एक बड़े संगठनात्मक संघर्ष में बदल दिया है।
चौधरी ने बनर्जी के कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्षी मंच से हालिया जुड़ाव को उनके विलय के प्रस्ताव से जोड़ने की कोशिश की। उन्होंने कहा, 'चूंकि उन्होंने कांग्रेस के नेतृत्व वाले इंडिया गठबंधन का सहारा लिया है, इसलिए उन्हें पार्टी में शामिल हो जाना चाहिए। बंगाल में, हम कांग्रेस में आपके नेतृत्व में काम करेंगे।' लोकसभा में पार्टी के पूर्व नेता ने बनर्जी से 'अपना बोझ पीछे छोड़कर' कांग्रेस में शामिल होने को भी कहा - यह इशारा उनके भतीजे और टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी की ओर था।
इस प्रस्ताव में एक तरह का राजनीतिक विरोधाभास है। टीएमसी खुद 1998 में बनर्जी के कांग्रेस से अलग होने के बाद बनी थी और बाद में कांग्रेस और लेफ्ट फ्रंट दोनों को चुनौती देकर अपनी राजनीतिक पहचान बनाई थी। इसने 2011 में लेफ्ट फ्रंट के 34 साल के शासन को खत्म किया और अगले 15 वर्षों तक बंगाल की राजनीति पर दबदबा बनाए रखा। हालांकि, टीएमसी सांसद सौगत रॉय ने कहा कि पार्टी ऐसे प्रस्ताव पर तभी विचार करेगी जब वह कांग्रेस नेतृत्व की ओर से औपचारिक रूप से आएगा।