मानवाधिकार आयोग के अध्ययन में हुआ खुलासा, केवल 2 फीसदी ट्रांसजेंडर ही रह पाते हैं परिवार के साथ
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भारत में 92 फीसदी ट्रांसजेंडर लोगों से देश की आर्थिक गतिविधियों में सहयोग करने के अधिकारों को छीन लिया जाता है। कई बार तो ऐसा भी होता है कि योग्यता होने के बावजूद भी उन्हें नौकरी नहीं दी जाती। ट्रांसजेंडर लोगों को भीख मांगने या फिर सेक्स का काम करने के लिए विवश किया जाता है। यह बात राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) द्वारा ट्रांसजेंडर के अधिकारों पर किए गए अध्ययन में सामने आई है।
एनएचआरसी की ओर से केरल की डेवलपमेंट सोसाइटी द्वारा किए गए इस अध्ययन में पता चला है कि ट्रांसजेंडर लोगों को अलगाव की स्थिति में अपना जीवन बिताना पड़ता है। ज्यादातर जगह उनके साथ भेदभाव किया जाता है।
भारत जैसे 'लिंग विशिष्ट देश' में इन लोगों को पहचान से संबंधित परेशानी का सामना करना पड़ता है। देश में चाहे बात शौचालय की हो या फिर पैन कार्ड, राशन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस और एयरपोर्ट चेक की। हर जगह केवल दो ही लिंग के विकल्प होते हैं- महिला और पुरुष। कहीं पर भी इस तीसरे लिंग के बारे में नहीं लिखा होता है। हालांकि अब हालात सुधर रहे हैं और कई फार्म और अन्य स्थानों पर तीसरे लिंग का विकल्प भी लिखा जाने लगा है।
अध्ययन में यह बात भी सामने आई है कि करीब 57 फीसदी ट्रांसजेंडर सेक्स-रिअलाइटमेंट सर्जरी कराने के इच्छुक हैं लेकिन वह उसका खर्चा नहीं झेल सकते हैं। आर्थिक गतिविधियों के मामले में वह पूरी तरह से गायब प्रतीत होते हैं। कम शिक्षा और सामाजिक बहिष्कार उनके रोजगार और आजीविका के अवसरों को सीमित कर देते हैं।
एनएचआरसी के मुताबिक ट्रांसजेंडर को बचपन से ही भेदभाव का सामना करना पड़ता है। उनके जीवन में माता पिता भी सक्रिय भूमिका नहीं निभाते। उन्हें माता पिता के अलावा बहन भाई और बाकी रिश्तेदारों के ताने भी सुनने पड़ते हैं। परिवार द्वारा उन्हें कहा जाता है कि वह अपनी पहचान दुनिया से तब तक छुपाकर रखें जब तक वह रख सकते हैं। कई बार अगर किसी को उनके बच्चे पर शक हो जाए तो वह बच्चों में शारीरिक और मानसिक दोष की बात कहने से भी पीछे नहीं हटते हैं। यहां तक कि इन लोगों को इनके परिवार की विरासत में भी कोई अधिकार नहीं मिलता है।
अध्यापक और सहपाठी भी करते हैं शोषण
ट्रांसजेंडर लोगों में केवल 2 फीसदी ही अपने माता पिता के साथ रह पाते हैं। वहीं अगर यह पढ़ने लिखने की भी सोचें तो इनके लिए वह सब भी काफी मुश्किल होता है। अध्ययन में पता चला है कि इनमें से 52 फीसदी के साथ सहपाठियों द्वारा उत्पीड़न किया जाता है। 15 फीसदी के साथ अध्यापक शोषण करते हैं। इसी कारण वह अपनी शिक्षा पूरी नहीं कर पाते और बीच में ही छोड़ देते हैं। हालात तो ऐसे हैं कि यह इस बात के लिए वह पुलिस में भी शिकायत नहीं करते।
कई के साथ तो रेप और गैंगरेप भी होता है लेकिन फिर भी पुलिस को शिकायत नहीं की जाती। इसका कारण है कि पुलिस भी उनके साथ भेदभाव करती है और उनका शोषण करने से पीछे नहीं हटती। रेप जैसी वारदातों से बचने के लिए कई तो खुद को पुरुष बताकर ही जीवन जीते हैं। सरकार की ओर से इनके लिए ऐसा कोई कानून नहीं है कि यह शादी करके अपना घर बसा सकें।
इन्हें किराए के घर में रहने में भी परेशानी होती है। हाल ही में मुंबई में रहने वाले एक फिल्मकार को केवल इसलिए घर खाली करने को कहा गया क्योंकि वह ट्रांसजेंडर है। इसके अलावा दिल्ली के एक कॉल सेंटर में काम करने वाले के साथ भी यही हुआ। काम में निपुण होने के बावजूद भी उसे काम छोड़ने को कहा गया। देश में केवल तमिलनाडु ही एक ऐसा राज्य है जहां इनके विकास के लिए कदम उठाए जा रहे हैं। वहां इन्हें शिक्षा, पहचान पत्र, सब्सिडी वाला खाना और फ्री हाउसिंग जैसी सुविधाएं प्रदान की जा रही हैं।