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स्वास्थ्य सेवाओं पर सरकार की मदद: आम लोगों का खर्च घटा, इन छह कारणों से मिली मदद; एनएचए के आंकड़ों से खुलासा

Mon, 11 Nov 2024 06:17 AM IST
दीपक कुमार शर्मा अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Mon, 11 Nov 2024 06:17 AM IST
सार

राष्ट्रीय स्वास्थ्य लेखा (एनएचए) के 2021-22 के लिए जारी आंकड़ों के मुताबिक, 2014-15 से 2021-22 के बीच सरकार की ओर से स्वाथ्य सेवाओं पर किया जाने वाला खर्च (जीएचई) जीडीपी के 1.13 फीसदी से बढ़कर 1.84 फीसदी पहुंच गया है। इसके अतिरिक्त, सरकार के कुल खर्च में जीएचई की हिस्सेदारी 3.94 फीसदी से बढ़कर 6.12 फीसदी पहुंच गई है।

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According to NHA data common people expenditure decreased due to help of government on health services
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : adobe photo

विस्तार

सरकार की ओर से हेल्थकेयर में निवेश बढ़ाने और बेहतर बुनियादी ढांचे के कारण स्वास्थ्य देखभाल पर आम लोगों की जेब से होने वाले खर्च में कमी आई है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य लेखा (एनएचए) के 2021-22 के लिए जारी आंकड़ों के मुताबिक, 2014-15 से 2021-22 के बीच सरकार की ओर से स्वाथ्य सेवाओं पर किया जाने वाला खर्च (जीएचई) जीडीपी के 1.13 फीसदी से बढ़कर 1.84 फीसदी पहुंच गया है। इसके अतिरिक्त, सरकार के कुल खर्च में जीएचई की हिस्सेदारी 3.94 फीसदी से बढ़कर 6.12 फीसदी पहुंच गई है।

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यह आंकड़ा सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रति सरकार की मजबूत प्रतिबद्धता का संकेत है। इस अवधि के दौरान स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति खर्च भी 1,108 रुपये से तीन गुना बढ़कर बढ़कर 3,168 रुपये पहुंच गया है। यह वृद्धि सरकार को सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने, सेवाओं को अधिक किफायती और आम लोगों के लिए सुलभ बनाने में सक्षम बनाती है। इससे सीधे तौर पर आउट ऑफ पॉकेट एक्सपेंडिचर (ओओपीई) में कमी आती है।  कोविड-19 महामारी को लेकर सरकार की प्रतिक्रिया से इस बदलाव पर और अधिक जोर दिया गया। इसके तहत, निवेश से तत्काल स्वास्थ्य जरूरतों और गैर-संचारी रोगों के बढ़ने जैसी दीर्घकालिक स्वास्थ्य चुनौतियों से निपटने दोनों पर ध्यान दिया गया है।
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देश में क्या है ओओपीई का मतलब और असर
स्वास्थ्य सेवाओं में ओओपीआई का मतलब उस खर्च से है, जिसका भुगतान लोग अपनी जेब से करते हैं। इसमें डॉक्टर की फीस, दवाओं और अस्पताल में भर्ती का खर्च शामिल है। देश में उच्च ओओपीई लंबे समय से एक महत्वपूर्ण चुनौती रही है। खासकर, कम आय वाले परिवारों के लिए।

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  • उच्च ओओपीई लोगों को अपनी आय या बचत का एक बड़ा हिस्सा स्वास्थ्य सेवा पर खर्च करने के लिए मजबूर करता है। यह वित्तीय बोझ परिवारों को गरीबी में धकेल सकता है। कर्ज में डाल सकता है। उनके लिए भोजन और शिक्षा जैसी अन्य जरूरी चीजों पर खर्च को कठिन बना सकता है। इन मुद्दों को पहचान कर सरकार सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा में निवेश बढ़ा रही है और ओओपीई को कम करने के लिए स्वास्थ्य बीमा योजनाओं का विस्तार कर रही है।

आम लोगों के खर्च में कमी की प्रमुख वजहें

  • जीएचई : सरकारी खर्च बढ़ने से सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं व सेवाओं में वृद्धि हुई। स्वास्थ्य सेवाओं की सुलभता से आम लोगों को अपनी जेब से कम भुगतान करना पड़ता है।
  • सामाजिक सुरक्षा खर्च में वृद्धि : स्वास्थ्य सेवाओं पर सामाजिक सुरक्षा खर्च (एसएसई) 2014-15 के 5.7 फीसदी से बढ़कर 2021-22 में 8.7 फीसदी पर पहुंच गया। इससे लोगों को भारी स्वास्थ्य खर्चों से बचाने में मदद मिली है।
  • सरकारी बीमा योजनाओं का विस्तार : आयुष्मान भारत के साथ विभिन्न राज्य स्तरीय स्वास्थ्य बीमा योजनाओं ने कमजोर वर्ग को बीमा सुरक्षा प्रदान की है। इससे इलाज के लिए निजी पूंजी पर निर्भरता घटी है।
  • स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे व श्रमबल पर ध्यान : सार्वजनिक स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे में निवेश बढ़ाना, स्वास्थ्य कर्मियों का प्रशिक्षण, स्वास्थ्य सुविधाओं का विकास (खासकर ग्रामीण व वंचित क्षेत्रों में) और सेवाओं में सुधार करने के साथ उन्हें किफायती बनाना ओओपीई बोझ को कम करता है।
  • गैर-संचारी रोगों के लिए लक्षित कार्यक्रम : ऐसे रोगों के बढ़ते मामलों से निपटने के लिए सरकार ने दीर्घकालिक स्वास्थ्य स्थितियों के प्रबंधन और रोकथाम के लिए लक्षित कार्यक्रम शुरू किए हैं। इससे उन मरीजों का खर्च घटा है, जो निजी तौर पर भारी भुगतान करते हैं।
  • कोविड-19 को लेकर सतर्कता : कोरोना महामारी के बाद सरकार ने सार्वजनिक स्वास्थ्य में निवेश को बढ़ाया। इससे स्वास्थ्य सेवाओं को किफायती बनाने में मदद मिली।
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