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जानिए, अब किस हालत में है अबू सलेम का घर?

Mon, 20 Feb 2017 11:03 AM IST
नितिन श्रीवास्तव, बीबीसी
नितिन श्रीवास्तव, बीबीसी Updated Mon, 20 Feb 2017 11:03 AM IST
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Abu Salem's house condition

हफ्ते में कई बार चंदर की दुकान के गुलाब जामुन 'गपके' जाते थे। मीनारा मस्जिद की नान और बड़े के गोश्त का सालन इनकी भी कमजोरी थी। वक्त काटने के लिए गिल्ली-डंडा या फिर आजमगढ़ से मंगवाए गए कंचे। बैठकी के लिए लिए यूनुस भाई के टी-स्टॉल से बेहतरीन कोई जगह नहीं थी।

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इस दौर में अबू सलेम, अबू सालिम अंसारी थे और सरायमीर जैसे छोटे से कस्बे में 'लफंडरी' किया करते थे। फिलहाल मुंबई के एक बिल्डर की हत्या में दोषी करार दिए जाने के बाद अबू सलेम महाराष्ट्र की एक जेल में उम्रकैद की सजा काट रहे हैं। उनके ऊपर लगे कई दूसरे आपराधिक मामलों की सुनवाई अदालतों में जारी है।

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अबू सालिम अब 'गैंगस्टर' अबू सलेम हो चुके हैं।

Abu Salem's house condition

जैसे अबू सालिम अब 'गैंगस्टर' अबू सलेम हो चुके हैं, वैसे ही सरायमीर नाम का ये छोटा कस्बा अब पूरे इलाके का सबसे बड़ा बाजार बन चुका है। दशकों पहले पठान टोला में एक छोटे से घर से एडवोकेट अब्दुल कय्यूम, बेटे अबू सालिम को डपटते हुए 'मदरसतुल इस्लाह मदरसे' में खींच कर ले जाते थे। 

अब उसी घर के ठीक बगल में इसी परिवार का, सरायमीर में सबसे आलीशान, तीन मंजिला घर रंग-पुता खड़ा है और भीतर लाखों रुपए वाली एक एसयूवी भी। अब्दुल कय्यूम ज्यादा दिन 'पढाई में ध्यान न देने वाले' बेटे को मदरसे नहीं ले जा सके। एक दिन सुबह मोटरसाइकिल से कचहरी जाते समय रोड ऐक्सिडेंट में उनकी मौत हो गई। एक पड़ोसी को उस दिन की याद आज भी ताजा है।

अबू सलेम की माँ कम-पढ़ी लिखी लेकिन बहुत नेक दिल और शरीफ महिला थीं।

Abu Salem's house condition
पिता एडवोकेट थे

उन्होंने कहा, "अबू सलेम की माँ कम-पढ़ी लिखी लेकिन बहुत नेक दिल और शरीफ महिला थीं। जबकि उनके पिता को इस बात का गुमान था कि वे एडवोकेट हैं। इसलिए बीवी को ज्यादातर दबाकर ही रखते थे। लेकिन उस दिन के बाद उनकी बीवी ने पूरे घर को संभाला भी और चलाया भी।"

सालों तक बीड़ी बना कर खर्च चलाने वाली माँ ने अपनी आखिरी सांस तक अबू सलेम को मुंबई अंडरवर्ल्ड से जुड़ने और 1993 के सीरियल बम धमाकों में कथित तौर से शामिल होने के लिए माफ नहीं किया था। इन दिनों सराय मीर के इस आलीशान घर में अबू सलेम के सबसे बड़े भाई अबू हाकिम उर्फ चुनचुन परिवार के साथ रहते हैं। 'चाइनीज ढाबा' चलाने वाले चुनचुन सरायमीर में ज्यादा पॉपुलर नहीं क्योंकि वे 'नशे के करीब' रहते हैं।

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दूसरे भाई अबुल लैस परिवार से अलग रहते हैं।

Abu Salem's house condition
क्या करते हैं सलेम के भाई

दूसरे भाई अबुल लैस परिवार से अलग रहते हैं। 2005 में अबू सलेम के पुर्तगाल से प्रत्यर्पण के बाद अबुल लैस ही वकीलों के साथ उनसे मिलने पहुंचे थे। सलेम के तीसरे भाई अबुल जैस लखनऊ में बस चुके हैं और एक बड़ी लॉज चलाते हैं। दोनों बहनों की शादी हो चुकी है और सरायमीर से 'उनका लेना-देना कम ही है।' 

एक जगदीशपुर में बस चुकीं हैं, दूसरी मुबारकपुर में। पढ़ाई में मन न लगाने वाले अबू सलेम ने 15-16 वर्ष की उम्र में ही सरायमीर छोड़ दिया था। दिल्ली होते हुए वे मुंबई पहुंचे थे और एक गराज में काम करने लगे थे। सरायमीर के दो पुराने दोस्तों ने बताया, "मुंबई में हम लोग दो-एक बार मिले भी उससे। वो हर साल एक बार घर भी जरूर आता था।"

हर अगले साल सालिम ज्यादा स्मार्ट होकर आता था।

Abu Salem's house condition
कोई नहीं देता था ध्यान

लेकिन एक पड़ोसी ने कहा, "हर अगले साल सालिम ज्यादा स्मार्ट होकर आता था। कुछ हाई-फाई बात भी करने लगा था। वरना पहले ध्यान कौन देता था उस पर।" अबू सलेम ने हमेशा इस बात से इनकार किया है कि आजमगढ़ में उनकी कोई शादी हुई थी।

लेकिन उनके मोहल्ले के कुछ लोगों का दावा है कि दरअसल '20-21 वर्ष की आयु में सलेम के बड़े-अब्बा (ताऊ) ने उनका निकाह खुदादादपुर नाम के गाँव की एक महिला से करवाया था।" पड़ोसियों के मुताबिक, "दो-तीन साल में ही ये शादी टूट गई थी।" तहकीकात करने पर पता चला कि उस महिला की दोबारा शादी हो गई थी और कुछ दिन पहले उसके बेटे की भी शादी हुई है।

हमार कब्बौ दोस्ती न रही सालिमवा से।

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आजमगढ़ वाली शादी

सलेम के परिवार के किसी भी सदस्य से बात करने की कोशिश नाकाम रही। अबू सलेम के साथ चौराहों पर मटरगश्ती कर चुके ज्यादातर दोस्त अब भौहें सिकोड़ कर हाथ झाड़ कहते हैं, "हमार कब्बौ दोस्ती न रही सालिमवा से।" ज्यादातर अबू सलेम के सामने तब भी नहीं पड़े थे जब अबू सलेम माँ की मौत पर अदालत से इजाजत लेकर, पहले तीसरे में और फिर उनके 40वें पर, सरायमीर ले जाए गए थे।

अभी भी सलेम का नाम लेने पर लोग शक की नजर से देखते हैं और बहाना बना कर या चाय पूछते हैं या फिर ये कि चुनाव में जीत कौन रहा है। सरायमीर के बीच की चौक पर गहमागहमी में अगर आपने मोबाइल निकाल एक-आधा तस्वीरें खींच ली और पहनावे से आप बाहरी लगे तो पूरे कस्बे को पता लग जाएगा आप 'पठान टोला वाले अबु सालिमवा' पर कुछ करने आए हैं। सलेम के परिवारजन यहाँ ज्यादा लोकप्रिय भी नहीं पर लगभग सभी की राय है कि 'सलेम ने इन सबके लिए कुछ न कुछ भला जरूर किया है।"

बम धमाकों में नामजद होने के बाद सलेम जब दुबई में थे।

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सालिमवा पर कुछ करने आए

1993 के बम धमाकों में नामजद होने के बाद सलेम जब दुबई में थे में तब सरायमीर के एक बाशिंदे से उनके परिवार की जमीन के मामले पर कहासुनी हुई थी। जानने वाले बताते हैं कि अबू सलेम ने विदेश से उस कस्बे वाले को फोन कर के कहा था, "मेरा इस झगड़े से कोई लेना-देना नहीं है।"

समय के साथ सरायमीर भी बदल गया है। 1990 के दशक में यहाँ दर्जनों पीसीओ हुआ करते थे मध्य-पूर्व देशों में गए परिजनों से बात करने के लिए। अब हर दूसरी दुकान में सिम कार्ड और समार्टफोन बिक रहे हैं सस्ती अंतरराष्ट्रीय कॉलों के ऑफर के साथ। 1997 में जब टी-सिरीज के मालिक गुलशन कुमार की मुंबई में दिन-दहाड़े हत्या हुई थी, तब सराय मीर में ये खबर दो हफ्ते बाद पहुंची थी कि हमलावर जो कट्टा छोड़ भागे उनमें से एक बगल के गाँव बमहौर में बना था। 

सराय मीर के लोग यू ट्यूब पर इस खबर को लाइव देख रहे थे।

Abu Salem's house condition

2016 में जब अबू सलेम पर जेल में हमला हुआ, उसके आधे घंटे बाद सराय मीर के लोग यू ट्यूब पर इस खबर को लाइव देख रहे थे।

बदल गया है सरायमीर 
चंदर की दुकान आज भी है। बस, खस्ताहाल हो चुकी है। मीनारा मस्जिद के पास बड़े के गोश्त का सालन और नान आज भी बनती है। लेकिन बिकती कम है। सरायमीर में चाउमीन और बर्गर भी बिकने लगा है।कस्बे के बच्चे कंचे आज भी खेलते हैं। लेकिन कम, क्योंकि छह कंचों के दाम में मोबाइल फोन गेम बिकता है।

फर्क सिर्फ इतना है कि 25 साल पहले कुछ लोग जिस अबू सालिमवा से हंसी-मजाक कर कंधे पर हाथ रख लेते थे, जेल में कैद उसी अबू सलेम की बात करने से कतराते हैं।

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