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'सवाल पूछना अराजकता नहीं': दिपके ने भाजपा से पूछा- विपक्ष में रहकर करते थे प्रदर्शन, सत्ता में आने पर डर क्यों
Fri, 16 Oct 2026 01:48 PM IST
अमन मौर्या
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: अमन मौर्या
Updated Fri, 16 Oct 2026 01:48 PM IST
सार
सीजेपी संस्थापक अभिजीत दिपके ने सीईसी के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों का बचाव करते हुए कहा है कि सरकार से सवाल पूछना अराजकता नहीं है। उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों से लोकतंत्र मजबूत होता है।
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अभिजीत दिपके, संस्थापक, कॉकरोच जनता पार्टी
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
एसआईआर विवाद, सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ देशभर में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) और विपक्ष लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहा है। इस बीच राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में अव्यवस्था फैलाने और व्यापक प्रशासनिक प्रतिबंधों को लेकर सीजेपी के संस्थापक अभीजीत दिपके का बयान सामने आया है। दिपके ने अपने एक्स हैंडल पर एक पोस्ट किया और कहा, 'शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों से व्यापार को नुकसान नहीं होता। नुकसान तब होता है जब सरकार पूरे शहर को बंद करने, इंटरनेट सेवाएं रोकने, अपने ही नागरिकों की आवाजाही पर पाबंदी लगाने और शहर को युद्ध क्षेत्र में बदलने का फैसला करती है।'
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दिपके ने कहा कि शुरुआत से ही, 'कॉकरोच जनता पार्टी' का यह मानना रहा है कि हम हमेशा गांधीजी के शांति और अहिंसा के रास्ते पर चलेंगे और हम अपने इस वादे पर कायम रहे हैं। हमने मुंबई, पुणे, जयपुर, लखनऊ, बेंगलुरु और नागपुर में विरोध प्रदर्शन किए हैं। ये सभी प्रदर्शन पूरी तरह से शांतिपूर्ण रहे हैं। जयपुर में मुझ पर हमला भी हुआ, लेकिन फिर भी मैंने कोई जवाबी कार्रवाई नहीं की, क्योंकि हिंसा का जवाब हिंसा से देना हमारे सिद्धांतों के खिलाफ है। हम शारीरिक बल का इस्तेमाल करने के बजाय, डॉ. बी. आर. अंबेडकर के नेतृत्व में तैयार किए गए संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों का उपयोग करना बेहतर समझते हैं। हमारी ताकत संवैधानिक मूल्यों के प्रति हमारी प्रतिबद्धता से आती है और कोई भी उकसावा हमें इन मूल्यों को छोड़ने के लिए मजबूर नहीं कर सकता।
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सरकार पर क्या बोले दिपके?
सरकार पर हमला बोलते हुए दिपके ने कहा कि हमें 'अराजकतावादी' बताने की लगातार कोशिशें की जा रही हैं, सिर्फ इसलिए क्योंकि हम चुप रहने से इनकार करते हैं। लेकिन सरकार से जवाब मांगना अराजकता नहीं है, सड़कों पर अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना अराजकता नहीं है, और सत्ता में बैठे लोगों से सवाल पूछना तो बिल्कुल भी अराजकता नहीं है। ये लोकतंत्र के सबसे बुनियादी रूप हैं। आज जो पार्टी सत्ता में है, उसने विपक्ष में रहते हुए दशकों तक विरोध प्रदर्शन किए, सड़कों पर उतरी और तत्कालीन सरकारों से सवाल पूछे। अगर उस समय उनके खिलाफ भी ऐसी ही पाबंदियां लगाई जातीं, उन्हें डराया-धमकाया जाता या पुलिस की सख्ती का सामना करना पड़ता, तो आज सत्ता के पदों पर बैठे कई लोग शायद वहां तक कभी नहीं पहुंच पाते। यह बहुत बड़ा पाखंड है कि जब आप विपक्ष में हों तो विरोध प्रदर्शनों को 'लोकतांत्रिक अधिकार' मानकर उसका समर्थन करें और जब आप सत्ता में आ जाएं तो उसी काम को 'कानून-व्यवस्था के लिए खतरा' बताने लगें।
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दिपके ने सरकार से क्या मांग की?
विरोध प्रदर्शन को लेकर दिपके ने कहा कि हम कोई विशेष अधिकार या खास बर्ताव नहीं मांग रहे हैं। हम बस उन अधिकारों का इस्तेमाल करना चाहते हैं जो इस गणतंत्र के हर नागरिक को मिले हुए हैं, चाहे सत्ता में कोई भी पार्टी हो। इसलिए, आइए हम इस देश के नागरिक के रूप में अपना कर्तव्य निभाएं, अपने चुने हुए प्रतिनिधियों से सवाल पूछें, उनसे जवाबदेही मांगें और जहां भी अन्याय देखें, वहां अपनी आवाज उठाएं। जनता द्वारा चुनी गई सरकार का यह फर्ज है कि वह लोगों की बात सुने, न कि उन्हें चुप करा दे। वोटों की गिनती हो जाने के बाद लोकतंत्र खत्म नहीं हो जाता।
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दिपके ने कहा कि शुरुआत से ही, 'कॉकरोच जनता पार्टी' का यह मानना रहा है कि हम हमेशा गांधीजी के शांति और अहिंसा के रास्ते पर चलेंगे और हम अपने इस वादे पर कायम रहे हैं। हमने मुंबई, पुणे, जयपुर, लखनऊ, बेंगलुरु और नागपुर में विरोध प्रदर्शन किए हैं। ये सभी प्रदर्शन पूरी तरह से शांतिपूर्ण रहे हैं। जयपुर में मुझ पर हमला भी हुआ, लेकिन फिर भी मैंने कोई जवाबी कार्रवाई नहीं की, क्योंकि हिंसा का जवाब हिंसा से देना हमारे सिद्धांतों के खिलाफ है। हम शारीरिक बल का इस्तेमाल करने के बजाय, डॉ. बी. आर. अंबेडकर के नेतृत्व में तैयार किए गए संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों का उपयोग करना बेहतर समझते हैं। हमारी ताकत संवैधानिक मूल्यों के प्रति हमारी प्रतिबद्धता से आती है और कोई भी उकसावा हमें इन मूल्यों को छोड़ने के लिए मजबूर नहीं कर सकता।
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सरकार पर क्या बोले दिपके?
सरकार पर हमला बोलते हुए दिपके ने कहा कि हमें 'अराजकतावादी' बताने की लगातार कोशिशें की जा रही हैं, सिर्फ इसलिए क्योंकि हम चुप रहने से इनकार करते हैं। लेकिन सरकार से जवाब मांगना अराजकता नहीं है, सड़कों पर अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना अराजकता नहीं है, और सत्ता में बैठे लोगों से सवाल पूछना तो बिल्कुल भी अराजकता नहीं है। ये लोकतंत्र के सबसे बुनियादी रूप हैं। आज जो पार्टी सत्ता में है, उसने विपक्ष में रहते हुए दशकों तक विरोध प्रदर्शन किए, सड़कों पर उतरी और तत्कालीन सरकारों से सवाल पूछे। अगर उस समय उनके खिलाफ भी ऐसी ही पाबंदियां लगाई जातीं, उन्हें डराया-धमकाया जाता या पुलिस की सख्ती का सामना करना पड़ता, तो आज सत्ता के पदों पर बैठे कई लोग शायद वहां तक कभी नहीं पहुंच पाते। यह बहुत बड़ा पाखंड है कि जब आप विपक्ष में हों तो विरोध प्रदर्शनों को 'लोकतांत्रिक अधिकार' मानकर उसका समर्थन करें और जब आप सत्ता में आ जाएं तो उसी काम को 'कानून-व्यवस्था के लिए खतरा' बताने लगें।
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दिपके ने सरकार से क्या मांग की?
विरोध प्रदर्शन को लेकर दिपके ने कहा कि हम कोई विशेष अधिकार या खास बर्ताव नहीं मांग रहे हैं। हम बस उन अधिकारों का इस्तेमाल करना चाहते हैं जो इस गणतंत्र के हर नागरिक को मिले हुए हैं, चाहे सत्ता में कोई भी पार्टी हो। इसलिए, आइए हम इस देश के नागरिक के रूप में अपना कर्तव्य निभाएं, अपने चुने हुए प्रतिनिधियों से सवाल पूछें, उनसे जवाबदेही मांगें और जहां भी अन्याय देखें, वहां अपनी आवाज उठाएं। जनता द्वारा चुनी गई सरकार का यह फर्ज है कि वह लोगों की बात सुने, न कि उन्हें चुप करा दे। वोटों की गिनती हो जाने के बाद लोकतंत्र खत्म नहीं हो जाता।