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40 करोड़ लोगों ने देखा सीरियल, बदली ग्रामीण भारत की सोच
एजेंसी, नई दिल्ली
Updated Sun, 21 Jan 2018 05:20 AM IST
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प्रतापगढ़ नाम के एक गांव में रहने वाले रवि की पत्नी सीमा तीसरी बार गर्भवती है। रवि चाहता है कि पत्नी गर्भपात करा ले क्योंकि वह लड़का चाहिए और वह जान चुका है कि लड़की होने वाली है। गर्भपात कराने की बीस हफ्ते की कानूनी सीमा पार होने के बावजूद एक डॉक्टर सीमा का गर्भपात करने के लिए राजी हो जाता है।
गर्भपात के दौरान ज्यादा खून बह जाने से सीमा की तबियत बिगड़ जाती है, लेकिन तभी उसकी युवा डॉक्टर बहन स्नेहा आकर न सिर्फ उसको बचाती है बल्कि उसके ससुराल वालों को पुलिस को फोन करने की धमकी देती है। यह कहानी है, 2014 से 2016 के बीच दूरदर्शन पर दिखाए गए एक सीरियल ‘मैं कुछ भी कर सकती हूं’ के पांचवें एपिसोड की। हालिया शोध में दावा किया गया है कि इस सीरियल ने ग्रामीण भारत में लोगों खासकर महिलाओं की सोच पर सकारात्मक प्रभाव डाला। दूरदर्शन के मुताबिक दो सीजन में चले इस सीरियल को कुल 40 करोड़ लोगों ने देखा है।
हर एपिसोड में नया संदेश
दिल्ली स्थित एक शोध संगठन पापुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया (पीएफआई) ने इस सीरियल का निर्माण किया है। सीरियल का मकसद मनोरंजन के माध्यम से लोगों को महिला प्रजनन स्वास्थ्य और लैंगिक समानता जैसे विषयों पर जागरूक करना था। हर एपिसोड में बाल विवाह, पहली गर्भावस्था की उम्र, परिवार नियोजन और घरेलू हिंसा संबंधी कहानियां दिखाई जाती थीं। ब्रिटेन के अंतरराष्ट्रीय विकास विभाग, बिल गेट्स के गेट्स फाउंडेशन और यूएन के पापुलेशन फंड ने इस प्रोजेक्ट को फंड दिया है।
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गर्भपात के दौरान ज्यादा खून बह जाने से सीमा की तबियत बिगड़ जाती है, लेकिन तभी उसकी युवा डॉक्टर बहन स्नेहा आकर न सिर्फ उसको बचाती है बल्कि उसके ससुराल वालों को पुलिस को फोन करने की धमकी देती है। यह कहानी है, 2014 से 2016 के बीच दूरदर्शन पर दिखाए गए एक सीरियल ‘मैं कुछ भी कर सकती हूं’ के पांचवें एपिसोड की। हालिया शोध में दावा किया गया है कि इस सीरियल ने ग्रामीण भारत में लोगों खासकर महिलाओं की सोच पर सकारात्मक प्रभाव डाला। दूरदर्शन के मुताबिक दो सीजन में चले इस सीरियल को कुल 40 करोड़ लोगों ने देखा है।
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दिल्ली स्थित एक शोध संगठन पापुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया (पीएफआई) ने इस सीरियल का निर्माण किया है। सीरियल का मकसद मनोरंजन के माध्यम से लोगों को महिला प्रजनन स्वास्थ्य और लैंगिक समानता जैसे विषयों पर जागरूक करना था। हर एपिसोड में बाल विवाह, पहली गर्भावस्था की उम्र, परिवार नियोजन और घरेलू हिंसा संबंधी कहानियां दिखाई जाती थीं। ब्रिटेन के अंतरराष्ट्रीय विकास विभाग, बिल गेट्स के गेट्स फाउंडेशन और यूएन के पापुलेशन फंड ने इस प्रोजेक्ट को फंड दिया है।
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जागरूक महिलाओं की संख्या बढ़ी
सीरियल रेपिस्ट
- फोटो : SELF
पीएफआई के शोध में पाया गया कि शो के पहले 73 फीसदी महिलाएं शादी की कानूनी उम्र के बारे में जानती थीं। जबकि शो पहले सीजन के बाद ऐसी महिलाओं की संख्या 83 फीसदी हो गई। 57 प्रतिशत पुरुष आधुनिक गर्भनिरोधक न इस्तेमाल करने के नुकसान जानते थे, पर शो के बाद इनकी संख्या घटकर 32 प्रतिशत हो गई। इसी तरह घरेलू हिंसा, पहले बच्चे के समय मां की उम्र जैसे विषयों पर भी इसी तरह जागरूकता बढ़ी।
शोधकर्ताओं के मुताबिक मनोरंजन के माध्यम से जटिल सामाजिक संदेश आसानी से समझाया जा सकता है। पीएफआई निदेशक पूनम मुतरेजा के मुताबिक अफ्रीका में भी इंफोटेनमेंट के जरिए सामाजिक जागरूकता के प्रयास सफल रहे हैं। सीरियल में ध्यान रखा गया कि इसके चरित्र ग्रामीण भारत के हों। जैसे सीरियल में स्नेहा का बेरोजगार और शराबी भाई प्रणब अपनी पत्नी से मारपीट करता है। पर धीरे-धीरे उसमें सुधार होता है और वह एक सकारात्मक चरित्र में बदल जाता है।
रेडियो का भी प्रयोग
सीरिया से जुड़े संदेश के प्रचार के लिए रेडियो, सोशल मीडिया की भी मदद ली गई। रेडियो पर चलने वाले शो स्नेहा क्लब का प्रसारण सभी 230 ऑल इंडिया रेडियो स्टेशन पर 12 भाषाओं में हुआ।
शोधकर्ताओं के मुताबिक मनोरंजन के माध्यम से जटिल सामाजिक संदेश आसानी से समझाया जा सकता है। पीएफआई निदेशक पूनम मुतरेजा के मुताबिक अफ्रीका में भी इंफोटेनमेंट के जरिए सामाजिक जागरूकता के प्रयास सफल रहे हैं। सीरियल में ध्यान रखा गया कि इसके चरित्र ग्रामीण भारत के हों। जैसे सीरियल में स्नेहा का बेरोजगार और शराबी भाई प्रणब अपनी पत्नी से मारपीट करता है। पर धीरे-धीरे उसमें सुधार होता है और वह एक सकारात्मक चरित्र में बदल जाता है।
रेडियो का भी प्रयोग
सीरिया से जुड़े संदेश के प्रचार के लिए रेडियो, सोशल मीडिया की भी मदद ली गई। रेडियो पर चलने वाले शो स्नेहा क्लब का प्रसारण सभी 230 ऑल इंडिया रेडियो स्टेशन पर 12 भाषाओं में हुआ।