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कर्नाटक: मुस्लिम पिता ने दान की थी जमीन, अब बेटा बनेगा लिंगायत मठ का मुख्य पुजारी

Thu, 20 Feb 2020 01:07 PM IST
Sneha Baluni न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हुब्बाली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हुब्बाली Published by: Sneha Baluni Updated Thu, 20 Feb 2020 01:07 PM IST
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33 year old Muslim to head Lingayat mutt in Karnataka, his father have donate two acres land to mutt
दीवान शरीफ रहिमनसाब मुल्ला बने लिंगायत मठ के मुख्य पुजारी - फोटो : ANI

उत्तरी कर्नाटक के गडग जिले में स्थित एक लिंगायत मठ ने परंपराओं को तोड़ते हुए एक मुस्लिम युवक को अपना मुख्य पुजारी बनाने का फैसला लिया है। इस पद पर 33 साल के दीवान शरीफ रहिमनसाब मुल्ला की तैनाती 26 फरवरी को होगी। मुल्ला ने कहा कि वह बचपन से ही 12वीं सदी के सुधारक बासवान्ना से प्रभावित हैं और सामाजिक न्याय और सद्भाव के उनके आदर्शों की दिशा में काम करेंगे। 

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शरीफ के पिता ने सालों पहले मठ के लिए दो एकड़ जमीन दान में दी थी। वह आसुति गांव के मुरुगराजेंद्र कोरानेश्वरा शांतिधाम मठ के मुख्य पुजारी बनेंगे। यह मठ कलबुर्गी के खजूरी गांव में स्थित 350 साल पुराने कुरानेश्वर संस्थान के मठ से जुड़ा हुआ है। चित्रदुर्ग के श्री जगद्गुरु मुरुगराजेंद्र के 361 मठों में यह मठ शामिल है। जिसके देश के अन्य हिस्सों के अलावा कर्नाटक और महाराष्ट्र में लाखों अनुयायी हैं।
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खजूरी मठ के मुख्य पुजारी मुरुगराजेंद्र कोरानेश्वर शिवयोगी ने कहा, 'बासवा का दर्शन सार्वभौमिक है और हम अनुयायियों को जाति और धर्म की विभिन्नता के बावजूद गले लगाते हैं। उन्होंने 12वीं सदी में सामाजिक न्याय और सद्भाव का सपना देखा था और उनकी शिक्षा का पालन करते हुए हमने सभी के लिए मठ के दरवाजे खोल दिए हैं।' आसुति में शिवयोगी के प्रवचनों से प्रभावित होकर शरीफ के स्वर्गवासी पिता रहीमनसाब मुल्ला मे गांव में अपनी दो एकड़ जमीन मठ को दान में दी थी।
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शिवयोगी ने कहा कि आसुति मठ 2-3 सालों से काम कर रहा है और वहां पर निर्माण कार्य जारी है। मुख्य पुजारी ने कहा, 'शरीफ बसवा के दर्शन के प्रति समर्पित है और तप करके अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं। उनके पिता भी बहुत बड़े अनुयायी थे और उन्हेोंने हमसे लिंग दीक्षा ली थी। शरीफ ने 10 नवंबर, 2019 को हमसे दीक्षा ली। हमने उन्हें पिछले तीन वर्षों में लिंगायत धर्म और बासवन्ना की शिक्षाओं के विभिन्न पहलुओं पर प्रशिक्षित किया है।'


शरीफ का कहना है कि वह बचपन से ही बासवा की शिक्षाओं के प्रति आकर्षित थे। उन्होंने कहा, 'मैं पड़ोस के मेनासेंगी गांव में आटा चक्की चलाता था और खाली समय में बासवन्ना और 12वीं सदी के साधुओं द्वारा लिखे गए प्रवचनों को करता था। मुरुगराजेंद्र स्वामीजी ने मेरी इस छोटी सी सेवा को पहचाना और मुझे अपने साथ ले लिया। मैं बासवन्ना और अपने गुरु के रास्ते पर आगे बढ़ूंगा।' शरीफ शादीशुदा हैं और उनकी तीन बेटियां और एक बेटा है।

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