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2016 में किसानों की आत्महत्या के मामले में आई 21 फीसदी की कमी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Thu, 26 Jul 2018 01:59 PM IST
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देश के अन्नदाता कर्ज और फसल के नुकसान की वजह से आत्महत्या जैसे कदम ना उठायें इस के लिए सरकार कई तरह से मदद कर रही है। जिसके फलस्वरूप कुछ सकारात्मक नतीजे आंकड़ों के मार्फत देखने को मिल रहे हैं। सरकार ने ताजा आंकड़े जारी किए हैं जिसमें किसानों की खुदकुशी के मामलों में 21% की कमी आ चुकी है। यानि 2015 में हुए 8,007 खुदकुशी के मुकाबले 2016 में 6,351 ही हुआ है। किसानों के आत्महत्या करने के मामलों में 2016 में ये गिरावट सरकार के लिए राहत की बात है। लेकिन मजदूरों के मामले में स्थिति और बद्तर हो रही है, मजदूरों द्वारा खुदकुशी के मामलों में 10% की बढोत्तरी हुई है।
हालांकि अब भी देश में हर एक घंटे के अन्दर एक किसान मौत को गले लगा लेता है। सभी राज्यों के मुकाबले महाराष्ट्र पूरे देश में किसानों की आत्महत्या के मामले में सबसे ऊपर है। कृषि मंत्रालय की ओर से मंगलवार को लोकसभा में यह जानकारी दी गई। डेटा के मुताबिक 2016 में 11,370 किसानों ने जान दे दी, जबकि 2015 में यह आंकड़ा 12,601 को छू चुका था। इस तरह एक साल के भीतर किसानों के आत्महत्या करने के मामलों में 21 फीसदी तक की कमी आई है।
कृषि के जानकारों का मानना है कि 2016 में मानसून बेहतर रहने के चलते खरीफ की फसल काफी अच्छी थी। यही वजह रही कि किसानों के आत्महत्या करने के मामलों में गिरावट देखने को मिली। जबकि इससे उलट 2014 के बाद 2015 में भी लगातार दूसरे साल किसानों को सूखे का संकट झेलना पड़ा था।
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जहां किसानों की स्थिति बेहतर हुई है वही आंकड़े बताते हैं कि रिकॉर्ड अन्न उत्पादन का कृषि मजदूरों के आत्महत्या के मामलों पर कोई असर नहीं पड़ा है। आंकड़ों के मुताबिक 2015 में 4,595 कृषि मजदूरों ने तनावग्रस्त होकर मौत को गले लगा लिया, जबकि 2016 में यह आंकड़ा बढ़कर 5,019 हो गया। कृषि मंत्रालय के मुताबिक नैशनल क्राइम रेकॉर्ड्स ब्यूरो की ओर से ये आंकड़े दिए गए हैं। सरकार खुदकुशी के मामलों में किसानों और खेती से जुड़े मजदूरों के आंकड़े 2014 से अलग-अलग जुटा रही है।
संसद में किसानों और खेत के मजदूरों से जुड़ा बयान जारी करते हुए देश के सभी राज्यों की स्थिति बताई गई। तेलंगाना को छोड़ कर सभी राज्यों में किसानों के मामलों में जहां कमी आई है वही मजदूरों के मामले में बढोत्तरी हुई है। वही गुजरात में किसानों की खुदकुशी के मामलों में 50 फीसदी की कमी आई है। जबकि मजदूरों के मामले में 2015 के 244 मौतों के मुकाबले 2016 में 378 मौतें हुई है। अच्छे मॉनसून की वजह से किसानों की स्थिति सुधर जाती है जबकि मजदूरों को उसका फायदा भी नहीं होता,एसा जानकारों का मानना है।
देश के सभी राज्यों में से महाराष्ट्र, कर्नाटका, तेलंगाना और मध्यप्रदेश में अभी भी किसानों और मजदूरों द्वारा आर्थिक तंगी की वजह से सबसे ज्यादा आत्महत्या की जा रही है। राज्यसभा में कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने ब्योरा देते हुए बताया कि आन्ध्रप्रदेश और तेलांगाना में रिकॉर्ड 50 % की कमी 2016 में पिछले 2015 के मुकाबले आई है। हालांकि महाराष्ट्र की तस्वीर अब भी वैसी ही है लेकिन फिर भी 16 फीसदी की कमी दर्ज की गई है। छत्तीसगढ़ में किसानों की आत्महत्या के मामलों में 31% की कमी हुई है।
महाराष्ट्र के बाद दूसरे नम्बर पर कर्नाटक है जिसमें अभी भी स्थिति जस के तस है। मध्यप्रदेश इस सूची मेें उपर चढ़ते हुए चौथे स्थान पर पहुंच गया है...जहां इस बार चुनाव भी होने है। सबसे चौंकाने वाले आंकड़े पंजाब के हैं जहां 2016 में 222 किसानों ने खुदकुशी की है, जबकि राज्य में सिर्फ 100 किसानों ने 2015 में आत्महत्या की थी। वही हरियाणा में भी स्थिति पंजाब सी है। यहां 2016 में 100 किसानों ने खुदकुशी की है जबकि 2015 में ये सिर्फ 28 थे, यानि 225% की भारी बढोत्तरी।
ये बेहद चिंतनीय है कि खेती से जुड़े मजदूरों के आंकडे सभी राज्यों में बढ़े ही हैं- महाराष्ट्र (1,111), कर्नाटक (867), मध्य प्रदेश (722), आन्ध्र प्रदेश (565) और गुजरात (378) खुदकुशी के मामले। तमिलनाडू (604) और कर्नाटक (867) में 2015 के मुकाबले 2016 में दोगुने खुदकुशी के मामले आये हैं। इन आंकड़ों से साफ है कि सरकार को अभी और कारगर कदम उठाने की जरुरत है ताकि किसानों और मजदूरों की खुदकुशी के मामलों में बडे पैमाने पर कमी आयें।
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हालांकि अब भी देश में हर एक घंटे के अन्दर एक किसान मौत को गले लगा लेता है। सभी राज्यों के मुकाबले महाराष्ट्र पूरे देश में किसानों की आत्महत्या के मामले में सबसे ऊपर है। कृषि मंत्रालय की ओर से मंगलवार को लोकसभा में यह जानकारी दी गई। डेटा के मुताबिक 2016 में 11,370 किसानों ने जान दे दी, जबकि 2015 में यह आंकड़ा 12,601 को छू चुका था। इस तरह एक साल के भीतर किसानों के आत्महत्या करने के मामलों में 21 फीसदी तक की कमी आई है।
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कृषि के जानकारों का मानना है कि 2016 में मानसून बेहतर रहने के चलते खरीफ की फसल काफी अच्छी थी। यही वजह रही कि किसानों के आत्महत्या करने के मामलों में गिरावट देखने को मिली। जबकि इससे उलट 2014 के बाद 2015 में भी लगातार दूसरे साल किसानों को सूखे का संकट झेलना पड़ा था।
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जहां किसानों की स्थिति बेहतर हुई है वही आंकड़े बताते हैं कि रिकॉर्ड अन्न उत्पादन का कृषि मजदूरों के आत्महत्या के मामलों पर कोई असर नहीं पड़ा है। आंकड़ों के मुताबिक 2015 में 4,595 कृषि मजदूरों ने तनावग्रस्त होकर मौत को गले लगा लिया, जबकि 2016 में यह आंकड़ा बढ़कर 5,019 हो गया। कृषि मंत्रालय के मुताबिक नैशनल क्राइम रेकॉर्ड्स ब्यूरो की ओर से ये आंकड़े दिए गए हैं। सरकार खुदकुशी के मामलों में किसानों और खेती से जुड़े मजदूरों के आंकड़े 2014 से अलग-अलग जुटा रही है।
संसद में किसानों और खेत के मजदूरों से जुड़ा बयान जारी करते हुए देश के सभी राज्यों की स्थिति बताई गई। तेलंगाना को छोड़ कर सभी राज्यों में किसानों के मामलों में जहां कमी आई है वही मजदूरों के मामले में बढोत्तरी हुई है। वही गुजरात में किसानों की खुदकुशी के मामलों में 50 फीसदी की कमी आई है। जबकि मजदूरों के मामले में 2015 के 244 मौतों के मुकाबले 2016 में 378 मौतें हुई है। अच्छे मॉनसून की वजह से किसानों की स्थिति सुधर जाती है जबकि मजदूरों को उसका फायदा भी नहीं होता,एसा जानकारों का मानना है।
देश के सभी राज्यों में से महाराष्ट्र, कर्नाटका, तेलंगाना और मध्यप्रदेश में अभी भी किसानों और मजदूरों द्वारा आर्थिक तंगी की वजह से सबसे ज्यादा आत्महत्या की जा रही है। राज्यसभा में कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने ब्योरा देते हुए बताया कि आन्ध्रप्रदेश और तेलांगाना में रिकॉर्ड 50 % की कमी 2016 में पिछले 2015 के मुकाबले आई है। हालांकि महाराष्ट्र की तस्वीर अब भी वैसी ही है लेकिन फिर भी 16 फीसदी की कमी दर्ज की गई है। छत्तीसगढ़ में किसानों की आत्महत्या के मामलों में 31% की कमी हुई है।
महाराष्ट्र के बाद दूसरे नम्बर पर कर्नाटक है जिसमें अभी भी स्थिति जस के तस है। मध्यप्रदेश इस सूची मेें उपर चढ़ते हुए चौथे स्थान पर पहुंच गया है...जहां इस बार चुनाव भी होने है। सबसे चौंकाने वाले आंकड़े पंजाब के हैं जहां 2016 में 222 किसानों ने खुदकुशी की है, जबकि राज्य में सिर्फ 100 किसानों ने 2015 में आत्महत्या की थी। वही हरियाणा में भी स्थिति पंजाब सी है। यहां 2016 में 100 किसानों ने खुदकुशी की है जबकि 2015 में ये सिर्फ 28 थे, यानि 225% की भारी बढोत्तरी।
ये बेहद चिंतनीय है कि खेती से जुड़े मजदूरों के आंकडे सभी राज्यों में बढ़े ही हैं- महाराष्ट्र (1,111), कर्नाटक (867), मध्य प्रदेश (722), आन्ध्र प्रदेश (565) और गुजरात (378) खुदकुशी के मामले। तमिलनाडू (604) और कर्नाटक (867) में 2015 के मुकाबले 2016 में दोगुने खुदकुशी के मामले आये हैं। इन आंकड़ों से साफ है कि सरकार को अभी और कारगर कदम उठाने की जरुरत है ताकि किसानों और मजदूरों की खुदकुशी के मामलों में बडे पैमाने पर कमी आयें।