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महिलाओं के खिलाफ हिंसा पर दुनिया को एकजुट करने के लिए 16 दिनों का अभियान

Mon, 11 Dec 2017 07:30 PM IST
टीम डिजिटल, अमर उजाला
टीम डिजिटल, अमर उजाला Updated Mon, 11 Dec 2017 07:30 PM IST
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16 days campaign of UNWOMEN to unite the world on violence against women
प्रतीकात्मक तस्वीर
महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध की खबरें रोजाना सुर्खियों में रहती हैं। महिलाओं के साथ-साथ बच्चियों और बुजुर्ग महिलाओं के साथ बलात्कार की खबरें मानवता को शर्मसार करती हैं। महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न और हिंसा कई तरह के रूपों में मौजूद हैं जिनमें हाथापाई, गाली-गलौच, तेजाब छिड़कना, शारीरिक-मानसिक शोषण, बाल विवाह, दहेज हत्या, मानव तस्करी और बलात्कार तक शामिल हैं। स्कूल, सड़क, दफ्तर, होटल, पार्क, खेत, कारखाना, बाजार, बाथरूम, भीड़, एकांत, शायद ही ऐसी कोई जगह बची हो जहां महिलाएं हिंसा का शिकार नहीं हुई हों। 
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महिलाओं का शारीरिक शोषण एक महामारी बन चुकी है जिसके समाधान की सख्त जरूरत है। संस्कृति और सभ्यता का सिरमौर कहलाने वाला भारत देश भी इस बीमारी से अछूता नहीं है। लेकिन अब लड़कियां इस शोषण के खिलाफ आवाज उठाने लगी हैं। 
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भारत में राष्ट्रीय परिवार स्वाथ्य्य सर्वेक्षण-4 के आंकड़े इस बात के गवाह हैं कि 28.8 फीसदी शादीशुदा महिलाएं अपने पतियों द्वारा प्रताड़ित होती हैं। यही नहीं राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो-2016 के आकंड़े बताते हैं कि 1,10,378 दर्ज केसों में महिलाएं अपने पति या परिजनों द्वारा प्रताड़ित की गई हैं। इसके अलावा डिजीटल होते भारत में ऑललाइन स्टॉकिंग, साइबर अपराध और महिला तस्करी के मामले बढ़े हैं। 
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महिलाएं जन्म से लेकर बुढ़ापे तक जीवन के हर पड़ाव पर हिंसा का सामना करती हैं। जुल्म की ये दास्तां जन्म होने से पहले ही भ्रूण हत्या से शुरू होती है। इसकी मुख्य वजह है लड़कियों से जुड़ी असुरक्षा और दहेज। एक अरसे से दहेज का विरोध हो रहा है और दहेज ना लेने की कसमें खिलाई जाती रही हैं। लेकिन दिनों-दिन शादियां एक चकाचौंध और दिखावे में तब्दील हो गई है, जहां पैसों और दहेज का जमकर दिखावा होता है। 

महिला मामलों के जानकार बताते हैं कि दहेज एक ऐसा दानव है जिसके दबाव में बच्चियों के पैदा होने से पहले ही उन्हें मार दिया जाता है। भले ही कानून में दहेज विरोध कानून और 498-ए जैसी कठोर धारा है लेकिन हमारी मानसिकता पर कोई असर नहीं हो रहा है। 

'दिल्ली में 95% लड़कियों का सार्वजनिक स्थलों पर यौन उत्पीड़न हुआ'

16 days campaign of UNWOMEN to unite the world on violence against women
प्रतीकात्मक तस्वीर
गांवों और शहरों की झुग्गी झोंपड़ी की गरीब, दलित, विधवा महिलाओं के साथ साथ मुस्लिम, आदिवासी और दूर दराज के इलाकों में रह रही महिलाओं को भी सामाजिक स्तर पर कई तरह के भेदभावों और आर्थिक शोषण का शिकार होना पड़ता है।

यूएनवूमेन द्वारा साल 2012 में की गई एक शोध में पाया गया कि दिल्ली में 95 फीसदी महिलओं और लड़कियों को सार्वजनिक स्थलों पर यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। कुछ दिनों पहले यौन उत्पीड़न के खिलाफ सोशल मीडिया पर अमेरिका से शुरू हई मुहिम 'मी टू' ने एक वैश्विक आंदोलन का रूप ले लिया। दुनिया भर की महिलाओं के अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न की घटनाओं को खुलकर पूरी दुनिया को बताया। 

यूएन वूमैन की उप कार्यकारी निदेशक लक्ष्मी ने बताया कि यूनएनवूमेन महिलाओं के खिलाफ हो रहे अपराधों को खत्म करने के मकसद से एकजुट होने का अभियान चलाया जा रहा है। 16 दिनों तक चलने वाला यह 'यूनाइट अभियान' 25 नवंबर से 10 दिसंबर तक पूरी दुनिया में चलेगा। स्वामी विवेकानंद ने कहे अनुसार हमें संगठित होकर जागना होगा ताकि लोगों की चेतना से महिला और लड़कियों के खिलाफ हो रही हिंसा को जड़ से खत्म किया जा सकता है। 

प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद अपने पहले स्वाधीनता दिवस के संबोधन में नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्रचीर से देशवासियों को कहा था कि सभी पुरूषों और लड़कों को समाज की महिलाओं और लड़कियों को समानता का अधिकार देना होगा। प्रधानमंत्री ने 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' जैसी मुहिम शुरू कर देशवासियों को संदेश दिया कि विशेष कार्यक्रम और अभियान चलाकर बेटियों को शिक्षा के जरिए ही ताकतवर बनाया जा सकता है। 

पिछले पांच सालों के दौरान अपराधी कानून सुधार एक्ट 2013 के जरिये कार्यस्थलों पर महिलाओं के खिलाफ हिंसा के क्षेत्र में सुधार हुए हैं। इस बारे में सुप्रीम कोर्ट ने भी सख्त हिदायतें दीं। 

'सुरक्षित नगर, सुरक्षित सार्वजनिक स्थान'

16 days campaign of UNWOMEN to unite the world on violence against women
प्रतीकात्मक तस्वीर
सबसे महत्वपूर्ण बात है कि अपने खिलाफ हो रहे हिंसा के खात्मे के लिए महिलाओं को खुद भी नीति और रणनीति बनाने में दृढ़ हस्तक्षेप करना होगा। यही सिद्धांत यूएनवूमेन का मूलमंत्र है। इसी के तहत 'सुरक्षित नगर, सुरक्षित सार्वजनिक स्थान' नाम का एक कार्यक्रम चलाया जा रहा है। इसके जरिए जमीन से जुड़े लोगों और महिला समूहों ने पहले से चले आ रहे सामाजिक मानदंडों और प्रथाओं में व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामुदायिक स्तरों पर आमूलचूल परिवर्तन लाने की कोशिशें की और एकदम नए समाधान भी पेश किए। 

महिलाओं के खिलाफ हो रही हिंसा और भेदभाव की रोकथाम के लिए जरूरत इस बात की है कि महिला अपराधों के खिलाफ बने कानूनों को लेकर लोगों को संवेदनशील और जागरूक बनाया जाए। हमें संकल्प लेना होना कि महिलाओं के खिलाफ होने वाले किसी भी अपराध और भेदभाव के खिलाफ हम अपनी आवाज उठाएंगे। 

जब भारत ने आजादी की लड़ाई लड़ी तो बसंती रंग को अपनाया था। यूएनवूमेन ने उसी बसंती रंग को अपनाते हुए एक बसंती भारत और बसंती विश्व के निर्माण का संकल्प लिया है जहां महिलाओं और लड़कियों का भविष्य उज्जवल और हिंसामुक्त हो। 
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