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10 कारण: आखिरकार क्यों लड़ेंगे आदित्य ठाकरे चुनाव 

Thu, 03 Oct 2019 08:20 PM IST
Rama Solanki Published by: रमा सोलंकी Updated Thu, 03 Oct 2019 08:20 PM IST
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सार
  • बाला साहेब की तरह दूरदर्शिता नहीं है
  •  सत्ता में रहने से पार्टी पर बेहतर नियंत्रण 
  • आदित्य का व्यक्तित्व मुखर है वो अपने दादा की तरह बेबाक है 
  • बाला साहेब की विरासत को आगे बढ़ाना मजबूरी 
  • सीटें बढ़ेंगी तो पार्टी का कद भी बढ़ेगा
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10 reasons why Aditya Thakeray will fight elections
आदित्य ठाकरे - फोटो : PTI

विस्तार

"शेर का बच्चा लड़ने जा रहा चुनाव"  

पार्टी के शीर्षस्थ नेता संजय राउत ने आदित्य ठाकरे के नामांकन भरते समय ऐसा कहा | राजनीति में बयानों की अपनी अहमियत है और फिर बनते हैं उनसे किस्से कहानी, एक किस्सा और लिखा जा रहा है जिसमे एक युवा नेता अपने दादा की सत्ता को सँभालने का "विजय संकल्प रैली" में संकल्प लेता है और फिर वर्ली की सड़को पर एक पोस्टर दिखाई देता है जिस पर आदित्य ठाकरे के चेहरे के साथ लिखा होता है "केम छो वर्ली"
इस सम्पूर्ण घटनाक्रम के बाद एक बड़ी खबर बनती है कि  "आदित्य ठाकरे शिवसेना परिवार से प्रथम व्यक्ति होंगे, जो सीधे चुनाव का सामना करेंगे। शिवसेना ने उन्हें मुंबई के वर्ली से उम्मीदवार बनाया है। 

बाला साहेब की तरह दूरदर्शिता नहीं है

उद्धव और आदित्य का बाला साहेब की तरह दूरदर्शिता नहीं है उद्धव और आदित्य का कि वे सत्ता से बाहर रहकर भी पार्टी चला लें जनता में अपनी मजबूत छवि को बनाये रखे 

पार्टी की बेहतर वृद्धि के लिए 

पार्टी ने तय किया है कि परिवार के किसी व्यक्ति को चुनावी राजनीति के साथ ही सत्ता के शीर्ष पर भी रहना चाहिए, इसे पार्टी की बेहतर विकास होगा और परिवार के लोगों की छवि योग्य प्रशासक के रूप में भी बनेगी। 

सत्ता में रहने से पार्टी पर बेहतर नियंत्रण 

सत्ता में रहने से पार्टी पर बेहतर नियंत्रण रहता है और पार्टी कैडर को उपकृत करना भी आसान हो जाता है। 

पार्टी बड़ी रहे और बनी रहे 

दल के अन्य नेताओं को सत्ता सौंपने से पार्टी में उनकी अधिक चलने लगती है, जिसके कारण टकराव पैदा हो जाता है। यही कारण है कि शिवसेना के कई शीर्षस्थ नेताओं को, जो कभी केन्द्रीय मंत्री और राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हैं, उन्हें या तो पार्टी ने बाहर का रास्ता दिखा दिया गया या फिर बाद में उपेक्षा के कारण वे खुद बाहर चले गए। 

आदित्य का व्यक्तित्व मुखर है वो अपने दादा की तरह बेबाक है 

आदित्य छात्र राजनीति करते रहे हैं और पिता के साथ वे लगातार शिवसेना की राजनीति में सक्रिय हैं। उनका व्यक्तित्व अपने पिता उद्धव ठाकरे की तुलना में ज्यादा मुखर है 

 

आदित्य ठाकरे
आदित्य ठाकरे - फोटो : PTI

जनयात्रा से सत्ता यात्रा और फिर राजनैतिक कद यात्रा तक का सफर 

आदित्य ने चंद सप्ताह पहले ही राज्य में पांच हजार किलोमीटर से भी अधिक की यात्रा की है, इससे वे न सिर्फ एक युवा नेता के रूप में उभरे हैं, बल्कि लोगों में उनके बारे में अपील भी गई है। यही कारण है कि उद्धव ने हाल की रैली में कहा था कि अब मुख्यमंत्री शिवसेना का होगा। साफ तौर पर यह इशारा आदित्य की तरफ है।

बाला साहेब की विरासत को आगे बढ़ाना मजबूरी 

हालांकि उद्धव के लिए बाला साहेब की विरासत को आगे बढ़ाना मजबूरी थी, लेकिन नए जमाने के आदित्य पार्टी के साथ सत्ता में भी अपनी धमक कायम करना चाहते हैं। 

सलाह सेनापति बनने की, तो उतरना होगा रण में      

 सूत्रों के हवाले से प्रशांत किशोर ने आदित्य ठाकरे को भी सीधा ज़मीन पर उतरकर जनता की नब्ज़ पकड़ने की सलाह दी है और अब पार्टी बाला साहेब के वक़्त से नहीं गुज़र रही है जब जनता जनार्दन का रिमोट कण्ट्रोल बाला साहेब के हाथ होता है अब वक़्त ने करवट बदली है और अब जनता की मध्य जनता के साथ खड़े होना ही पड़ेगा। 

सीटें बढ़ेंगी तो पार्टी का कद भी बढ़ेगा

महाराष्ट्र में बीजेपी के साथ छोटे भाई की तरह खड़े रहने से बहुत बड़ा भविष्य शिवसेना का नहीं बनेगा अगर सीटों की संख्या बढ़ती जाएगी तो सत्ता में रसूक भी बढ़ेगा और आकार भी। 

फ्रंट लीड करना ही होगा 

बाला साहेब का चेहरा अपने आप में पार्टी की ताक़त थी जिसका दबदबा आज भी शिवसेना में दिखता है, मगर आज के राजनैतिक माहौल में अगर इस रुतबे को कायम रखना है तो फ्रंट लीड करना ही होगा, और ये मौका भी खास है और मक़सद भी। 
अपनी मृत्यु से कुछ दिन पहले अपने सम्पादकीय में बाला साहेब ने लिखा था,
"आजकल मेरी हालत चिंताजनक है किन्तु मेरे देश की हालत मुझसे अधिक चिंताजनक है, ऐसे में भला मैं कैसे चुप बैठ सकता हूँ "
बात तो वो ही हैं मगर कुछ शब्द जरा बदल गए आज देश की जगह शिवसेना है और शायद आदित्य ठाकरे की रूप में शिवसेना उम्मीद लगाए है। 
चलिए इतिहास तो बदल दिया मगर क्या सच में "कौन बनेगा मुख्यमंत्री ? " का खेल भी जीत पायेगी शिवसेना । 

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