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शहादत की तारीख में उलझ गया शहीद का सम्मान
आगरा/ब्यूरो
Updated Thu, 25 Jul 2013 10:11 PM IST
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‘मां! मरूं तो ऐसे कि दुनिया जाने। एक दिन आप भी 15 अगस्त को दिल्ली के लाल किला मैदान जाओगी सम्मान लेने। क्यों बेटा, तू साथ नहीं चलेगा।
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नहीं मां, वो मेडल शहीद होने के बाद ही मिलता है। मेडल ही मेरा सपना है मां। उसके लिए मर भी जाऊंतो कोई गम नहीं।’ बेटे के ये शब्द आज भी शकुंतला के कानों से टकराते हैं। हृदय चीत्कार कर उठता है। इस असहनीय पीड़ा को किससे कहें जो हर पल उन्हें कचोटती रहती है।
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कैप्टन सुनील यादव ने जो कहा, करके दिखाया। गोलियां शरीर को छलनी करती गईं, लहू बहता रहा पर सुनील के कदम नहीं लड़खड़ाए। वह तो साहस की चोटी छू चुके थे। 18 हजार फीट ऊंची रेशमा टॉप पर तिरंगा फहराने के बाद ही सुनील की सांसें थमीं।
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24 साल की उम्र में शौर्य गाथा लिखकर भी शकुंतला के बेटे की इकलौती ख्वाहिश अधूरी ही रह गई। मां यही सोचती हैं, वीरता का एक मेडल ही तो चाहा था उसने। फिर क्यों इस सम्मान को आज तक तरसी है बेटे की आत्मा।
जानते हैं इस कारगिल शहीद को क्यों अशोक चक्र नहीं मिला, उसकी शहादत की तारीख की वजह से। भारत सरकार तो 26 जुलाई को ही युद्ध समाप्ति की घोषणा कर चुकी थी। 30 अगस्त को रेशमा टॉप को फतेह करने वाले फौलादी सुनील के मिशन को पेट्रोलिंग कहकर अशोक चक्र के लिए खारिज कर दिया गया।
वीर मां शकुंतला देवी से मिलने हम उनके लायर्स कालोनी स्थित आवास पहुंचे। छोटे भाई को पूजा घर के चरण छूने के बाद भाई की तस्वीर को नमन करते देखा। बेटे के बारे में बात आते ही मां की आंखें सजल हो गईं। बचपन से ही उन्हें आर्मी से प्यार हतो। देश की सेवा करवौ चाहते।
पिता भी आर्मी में कैप्टन हते। सुनील सीधे सैकंड लेफ्टिनेंट बनकै गए। कारगिल की जंग ते 6 महीना पहले ही कैप्टन बने। हमारे बेटा की एक ही तमन्ना हती। बाकी याद तौ आज हूं उतनी ही ताजा है जितनी 13 साल पहले हतीं। कबहू भूल नाय पाते बेटा पर का करै। कोई ते कह नाय पामें।
एक साल बाद आया था पार्थिव शरीर
इस परिवार के साथ कई त्रासदी हुईं। बेटे की शहादत की खबर 30 अगस्त को आई और पार्थिव शरीर करीब एक साल बाद। पैतृक गांव कठिंगरा, एटा में आर्मी, प्रशासन और सारे रिश्तेदार इकट्ठा थे पर बाद में बताया गया कि सुनील का पार्थिव शरीर मिला ही नहीं। मां के हाथ से फूल माला छूट गई, बेहोश हो गईं।
एक साल तक यही लगता कि शायद कोई गलतफहमी हो गई हो। सुनील लौट आएंगे। बाद में फ्लैग मीटिंग होने के बाद आर्मी ने पाकिस्तान की टेरिटरी में सर्चिंग की। 8 अगस्त 2000 को तिरंगे में लिपटे सुनील को गांव लाया गया जहां परिवार और सेना ने उन्हें सलामी दी। गांव में सुनील का स्मारक भी बना है।
कबहू दुख नाय दयो...
बेटे के गुणों का बखान करती मां की आंखें छलक आईं। बोलीं, बहुत सरल स्वभाव के थे। हमें कबहू दुख नाय दयो। खाने के बहुत शौकीन हते। पूड़ी-खोआ तौ बहुत ही पसंद हतो।
बार्डर थी पसंदीदा फिल्म
घर में आज भी बार्डर की कैसेट रखी है जो सुनील की पसंदीदा फिल्म थी। बहुआयामी प्रतिभा के धनी सुनील एनसीसी के सी सर्टिफिकेट कैडिट थे। राष्ट्रीय स्तर पर क्रिकेट खेल चुके थे।
शहादत पर गर्व है मगर दर्द भी
रेशमा टॉप जो पाकिस्तान के कब्जे में थी। 24 साल के कैप्टन सुनील यादव अपनी यूनिट के साथ इस बर्फीली चोटी पर विजय पताका फहराने चढ़े थे। बंदूक की गोलियां, बारूद को चीरता हुआ यह रणबांकुरा आगे बढ़ता गया। पाकिस्तानी टेरिटरी में घुसकर दुश्मन पर हमला बोल दिया।
पहली बंदूक छूट गई तो दूसरे की लेकर लड़ते रहे। भाई संतोष बड़े गर्व से कहते हैं, उनके शरीर में पांच बुलेट्स लगी थीं। आंख के नीचे बम के बस्ट का निशान था। अपने देश के लिए भैया अंतिम समय तक जूझते रहे। उनकी शहादत पर गर्व है मगर दर्द भी है।