Gujarat Election: पहले चरण के चुनाव से पहले थमा प्रचार, राजनीतिक दलों ने ऐसे की है पासा पलटने की तैयारी
Gujarat Election: मोरबी से लेकर राजकोट, अमरेली से लेकर भुज और सौराष्ट्र कच्छ की 89 सीटों पर चुनावी गुणा गणित की पूरी बिसात बिछाई जाने लगी है। गुजरात विधानसभा के पहले चरण के मतदान का चुनाव प्रचार मंगलवार शाम पांच बजे थम गया। अमर उजाला डॉट कॉम ने प्रचार थमने के बाद गुजरात के सौराष्ट्र और कच्छ इलाके के लोगों से बात की...
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जामनगर के हिरेनभाई कहते हैं कि अब उनके पास सिर्फ 48 घंटे का वक्त बचा है। पूरी टीम अब जामनगर के ज्यादा से ज्यादा घरों में पहुंचकर अपने प्रत्याशी के पक्ष में वोट करने की अपील करेगी। हिरेन भाई कहते हैं कि चुनाव है तो लोग नाराज भी होते हैं। लेकिन अब नाराज लोगों को मनाने का वक्त नहीं बचा है। उनका कहना है की पार्टी के पन्ना प्रमुखों की असली परीक्षा तो चुनाव प्रचार खत्म होने के बाद ही शुरू होती है। वह तो पन्ना प्रमुख हैं। कच्छ के भिंडियारा में मिठाई की दुकान करने वाले अली भाई कहते हैं कि प्रचार तो थम चुका है लेकिन इस इलाके में लड़ाई कांटे की है। इसीलिए सभी राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता चुनाव प्रचार थमने के बाद गांव-गांव और घर-घर पहुंचने लगे हैं।
मोरबी से लेकर राजकोट, अमरेली से लेकर भुज और सौराष्ट्र कच्छ की 89 सीटों पर चुनावी गुणा गणित की पूरी बिसात बिछाई जाने लगी है। गुजरात विधानसभा के पहले चरण के मतदान का चुनाव प्रचार मंगलवार शाम पांच बजे थम गया। अमर उजाला डॉट कॉम ने प्रचार थमने के बाद गुजरात के सौराष्ट्र और कच्छ इलाके के लोगों से बात की। स्थानीय लोगों और राजनीतिक दलों से जुड़े लोगों ने बताया कि अगले 48 घंटे चुनावी लिहाज से बहुत अहम हैं।
शुरू हुआ पन्ना प्रमुख का काम
जामनगर के हिरेनभई कहते हैं कि उनकी सीट पूरे गुजरात की सबसे प्रतिष्ठा और चर्चित सीट है। वह कहते हैं यहां पर रिवाबा जडेजा भाजपा की प्रत्याशी हैं। इसी वजह से यह सीट सिर्फ गुजरात ही नहीं बल्कि पूरे देश में चर्चा में बनी हुई है। हिरेनभाई कहते हैं कि अभी थोड़ी देर पहले ही चुनाव प्रचार तो थम गया है, लेकिन चुनाव प्रचार थमने के साथ उनकी जिम्मेदारियां बहुत ज्यादा बढ़ गई हैं। क्योंकि वह अपने बूथ के पन्ना प्रमुख भी हैं। उनका कहना है कि चुनाव प्रचार थमने के बाद से लेकर मतदान की प्रक्रिया तक पन्ना प्रमुख की जिम्मेदारियां सबसे अहम हो जाती हैं। वह कहते हैं कि अब उनकी असली मेहनत और परीक्षा शुरू हुई है। अब तो रात को दो-दो बजे तक अपनी विधानसभा के हर घर में जाना होगा। यह पूछने पर कि चुनाव प्रचार में भी तो लोगों से लगातार मुलाकात हुई होगी, तो उनका कहना है कि चुनाव के अंतिम पल में कुछ भरोसा नहीं होता है। इसलिए हर समर्थक अपने लोगों से मुलाकात कर प्रत्याशी के पक्ष में वोट देने की अपील करें। उनका कहना है कि इतने बड़े चुनाव में बहुत से लोग नाराज भी हो जाते हैं। लेकिन अब नाराज लोगों को मनाने का वक्त नहीं बचा है।
पोरबंदर के समुद्री तट पर बनी चौपाटी पर दस दोस्तों का ग्रुप बीते कई सालों से रोजाना इवनिंग वॉक पर आता है। अमर उजाला डॉट कॉम ने इन लोगों से चुनाव प्रचार खत्म होने के बाद पोरबंदर की सियासी सरगर्मियां को समझा। इसी ग्रुप के चेतन झूंगी कहते हैं कि पोरबंदर में चुनाव कांटे का है। यहां पर भाजपा और कांग्रेस के बीच कड़ी लड़ाई है। हालांकि चेतन खुलकर कहते हैं वह नरेंद्र मोदी के समर्थक हैं। उनका कहना है कि ऐसी कांटे की टक्कर वाली सीट पर चुनाव प्रचार खत्म होने के बाद भी सियासी सरगर्मियां तो बढ़ती ही हैं। हालांकि सचिन कहते हैं कि अब वह वक्त नहीं है कि चुनाव प्रचार खत्म होने के बाद राजनीतिक पार्टियां मतदाताओं का मन बदल सकें। वह कहते हैं लोग विचारधारा के साथ वोट देने जाते हैं। ऐसे में कोई भी राजनैतिक दल महज दो दिन के भीतर मतदाता का ब्रेनवाश नहीं कर सकता है। सभी राजनीतिक दलों के नेताओं में धुकधुकी तो बनी ही रहती है। खासतौर से तब जब चुनाव का कांटे का हो।
मोरबी हादसा नहीं बन पाया चुनावी मुद्दा
मोरबी सिर्फ गुजरात ही नहीं, बल्कि पूरे देश में तब चर्चा में आ गया जब यहां बना पुल मच्छु नदी में समा गया और 135 लोगों की जान चली गई। चर्चा यही हुई कि गुजरात में मोरबी बहुत बड़ा चुनावी मुद्दा बनेगा, लेकिन जमीन पर या मुद्दा चुनावी नहीं बन सका। सियासी गलियारों में इसके तमाम मायने निकाले गए। जब चुनाव प्रचार थम गया है, तो यहां पर तमाम तरीके की राजनीतिक कयासों का दौर भी शुरू हो गया है। मोरबी के इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ने वाले सौरभ पटेल कहते हैं कि चुनाव प्रचार का थम जाना और चलते रहने का अब उतना विशेष महत्व नहीं होता है। वह कहते हैं जिस विधानसभा में सभी बड़े नेताओं की रैलियां और जनसभाएं हो चुकी हो हों, वहां पर चुनाव प्रचार थमने के बाद कोई राजनैतिक बड़ी हलचल न भी हो, तो भी कुछ विशेष फर्क नहीं पड़ता। सौरभ के साथ ही इंजीनियरिंग करने वाले प्रकाश राबरिया बताते हैं कि उनके साथ पढ़ने वाले छात्रों ने चुनाव प्रचार खत्म होने के साथ ही अपने इलाके के बूथ अध्यक्ष के साथ न सिर्फ बैठक की, बल्कि हर घर में दस्तक देने की पूरी योजना बना ली है। वह कहते हैं कि उनके दोस्तों का पूरा संगठन अपने-अपने इलाके के दस-दस घरों में जाकर चुनाव वाले दिन तक न सिर्फ मुलाकात करेगा, बल्कि अपने प्रत्याशी के पक्ष में वोट देने की अपील भी करेगा।
पंच और सरपंचों के माध्यम से संपर्क
कच्छ की भुज विधानसभा के अंतर्गत आने वाले भिंडीयारा के अली भाई कहते हैं कि यह तो हमेशा से ट्रेंड रहा है कि चुनाव प्रचार खत्म होने के बाद घर-घर दस्तक दी ही जाती है। उनका कहना है, क्योंकि भुज की इस विधानसभा में गांवों और घरों के बीच की दूरियां इतनी अधिक होती हैं कि प्रत्याशी और कार्यकर्ताओं का चुनाव प्रचार खत्म होने के बाद पहुंचना मुश्किल होता है। ऐसे में कोशिश यही होती है कि आसपास के कस्बे और छोटे गांवों में पंच और सरपंचों के माध्यम से अपनी-अपनी राजनैतिक पार्टियों से ताल्लुक रखने वाले लोगों से संपर्क किया जाए। कहते हैं कि भिंडयारा चौराहे पर ही इस वक्त राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता अपने लोगों से नसीर संपर्क कर रहे हैं, बल्कि रात को उनके गांवों की ओर भी जा रहे हैं। उनका कहना है कि ग्रामीण इलाकों में चुनाव प्रचार खत्म होने के बाद महज 48 घंटे के भीतर की जाने वाली मुलाकातों में कई दफा मतदाताओं का मन बदलता है और फिर चुनावी परिणाम भी बदल जाते हैं।
राजकोट पश्चिम विधानसभा भी बहुत महत्वपूर्ण है। यहां पर निवर्तमान मुख्यमंत्री विजय रुपाणी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कभी चुनाव लड़े थे। राजकोट पश्चिम विधानसभा में रिटायर्ड कर्मचारियों का एक समूह रिंग रोड फ्लाईओवर के पास रोज शाम को बैठकर सियासी चर्चाएं भी करता है। अमर उजाला डॉट कॉम ने यहां के लोगों से बात की। यहां के देसू भाई बापू कहते हैं कि राजकोट में चुनाव प्रचार खत्म होने के बाद वह और उनका पूरा ग्रुप अब अपने इलाकों में जाकर लोगों से मतदान वाले दिन घर से निकलने की अपील करेगा। वह कहते हैं कि आज से नहीं, शुरुआत से ही चुनावी रात बहुत सक्रियता की रात मानी जाती है। इसीलिए सभी राजनीतिक पार्टियां अपनी ओर से पूरी ताकत झोंक कर इन 48 घंटे का सदुपयोग करने निकल पड़े हैं।