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विचार: साकार होता यूपी का हरित संकल्प

Fri, 10 Jul 2026 02:46 PM IST
रिया दुबे सुनील चौधरी
सुनील चौधरी Published by: रिया दुबे Updated Fri, 10 Jul 2026 02:46 PM IST
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Uttar Pradesh's Green Vision Takes Shape, Tree Plantation Drive
पौधा रोपन - फोटो : Adobestock

दशकूपसमा वापी, दशवापीसमो ह्रदः। दशह्रदसमः पुत्रो, दशपुत्रसमो द्रुमः॥

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भारतीय पर्यावरण चिंतन की आत्मा को मत्स्य पुराण के इस श्लोक से समझा जा सकता है जिसका आशय यह है कि दस कुओं के बराबर एक बावड़ी है, दस बावड़ियों के बराबर एक तालाब और दस तालाबों के बराबर एक पुत्र और दस पुत्रों के बराबर एक वृक्ष। वस्तुतः यह श्लोक हमारी सनातन सभ्यता की सामूहिक स्मृति का लिखित रूप है, जिसका यह विश्वास दृढ़ कि जल और वन के बिना मनुष्य का अस्तित्व संभव नहीं। इस श्लोक में वृक्ष की महत्ता को पुत्र से अधिक दर्शाया गया है तो इसलिए एक पुत्र परिवार का आधार होता है, लेकिन एक वृक्ष पीढ़ियों का आधार होता है। भारत की ऋषि परंपरा ने पर्यावरण को कभी भावना के स्तर पर नहीं छोड़ा, उसे तर्क, अनुपात और व्यावहारिक बोध के साथ समझा और समझाया। अब जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में पौधरोपण की दिशा में ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल हुई है तो यह उस ऋषि परंपरा का ही विस्तार है, जिसका प्रकृति से श्रद्धा का रिश्ता था।
 
उत्तर प्रदेश ऋषि-मुनियों की धरती रही है, लेकिन यह विडंबना है कि यहां एक दशक पहले तक पर्यावरण के प्रति चेतना का घोर अभाव देखने को मिलता था। वन भूमि सिकुड़ती रही, जलाशय पाटे जाते रहे, भूजल का दोहन होता रहा, लेकिन शासन-प्रशासन की प्राथमिकता में पर्यावरण को अपेक्षित स्थान नहीं मिल सका। 2017 में जब राज्य में योगी सरकार आई, तब वन विभाग की नर्सरियों में सिर्फ पांच लाख पौधे थे। यह स्थिति चिंताजनक थी और इसका भुगतान पीढ़ियों को करना पड़ सकता था, इसलिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसे अभियान के रूप में लिया और बड़े लक्ष्य निर्धारित किए। पौधरोपण को सहभागिता से जोड़ा गया और सबकी जिम्मेदारी निर्धारित की गई। इसका सार्थक परिणाम यह है कि 2017 से अब तक 242 करोड़ पौधे रोपे जा चुके हैं। इसी वर्ष पर्यावरण दिवस पर पांच करोड़ पौधे एक दिन में लगाए गए और 12 जुलाई को एक ही दिन में 35 करोड़ पौधे रोपने का लक्ष्य है। इस हरित क्रांति का आधार आज उत्तर प्रदेश में देखा जा सकता है, जहां नर्सरियों में 57 करोड़ से अधिक पौधे तैयार हैं। 
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उत्तर प्रदेश में सामूहिक वृक्षारोपण के अभियान पहले भी चलते रहे हैं। स्वतंत्रता के बाद से अनेक सरकारों ने वन महोत्सव मनाए, पौधे लगाए और घोषणाएं कीं लेकिन इनका स्थायी प्रभाव इसलिए देखने को नहीं मिला क्योंकि रोपण के बाद पौधों की रक्षा का तंत्र विकसित करने की दिशा में उन्होंने सोचा ही नहीं। आज इस दिशा में सोचा जा रहा है तो इस बात की संभावना भी प्रबल है कि 242 करोड़ पौधों में लगभग दो तिहाई वृक्ष के रूप में परवान चढ़ेंगे और प्रदेश के भूगोल और जलवायु में परिवर्तन लाएंगे। इस संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का 'एक पेड़ माँ के नाम' अभियान का जिक्र भी प्रासंगिक है जो एक तरह से लोगों को पौधरोपण से भावनात्मक रूप से जोड़ता है। यह अभियान लोगों को मनोवैज्ञानिक रूप से पौधा लगाने के लिए प्रेरित करता है। लोग जानते हैं कि पेड़ लगाना अच्छा है, फिर भी नहीं लगाते। जब एक पेड़ किसी की मां से जोड़ा जाता है, तो वह एक सामाजिक दायित्व बन जाता है। भारतीय समाज में मां के प्रति जो भावनात्मक बंधन है, उसे इस अभियान ने पर्यावरण चेतना के साथ जोड़ने की कोशिश की है। 
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इस पूरे परिदृश्य में एक आयाम प्रायः उपेक्षित रहता है। मौसम के बदलते चक्र का किसान पर प्रत्यक्ष और विनाशकारी प्रभाव। आज से पच्चीस वर्ष पूर्व जो मौसम था और आज जो मौसम है, उनके बीच लगभग डेढ़ महीने का विचलन आ गया है। उत्तर प्रदेश के उस किसान के लिए जिसके पास दो बीघा खेत है, यह डेढ़ महीने का विचलन उसकी पूरी आजीविका को अनिश्चितता में डाल देता है। देरी से आया मानसून, समय से पहले लौटती सर्दी, अचानक पड़ने वाले ओले, ये सब उस जलवायु असंतुलन के लक्षण हैं, जिसकी जड़ में वनों का ह्रास है। वृक्षारोपण इस समस्या के समाधान की दिशा में सबसे सुलभ और सबसे सिद्ध कदम है।

हमारे पूर्वजों ने पीपल और बरगद को पवित्र इसलिए माना था कि वे वृक्ष जो सर्वाधिक पर्यावरणीय उपयोगिता के थे, उन्हें हर हाल में बचाए रखा जाए। कुआं खोदने को इसलिए पुण्य माना गया कि जल प्रबंधन एक सामाजिक मूल्य बने, सरकारी योजना नहीं। तालाबों और बावड़ियों के निर्माण की जो तुलनात्मक महत्ता मत्स्यपुराण में दी गई है, वह वास्तव में जल संरक्षण नीति है जो धर्म की भाषा में कही गई है। आज के समय में उस भाषा को बदला जा सकता है, लेकिन उस ज्ञान को नहीं। उत्तर प्रदेश में जो हो रहा है वह उसी ज्ञान को आधुनिक नीति और प्रशासनिक इच्छाशक्ति के माध्यम से पुनर्जीवित करने का प्रयास है। पर्यावरण को विकास के विरुद्ध नहीं, विकास की पूर्वशर्त के रूप में देखा जाना चाहिए। उत्तर प्रदेश ने विकास की गति बनाए रखने साथ ही पर्यावरण संरक्षण को गति दी है तो यह एक बड़ी उपलब्धि है। 


242 करोड़ पौधे और 35 करोड़ का एकदिवसीय महालक्ष्य, यह अन्य राज्यों के लिए बड़ा संदेश है। नेट जीरो के लक्ष्य को सिर्फ कागजों पर नहीं रखा जा सकता। उसके लिए प्रयास करने होंगे, वास्तविकता के धरातल पर आना होगा। पर्यावरण संरक्षण प्रत्येक समाज की, प्रत्येक सरकार की और प्रत्येक नागरिक की ज़िम्मेदारी है और यह ज़िम्मेदारी उठाने के लिए विपुल धन नहीं चाहिए। बस अपनी सनातन ऋषि पंरपरा को ध्यान में रखन होगा और निरंतर आगे बढ़ना होगा।

(अस्वीकरण: ये लेखक के निजी विचार हैं। लेखक सुनील चौधरी उत्तर प्रदेश वन विभाग के प्रधान मुख्य वन संरक्षक व विभागाध्यक्ष हैं।)

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