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विचार: नया आर्थिक भूगोल गढ़ता उत्तर प्रदेश

Mon, 05 Oct 2026 12:40 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र अनुराग अग्रवाल
अनुराग अग्रवाल Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Mon, 05 Oct 2026 12:40 PM IST
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Uttar Pradesh New Economic Geography IIA MoUs signed India Expo Centre and Mart news
ग्रेटर नोएडा के इंडिया एक्सपो सेंटर एंड मार्ट में आयोजित ईवी इंडिया एक्सपो 2026 में उमड़ी भीड़।
ग्रेटर नोएडा के इंडिया एक्सपो सेंटर एंड मार्ट में पांच दिन चला उत्तर प्रदेश अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेला (यूपीआईटीएस) संपन्न हो गया। स्टॉल समेटे जा चुके हैं और क्रेता-विक्रेता अपने-अपने ठिकानों को लौट गए हैं। जिस भव्यता के साथ यह आयोजन हुआ और जिस उत्साह से इसमें उद्यमी और खरीदार शामिल हुए, उसका प्रभाव आने वाले दिनों में देखने को मिलेगा। इंडियन इंडस्ट्रीज एसोसिएशन (आईआईए) का प्रतिनिधि होने के नाते मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि यूपीआईटीएस ने वैश्विक बाजार में एक बड़ी छलांग लगाई है और अब हम आर्थिक धरातल के एक महत्वपूर्ण पड़ाव पर है।
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इस मेले में लगभग 4,400 समझौता ज्ञापन हुए, जिनका मूल्य करीब 680 मिलियन डॉलर, यानी लगभग 6,500 करोड़ रुपये है। कारोबारी पूछताछ के आधार पर लगभग 15,500 करोड़ रुपये के संभावित व्यापार का अनुमान सामने आया। ये आंकड़े उल्लेखनीय हैं, लेकिन इनसे भी बड़ा संकेत उस गतिविधि में छिपा है, जो इसके पीछे चली। फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशन (फियो) के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस बार 41,500 बी2बी बैठकें हुईं, जो पिछले वर्ष की 31,650 बैठकों की तुलना में 31% से अधिक हैं। व्यापार में विश्वास की मुद्रा बैठकों से बनती है और जब बैठकों की संख्या एक वर्ष में लगभग एक-तिहाई बढ़ जाए, तो यह प्रमाण है कि उत्तर प्रदेश को लेकर दुनिया की जिज्ञासा गहरी हो रही है।
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पिछले कुछ वर्षों में राज्य ने अपनी अर्थव्यवस्था को केवल कृषि और पारंपरिक उद्योगों की सीमा में नहीं बांधा है। एक्सप्रेसवे का विस्तृत होता नेटवर्क, औद्योगिक गलियारे, नोएडा-ग्रेटर नोएडा में इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना-प्रौद्योगिकी का उभार, लॉजिस्टिक्स पार्कों की योजनाएं और जेवर में बनने वाला हवाई अड्डा एक ही दिशा की ओर इशारा करते हैं। यह दिशा उस राज्य की है, जो उत्पादन, निर्यात और निवेश, तीनों में अग्रणी भूमिका निभाना चाहता है। केंद्र और राज्य की नीतियों के समन्वय, जिसे आम बोलचाल में ‘डबल इंजन’ की सरकार कहा जाता है, ने इस यात्रा को गति दी है।

इस मेले की आत्मा ‘एक ज़िला, एक उत्पाद’ (ओडीओपी) की अवधारणा है, जो योगी सरकार की सबसे मौलिक आर्थिक पहलों में गिनी जाती है। इसके पीछे सीधी-सी, लेकिन गहरी समझ है: हर ज़िले के पास कोई न कोई विशिष्ट हुनर है और उसे पहचान, ब्रांड व बाज़ार मिलना चाहिए। भदोही की कालीन हो या मुरादाबाद का पीतल, वाराणसी का रेशम हो या लखनऊ की चिकनकारी, इन परंपराओं को पीढ़ियों ने संवारा और आगे बढ़ाया है, लेकिन बाज़ार तक सीधी पहुंच के अभाव में इनका पूरा मूल्य इन्हें गढ़ने वाले कारीगर तक नहीं पहुंच पाता था। ओडीओपी की इस पहल ने प्रदेश के हर ज़िले की स्थानीय विशेषता को राज्य की साझा पूंजी में बदल दिया। इस बार भी यह पहल मेले का सबसे आकर्षक केंद्र बनकर उभरी। इसी कड़ी में नए जुड़े ‘ओडीओसी’ की अनदेखी नहीं की जा सकती। ओडीओपी की तरह यह भी यूपी के आर्थिक भविष्य का हिस्सा है और चूंकि इस ट्रेड शो में सभी 75 जिलों से ओडीओसी की छतरी तले उद्यमियों की पहुंच हुई है, यह इस बात का प्रमाण है कि राज्य का आर्थिक भूगोल नए सिरे से लिखा जा रहा है।
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आर्थिक विकास का बुनियादी सिद्धांत कहता है कि जो समाज अपने उत्पादकों को बाज़ार से सीधे जोड़ता है, वह न केवल आय बढ़ाता है, बल्कि उद्यम की संस्कृति भी रचता है। मेले में ‘रिवर्स बायर-सेलर मीट’ जैसी व्यवस्था इसी सिद्धांत का व्यावहारिक रूप है, जिसमें क्रेता खुद उत्पादक के पास आता है। इस बार इस हिस्से में लगभग 13,500 बैठकें हुईं, जबकि मुख्य प्रदर्शनी क्षेत्र में करीब 28,000 कारोबारी संवाद हुए। इसका अर्थ यह है कि गांव-कस्बे का छोटा उद्यमी, जिसे कभी दिल्ली-मुंबई के निर्यातकों की कृपा पर निर्भर रहना पड़ता था, अब सीधे अंतरराष्ट्रीय खरीदार के सामने अपनी बात रख रहा है। यही समावेशी विकास के लक्षण हैं।

मेले का मानवीय पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उत्तर प्रदेश कौशल विकास मिशन के मंडप में 16 कौशलों का जीवंत प्रदर्शन हुआ। यह तथ्य स्थापित करता है कि सरकार मानव-पूंजी के निर्माण को भी प्राथमिकता देती है। देश के सबसे युवा राज्यों में से एक के लिए यह जनसांख्यिकीय लाभ तभी ताकत बनता है, जब युवाओं के हाथ में हुनर हो और हुनर के सामने बाज़ार। जब कोई नौजवान अपने प्रशिक्षण को वैश्विक मंच पर प्रदर्शित होते देखता है, तो उसके भीतर यह विश्वास जन्म लेता है कि उसका भविष्य उसकी अपनी मिट्टी में सुरक्षित है। कभी पलायन की पीड़ा से जूझ चुके इस प्रदेश के लिए यह मनोवैज्ञानिक परिवर्तन किसी भी अनुबंध से अधिक मूल्यवान है। दिल्ली-एनसीआर के स्कूलों की भागीदारी ने भी इस आयोजन को नई पीढ़ी के लिए सीखने का मंच बनाया।
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उत्तर प्रदेश की भौगोलिक स्थिति और आकार में उसकी सबसे बड़ी शक्ति छिपी है। देश की सबसे बड़ी आबादी वाला यह राज्य अपने आप में एक विशाल उपभोक्ता बाजार भी है और उत्पादन का विशाल आधार भी। जब इतना बड़ा राज्य निर्यात-संस्कृति अपनाता है, तो उसका असर पूरे देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। 

इस उपलब्धि का अर्थ यह नहीं कि यात्रा पूरी हो गई है। किसी भी बड़े लक्ष्य की तरह इसमें भी निरंतरता सबसे बड़ी शर्त है। हुए समझौतों को उत्पादन-आदेशों में बदलना, नए बाज़ारों की तलाश जारी रखना, ज़िलों के छोटे कारीगरों तक निर्यात की जानकारी और सुविधाएं पहुंचाना और लॉजिस्टिक्स की लागत घटाना, ये सब जरूरी काम हैं, जो हो भी रहे हैं। जिस सरकार ने चार वर्षों में इस मंच को इतना विस्तार दिया है, उससे यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वह इस गति को कायम रखेगी। बैठकों में 31% की वृद्धि यही बताती है कि पहिया सही दिशा में घूम रहा है।

(अस्वीकरण: ये लेखक के निजी विचार हैं। लेख में दी गई जानकारी और तथ्यों के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। लेखक अनुराग अग्रवाल, इंडियन इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के नेशनल वाइस प्रेसिडेंट हैं।)
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