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विचार: यूपी में योगी सरकार का समावेशी विकास

Mon, 05 Oct 2026 01:26 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र प्रो. तेज प्रताप सिंह
प्रो. तेज प्रताप सिंह Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Mon, 05 Oct 2026 01:26 PM IST
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Uttar Pradesh CM Yogi Adityanath Development Vision UP Law and rules Opinion Article
सीएम योगी आदित्यनाथ - फोटो : CM Yogi YT
उत्तर प्रदेश में अलग-अलग जातियों, समुदायों और क्षेत्रों में करोड़ों लोग रहते हैं। ऐसे प्रदेश में सरकार की सफलता इस बात से नहीं आंकी जा सकती कि किस जाति को कितना राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिला। असली सवाल यह है कि कानून के सामने नागरिक की पहचान क्या है, अवसर के दरवाजे पर उसकी पात्रता क्या है और विकास की यात्रा में उसके हिस्से की जगह कितनी है? पहले की सरकारों मे नौकरी, पुलिस पोस्टिंग, आरक्षण और यहां तक कि कानून-व्यवस्था के मामलों को भी जातीय चश्मे से देखा-दिखाया गया। 2017 के पहले कानून-व्यवस्था राजनीतिक दबाव और चयनात्मक कार्रवाई का शिकार थी। 
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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार ने जिस सिद्धांत को अपने शासन-मॉडल के केंद्र में रखा, वह यह है कि कार्रवाई का आधार अपराध होगा, जाति या राजनीतिक पहचान नहीं। सबके लिए ‘एक कानून-एक मानक’ नारे के साथ यह संदेश देने की कोशिश की गई कि यह गवर्नेंस सभी वर्गों के लिए एक समान होगी, चाहे कोई सत्तारूढ़ दल को वोट दे या न दे। भर्तियों में जातीय पहचान की जगह मेरिट को प्राथमिकता देने की बात हो या कानून-व्यवस्था के मामलों में जीरो टॉलरेंस की नीति, सबको एक मानक के रूप में प्रस्तुत किया। इस मॉडल की सबसे बड़ी पहचान यह है कि कार्रवाई सत्तारूढ़ दल से जुड़े लोगों पर भी उसी सख्ती से हुई, जिस सख्ती की उम्मीद विपक्ष से जुड़े मामलों में की जाती है। 
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शासन की परख केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रह सकती। उसकी एक कसौटी यह भी है कि सरकारी योजनाओं का लाभ किस आधार पर बंटता है। जब आवास, राशन, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार से जुड़ी योजनाएं समुदाय या जाति देखकर नहीं, बल्कि पात्रता के मानक पर लागू होती हैं, तभी वह शासन वास्तव में समावेशी कहलाने का हकदार बनता है। इसलिए यह प्रश्न केवल राजनीतिक मॉडलों की तुलना का नहीं, बल्कि यह तय करने का है कि आने वाले वर्षों में उत्तर प्रदेश किस दिशा में आगे बढ़े। पहचान की राजनीति की तरफ, जो समाज को टुकड़ों में बांटती है या पात्रता और न्याय पर टिके उस गवर्नेंस की तरफ, जो हर नागरिक को बराबरी का अधिकार देती है?  लोकतंत्र में हर समुदाय की आवाज सुनी जानी चाहिए, हर नागरिक को उसकी जाति से नहीं, उसके अधिकार से जाना जाना चाहिए। 
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यही वह भावना है जो सच्चे लोकतंत्र को परिभाषित करती है, जहां सत्ता किसी क्षेत्र को इसलिए वंचित नहीं करती कि वहां उसकी पार्टी का नेता जीत नहीं सका। करहल हो या आजमगढ़, संभल हो या कौशांबी, जहां-जहां भाजपा को हार मिली, योगी सरकार में वहां भी सड़कें बनीं, अस्पताल खुले, एक्सप्रेसवे गुजरे और हर घर तक पानी पहुंचा। यह इस भरोसे को स्थापित करना है कि शासन किसी दल की जागीर नहीं, बल्कि हर नागरिक का अधिकार है। वनटांगिया और मुसहर जैसे समुदाय, जो कभी वोटबैंक की गणना में भी नहीं आते थे, जब उन्हें घर और पहचान मिली, तो यह साबित हुआ कि विकास की कसौटी वोट नहीं, जरूरत है। यही फर्क तय करता है कि लोकतंत्र सिर्फ जीतने वालों का नहीं, हर नागरिक का होता है।

(अस्वीकरण: ये लेखक के निजी विचार हैं। लेख में दी गई जानकारी और तथ्यों के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। लेखक प्रो. तेज प्रताप सिंह, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में सामाजिक विज्ञान संकाय में राजनीति विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष हैं।)
 
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