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गंगा एक्सप्रेसवे: आर्थिक पुनर्जागरण की जीवंत रेखा

Fri, 24 Apr 2026 08:10 PM IST
Pavan प्रो. संजय सिन्हा
प्रो. संजय सिन्हा Published by: Pavan Updated Fri, 24 Apr 2026 08:10 PM IST
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Ganga Expressway: A Lifeline to Economic Renaissance
गंगा एक्सप्रेसवे: आर्थिक पुनर्जागरण की जीवंत रेखा - फोटो : ANI
गंगा की धारा जब किसी पत्थर से टकराती है, तो वह उसे काटती नहीं, बल्कि उसे घिसते-घिसते अपने रास्ते की शक्ल में ढाल लेती है। उत्तर प्रदेश की नियति भी कुछ ऐसी ही रही है । इस भूमि ने सभ्यताएं जन्मी हैं,  क्रांतियां बोई हैं, अब ये विरासत एक नए अध्याय की दहलीज पर खड़ी है और उस दहलीज का नाम है गंगा एक्सप्रेसवे, जो एक अब साकार रूप में है।
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594 किलोमीटर....मेरठ से प्रयागराज...यह केवल एक सड़क की लंबाई नहीं है, बल्कि उस सोच की लंबाई है,  जो मानती है कि किसी राज्य को बदलने के लिए पहले उसकी नसों में नई रक्त-संचार व्यवस्था बनानी पड़ती है। जब कोई जमीन पर इतनी बड़ी रेखा खींची जाती है, तो वह केवल भूगोल नहीं बदलती, वह उस भूगोल में जीने वाले लोगों की संभावनाओं का नक्शा बदल देती है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, जो मेरठ, नोएडा, गाजियाबाद, आगरा जैसे शहरों से परिभाषित होता है, में उद्योग हैं, बाजार हैं, रोजगार है, और एक खास किस्म की आधुनिकता भी है। लेकिन, जैसे-जैसे आप पूर्व की ओर बढ़ते हैं प्रयागराज, वाराणसी, आजमगढ़, बलिया... एक अलग उत्तर प्रदेश मिलता है। वहां खेत हैं, मंदिर हैं, नदियां हैं, और असीम मानवीय संभावनाएं भी हैं, लेकिन उन संभावनाओं में अवसरों का घोर अभाव दिखता था। गंगा एक्सप्रेसवे इस विभाजन को पाटने की सबसे बड़ी भौतिक कोशिश है।
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लॉजिस्टिक्स की दुनिया में एक पुराना सच है, माल की ढुलाई की लागत जहां कम होती है, वहां उद्योग खिंचे चले आते हैं। भारत में लॉजिस्टिक्स लागत विकसित देशों की तुलना में लगभग दोगुनी है। यह अतिरिक्त लागत उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मकता को कमजोर करती है, उत्पादों को महंगा बनाती है और निर्यात को बाधित करती है। जब गंगा एक्सप्रेसवे जैसे हाई-स्पीड कॉरिडोर बनते हैं, तो यह समीकरण बदलता है। माल तेज पहुंचता है, भंडारण की जरूरत घटती है, ट्रांसपोर्ट का समय कम होता है और पूरी सप्लाई चेन अधिक विश्वसनीय बन जाती है। लेकिन, असली रूपांतरण तब होगा जब एक्सप्रेसवे के किनारे एक औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र उगेगा। 
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सरकार की योजना औद्योगिक नोड्स, वेयरहाउसिंग हब और एमएसएमई  क्लस्टर विकसित करने की है। यह योजना अगर सही नीयत और सही क्रियान्वयन के साथ जमीन पर उतरी, तो उत्तर प्रदेश को एक नई 'ग्रोथ स्पाइन' मिल सकती है। वह रीढ़, जिसके सहारे एक पूरा आर्थिक शरीर खड़ा होता है। टियर-2 और टियर-3 शहरों के लिए ये विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। एक्सप्रेसवे की पहुंच उन्हें एक बड़े आर्थिक नेटवर्क से जोड़ेगी। 

एक्सप्रेसवे का एक और आयाम है जिसे अक्सर सार्वजनिक विमर्श में नजरअंदाज किया जाता है- रियल एस्टेट का रूपांतरण। जब भी किसी इलाके में हाई-स्पीड कनेक्टिविटी आती है, जमीन की कीमतें बदलती हैं। नए आवासीय क्षेत्र उभरते हैं, लोग शहर के महंगे इलाकों को छोड़कर एक्सप्रेसवे के किनारे बसने लगते हैं। उत्तर प्रदेश, जो कभी बीमारू राज्यों की श्रेणी में गिना जाता था, अब खुद को एक आधुनिक, निवेश-अनुकूल और महत्वाकांक्षी राज्य के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। गंगा एक्सप्रेसवे इस नई छवि का सबसे दृश्यमान प्रतीक है।


अस्वीकरण: (ये लेखक प्रो. संजय सिन्हा के निजी विचार हैं। प्रो. सिन्हा श्री विश्वकर्मा कौशल विश्वविद्यालय, पलवल में स्किल फैकल्टी ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज एंड रिसर्च के डीन हैं। पूर्व में वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर के प्रोफेसर रहे हैं।)
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