इस सप्ताह सबने किया निराश, जानिए, कोई है देखने लायक?
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बीते शुक्रवार को बॉलीवुड की चार फिल्में रिलीज हुईं। मगर एक भी ऐसी नहीं है, जिसके बारे में कहा जा सके कि दर्शकों को देखना चाहिए। बासी और उबाऊ कथानकों वाली इन फिल्मों को समीक्षकों ने दरकिनार कर दिया है। जिस फिल्म पर सबसे ज्यादा नजरें थीं, वह है डर्टी पॉलीटिक्स। जबकि अन्य फिल्में बदमाशियां, हे ब्रो और कॉफी ब्लूम थीं।
निर्देशक केसी बोकाड़िया भले ही 1980 के दशक के बड़े फिल्मकार रहे हों, परंतु वक्त के साथ उनकी फिल्म मेकिंग नहीं बदली और मल्लिका शेरावत की मौजूदगी के बावजूद उनकी डर्टी पॉलीटिक्स बुरी तरह से निराश करती है। फिल्म राजस्थान के भंवरी देवी हत्याकांड से प्रेरित है। फिल्म में एक डांसर अनोखी देवी (मल्लिका) पर राज्य का मुख्यमंत्री (ओम पुरी) फिदा हो जाता है।
फूहड़ ढंग से फिल्माए गए अंतरंग दृश्यों की एक सीडी अचानक सामने आती है और अनोखी देवी अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए मुख्यमंत्री को ब्लैकमेल करती है। इस ब्लैकमेलिंग में दूसरे लोग उसे बहकाते हुए नजर आते हैं। फिल्म में नसीरूद्दीन शाह, अनुपम खेर, जैकी श्रॉफ, राजपाल यादव, सुशांत सिंह और अतुल कुलकर्णी जैसे कलाकार बेकार नजर आते हैं।
युवाओं को ध्यान में रख कर बनाई गई अमित खन्ना की बदमाशियां एक किस्म से निर्देशक की बेवकूफियों की तरह दिखती है। हाल में आई थी डॉली की डोली, जिसमें दुल्हन बन कर सोनम कपूर लड़कों को लूटती है। बदमाशियां की हीरोइन शादी तक नहीं पहुंचती और नए-नए बॉयफ्रेंड बनाते हुए उनका पैसा लेकर फरार हो जाती है। इस कहानी दम नहीं है और इसके कहने का अंदाज भी बहुत जटिल है।
इसके अलावा यहां इतने लंबे-लंबे ऊबाई सीन हैं कि आपको सिनेमाहॉल में नींद आ जाए। कोई कलाकार प्रभाव नहीं छोड़ पाता। इसी तरह कॉमेडी के नाम पर निर्देशक अजय चंडोक ने हे ब्रो में जो पेश किया है, वह बेहद निराशाजनक है। बचपन में बिछुड़े दो जुड़वां भाइयों की कॉमेडी कहानी। हालांकि यहां जुड़वां हमशक्ल नहीं हैं। मनिंदर सिंह और गणेश आचार्य की कॉमेडी हंसा नहीं पाती। अजय चंडोक इससे पहले संजय दत्त को लेकर सुपरफ्लॉप चतुर सिंह टू स्टार बना चुके हैं। हे ब्रो भी उसी श्रेणी की फिल्म है।
कुछ अलग कहने की कोशिश करती ड्रामा-रोमांटिक फिल्म कॉफी ब्लूम अंततः देखने योग्य नहीं बन पाती। प्रेमी जोड़ा देव आनंद (अर्जुन माथुर) और अंकिता (सुगंधा गर्ग) साथ में आत्महत्या करने की कोशिश करते हैं। मगर अंकिता मर जाती है और देव जिंदा रह जाता है। वह संन्यासी बनने की कोशिश करता है मगर उसकी मां की अचानक मृत्यु के बाद उसे जिंदगी को नए सिरे से देखने की प्रेरणा मिलती है।
वह कुर्ग के कॉफी प्लांटेशन इलाकों में जाता है, जहां उसकी मुलाकात अंकिता के पति से होती है। कहानी में एक सेक्स वर्कर भी है। कॉफी ब्लूम में देवदास की कहानी की छाप नजर आती है। मगर इसका ट्रीटमेंट उबाता है। कुला मिला कर बॉक्स ऑफिस के लिए होली का हफ्ता फीका रहा।