फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Entertainment ›   Movie Review ›   truth are missing from this movie

मद्रास कैफेः फिल्म तो खूबसूरत पर खटकती रहीं कुछ 'मंशाएं'

Sat, 24 Aug 2013 01:26 PM IST
रवि बुले
रवि बुले Updated Sat, 24 Aug 2013 01:26 PM IST
विज्ञापन
truth are missing from this movie

घर का भेदी लंका ढाए। लेकिन यहां निर्देशक शुजीत सरकार बता रहे हैं कि हमारे घर के भेदियों ने लंका में बैठे एलटीएफ के उग्रवादी अन्ना की मदद की और पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या हो गई! वे हमारे सामने राजीव गांधी हत्याकांड के षड्यंत्रों की परतें उघाड़ते हैं।

विज्ञापन


न राजीव का नाम लेते हैं और न लिट्टे प्रमुख प्रभाकरन का। न उनका जो लंदन में बैठ कर आग को हवा दे रहे थे। यह ठीक वैसा है जैसे इतिहास की कोई किताब नामों के बगैर लिखी जाए। न फैक्ट न फिक्शन। आप जोड़ते रहिए कनेक्शन।
विज्ञापन


यह फिल्म इतिहास को सीधी-सरल रेखा की तरह खींचती है। राजनीति के पेंच सामने नहीं रखती। फिल्म का नायक विक्रम (जॉन अब्राहम) आत्मग्लानि का शिकार है कि हम पूर्व प्रधानमंत्री को नहीं बचा सके। यह हमारे ही लोगों का षड़यंत्र था कि पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या हो गई। हमने उग्रवादियों की बातचीत को इंटरसेप्ट कर लिया था, उनके कोड क्रेक कर लिए थे।
विज्ञापन
विज्ञापन


लेकिन यह तत्कालीन सरकार की इच्छाशक्ति की कमी और बाबूगिरी का नतीजा था कि उग्रवादी अपने इरादों में कामयाब हो गए। क्या तत्कालीन सरकार के लोग इस कालिख के लिए अपना चेहरा आगे करेंगे, प्लीज! अगले साल देश में आम चुनाव हैं और जिस तरह से बार-बार नायक कहता है कि हमारे ही लोगों के कारण पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या हुई, फिल्म में किसी राजनीतिक एजेंडे की ध्वनि गूंजने लगती है!


जॉन भले ही कहें कि उनकी फिल्म का आज की राजनीति से कोई लेना-देना नहीं, लेकिन ‘मद्रास कैफे’ डॉक्यू-ड्रामा की शक्ल में पर्दे के पीछे से एक राजनीतिक वक्तव्य है। भविष्य की कोख के अंधेरे में आज तक कोई नहीं झांक सका, लेकिन संभव है कि हम आने वाले वर्षों में जॉन-शुजीत को इस फिल्म के लिए ‘पुरस्कृत’ होते देखें।

निर्देशक और उसकी टीम द्वारा गहन शोध के बाद बनाई इस फिल्म का नायक रॉ का स्पेशल एजेंट है। विक्रम को इसलिए श्रीलंका भेजा जाता है कि वहां सक्रिय अलगाववादी अन्ना के गढ़ में सेंध लगाए। उसे तोड़-फोड़े। उसकी जगह किसी ऐसे व्यक्ति को लीडर बनवाए, जो अन्ना की तरह उग्र न हो।

जिससे भारत द्वारा इस देश में शांति स्थापित करने के प्रयासों को गति मिले। प्रधानमंत्री द्वारा श्रीलंका में शांतिपूर्ण चुनाव कराने का वादा पूरा हो सके। हीरो अपनी कोशिशों में नाकाम होता है क्योंकि उसके हर कदम की जानकारी अन्ना तक पहले ही पहुंच जाती है। कैसे...? कोई अपना ही है, जो फूट चुका है।

फिल्म ‘पूर्व प्रधानमंत्री’ की हत्या के षड्यंत्र के ताने-बाने को भारत-श्रीलंका से लेकर सिंगापुर-ब्रिटेन तक तनते-बुनते दिखाती है। इस लिहाज से क्लाइमेक्स तक पहुंचते हुए, आखिरी के आधे घंटे में फिल्म रोमांचक हो जाती है। जब इतिहास में दर्ज तमाम संचित सूचनाओं को मिलाकर दर्दनाक मंजर को पर्दे पर उतारती है।

पूर्व पीएम के पैरों में कैनवास शू, मैटल डिटेक्टर को चकमा देने वाला प्लास्टिक से बना विस्फोटक, चश्मे वाली काली लड़की, उसका बमों को शरीर पर बांधना, उसके हाथों में हार, हाथ हिला कर पूर्व पीएम का ध्यान खींचना, हार लेकर आगे बढ़ना, झुक कर बटन दबाना... और वह भयानक धमाका। यह ‘मद्रास कैफे’ में दर्ज है।


इसमें संदेह नहीं कि फिल्म खूबसूरत बनी है। जॉन ने मेहनत से रोल निभाया है। यहां नए अनदेखे लोकेशन हैं, आकर्षक कैमरावर्क है, स्क्रिप्ट में कसावट है। कुछ ऐतिहासिक तथ्य यहां जरूर हैं, लेकिन वे एक पक्षीय लगते हैं। फिल्म इतिहास को इस तरह बयान करती है कि बहुत सारा ‘ट्रुथ’ छूट जाता है।

विज्ञापन
विज्ञापन
सबसे विश्वसनीय Hindi News वेबसाइट अमर उजाला पर पढ़ें Entertainment News से जुड़ी ब्रेकिंग अपडेट। मनोरंजन जगत की अन्य खबरें जैसे Bollywood News, लाइव टीवी न्यूज़, लेटेस्ट Hollywood News और Movie Reviews आदि से संबंधित ब्रेकिंग न्यूज़।
 
रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें अमर उजाला हिंदी न्यूज़ APP अपने मोबाइल पर।
Amar Ujala Android Hindi News APP Amar Ujala iOS Hindi News APP
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed