Hasmukh Review: वीर दास की इस कॉमेडी सीरीज में सबकुछ है बस सहारनपुर नहीं है
डिजिटल रिव्यू: हसमुख
कलाकार: वीर दास, रणवीर शौरी, इनामुल हक, अमृता बागची, सुहैल नैयर, शांतनु घटक, मनोज पाहवा, रजा मुराद और रवि किशन।
निर्देशक: निखिल गोंसाल्विस
ओटीटी: नेटफ्लिक्स
रेटिंग: **1/2
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विस्तार
देहरादून में पैदा हुए और नाइजीरिया में पढ़े लिखे स्टैंड अप कॉमेडियन वीर दास का अभिनय से पुराना नाता रहा है। देल्ही बेली, बदमाश कंपनी और गो गोवा गॉन में उन्होंने लोगों का ध्यान भी अपनी तरफ खींचा। थोड़े दिन पहले वह नेटफ्लिक्स पर दिखे 'वीर दास: फॉर इंडिया' में, जहां दावा किया गया कि वह वेदों से लेकर वास्को डि गामा तक भारतीय इतिहास के मजे ले रहे हैं। यहां, हसमुख में वह अपने खुद के ज्ञान के मजे लेते दिखे। हिंदी लिखते समय बिंदी कहां लगनी है, इसी पर सारा खेल टिका होता है। तो, हंसमुख और हसमुख में जो बारीक अंतर है, वही इस सीरीज की भी वॉकिंग लाइन है। यहां वीर दास के दोनों हाथों में लंबा सा बंबू है और उन्हें नट की तरह हवा में बंधी डोरी पर चलना है।
जैसा कि रिव्यू लिखने का नियम बनाया गया है तो पहले सीरीज की कहानी बता देना जरूरी है। यहां इसलिए ज्यादा जरूरी है क्योंकि इस सीरीज के हर बड़े काम में वीर दास का नाम शामिल है। उनका ही कॉन्सेप्ट है, वह भी प्रोड्यूसर हैं और आधा दर्जन लेखकों की इस सीरीज की टीम में भी वह शामिल हैं। कहानी है एक लड़के की जिसे स्टैंड अप कॉमेडी का नशा है। उस्ताद उसे मौका देता नहीं है तो एक प्रोग्राम से पहले वह उससे पंगा ले लेता है। गुस्से में चले चाकू से उस्ताद शहीद हो जाता है और लड़के के भीतर के कॉमेडी हारमोन्स भड़क उठते हैं। अब छोटे शहरों में जैसे होता है, वैसे ही यहां भी दरोगा मेहरबान है तो हसमुख पहलवान हो जाता है। कहानी यहां से टेकऑफ करती है और मुंबई टीवी इंडस्ट्री के कॉमेडी दलदल में लैंड करते ही अपनी हाइट और अपनी स्पीड दोनों खो देती है।
इसके आगे भी रिव्यू पढ़ने का मन कर रहा है तो आपको बता देते हैं कि ये अपने रिस्क पर कीजिए क्योंकि हसमुख सीरीज के 10 एपीसोड देखना भी किसी रिस्क से कम नहीं है। सहारनपुर की स्क्रैप गलाने वाली भट्ठियों जैसी आग इस सीरीज में नहीं है। उस्ताद बने मनोज पाहवा भी हर बार थोड़ा सा और पाउडर लगाकर चेले को यही बताते रहते हैं। भूत का गला कटा हुआ दिखना जरूरी क्यों है, निखिल गोंसाल्विस ही बता सकते हैं। भतीजे पर फिदा चाची वाला एंगल भी सीरीज को कमजोर करता है, इसके अलावा ब्लैक कॉमेडी बनाने के लिए चिरकन जैसा मजाहिया शायर बनने की जरूरत भी नहीं है। सीरीज की कहानी का सबसे बड़ा लोचा ये है कि यहां ध्यान सीरीज के पहले सीजन पर है ही नहीं, सबको बस ये लग रहा है कि इत्ता कुछ बचाके चलो कि दूसरा सीजन बनाने के लिए नेटफ्लिक्स पैसा जरूर दे दे। तो आगे की सोचने के चक्कर में वीर दास और उनकी मंडली अभी का काम बिगाड़ बैठी है।
हसमुख नाम की ये सीरीज पूरी देखने का मन लगातार करता है लेकिन हर एपीसोड के बाद ये भी लगता है कि मामला कुछ कायदे से जमा नहीं और आखिरी एपीसोड तक आते आते पूरा रायता बिखर जाता है। वह इसलिए क्योंकि कहानी का दही ही नहीं जम पाता है ठीक से। वीर दास पूरी सीरीज में आयुष्मान खुराना की कॉपी करते दिखते हैं। कहानी विधु विनोद चोपड़ा की पहली फीचर फिल्म खामोश की तरह आगे बढ़ती है। बीच बीच में कहीं चाची अपने भतीजे पर दांव लगाने में फिसलती दिखती है तो कहीं चैनल मालिक की लार अपनी सेक्रेट्री पर बार बार टपकती दिखती है। खदेरन जैसे कलाकार को सुपरस्टार बना देने वाले टीवी प्रोड्यूसर का दर्द भी यहां झलकता है और एक दरोगा के अपने इलाके की बोली पकड़ लेने का अभिनय भी यहां महकता है।
वीर दास की सीरीज हसमुख ठीक वैसी ही अरदास है जिसकी लौ तमाम पुजारी बार बार कपूर डालकर इसलिए बढ़ाते रहते हैं कि चढ़ावा चढ़ता रहे। अच्छे मोड़ पर कहानी को खत्म करने की चाहत तो यहां है लेकिन सीरीज तब भटक जाती है जब हसमुख सोशल और पॉलीटिकल कमेंट करने के चक्कर में कभी वकीलों को सामूहिक रूप से गरियाता है तो कभी केजरीवाल, मोदी, मायावती से होते हुए नोटबंदी का एलान करने वाले को कन्फ्यूज इंसान बता देता है। हसमुख राइटिंग और एक्टिंग दोनों लिहाज से वीर दास की एक कमजोर सीरीज है। देखने वाली बात यहां ये है कि हसमुख के हाथों जो पहली जान जाती है, वह कत्ल नहीं है। अचानक से हाथ में आई चाकू चल जाने से गुलाटी का गला कटता है। 302 और 304 का यही फर्क है। एक्टिंग के लिए भी वीरदास ने बोली का जो लहजा पकड़ा वह कतई सहारनपुर का नहीं है। सहारनपुर का लहजा क्या है वह इनामुल हक ने क्लाइमेक्स में बोल कर बताया है।
रणवीर शौरी भी जिम्मी द मेकर के रूप में असर छोड़ने में कामयाब रहे। उनके कुछ सीन वाकई असर छोड़ जाते हैं, जैसे भट्ठी में गुलाटी की खोपड़ी पीछे फेंकना या फिर चैनल की एग्जक्यूटिव से उनकी इश्क मोहब्बत के सीन। नीलकंठ त्रिपाठी वाला सीन भी अच्छा है। इनके अलावा अमृता बागची, शांतनु घटक और रजा मुराद ने भी बढ़िया काम किया है। सुहैल नैयर का कैरेक्टर थोड़ा बेटर लिखा जा सकता था। रवि किशन अब सांसद बन चुके हैं तो ऐसे लिजलिजे किरदार करने से उन्हें परहेज करना चाहिए। उनके भीतर एक कमाल का अभिनेता है, लेकिन अब शायद कोई कालजयी किरदार करने की भूख उनमें बची नहीं है तो बस वह आई एम ए डिस्को डांसर पर ठुमके लगाकर ही खुश हो जाते हैं।